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SBI कार्ड से जुड़ा बड़ा बदलाव! 1 नवंबर 2025 से आएंगे Extra चार्ज, जानें पूरी डिटेल

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नई दिल्ली  भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने अपने क्रेडिट कार्ड फीस स्ट्रक्चर और चार्ज में बड़ा बदलाव किया है। यह नया बदलाव 1 नवंबर 2025 से देशभर में लागू होगा। नया चार्ज केवल कुछ चयनित ट्रांजेक्शन्स पर लागू होगा, जैसे एजुकेशनल पेमेंट और वॉलेट लोड, और केवल उन ग्राहकों पर, जो SBI क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर पेमेंट करते हैं। एजुकेशन पेमेंट पर नया चार्ज अगर ग्राहक अपने SBI कार्ड से थर्ड पार्टी ऐप्स जैसे CRED, Cheq और MobiKwik का इस्तेमाल करके एजुकेशन से जुड़ी पेमेंट करता है, तो 1% का चार्ज लगेगा। उदाहरण के लिए, 1000 रुपये के पेमेंट पर 10 रुपये का चार्ज देना होगा। हालांकि, यदि पेमेंट सीधे स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी को किया जाता है, तो यह शुल्क नहीं लगेगा। वॉलेट लोड पर चार्ज SBI कार्ड से किसी भी वॉलेट में 1000 रुपये से अधिक राशि जमा करने पर 1% का चार्ज लागू होगा। बैंक ने बताया कि एजुकेशन पेमेंट चार्ज MCC कोड 8211, 8220, 8241, 8244, 8249, 8299 वाले थर्ड पार्टी मर्चेंट्स पर ही लागू होगा। SBI कार्ड के अन्य चार्ज   SBI कार्ड कई अन्य ट्रांजेक्शन्स पर भी शुल्क लेता है, हालांकि इनमें हाल ही में कोई बदलाव नहीं किया गया। प्रमुख शुल्क इस प्रकार हैं: कैश पेमेंट चार्ज: 250 रुपये पेमेंट अप्रूवल चार्ज: 2% (कम से कम 500 रुपये) चेक पेमेंट शुल्क: 200 रुपये डोमेस्टिक ATM कैश एडवांस: 2.5% (न्यूनतम 500 रुपये) इंटरनेशनल ATM कैश एडवांस: 2.5% (न्यूनतम 500 रुपये) कार्ड बदलने का शुल्क: 100–250 रुपये, आरम कार्ड के लिए 1500 रुपये विदेश में इमरजेंसी कार्ड बदलना: वीजा के लिए न्यूनतम $175, मास्टरकार्ड के लिए $148 अतिरिक्त लेट पेमेंट चार्ज यदि न्यूनतम ड्यू अमाउंट (MAD) लगातार दो बिलिंग सर्किल तक तय तारीख तक नहीं भरा जाता है, तो 100 रुपये का अतिरिक्त शुल्क लगेगा। यह शुल्क तब तक जारी रहेगा जब तक कि MAD का भुगतान नहीं किया जाता।  

भोपाल में कुशाभाऊ ठाकरे सेंटर पर 2 दिवसीय अफसर कॉन्फ्रेंस, विकास का रोडमैप होगा तैयार

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भोपाल   मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव 7 और 8 अक्टबूर को कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर भोपाल में कलेक्टर-कमिश्नर, एसपी, आईजी-डीआईजी के साथ पहली कॉन्फ्रेंस करेंगे। इस कांफ्रेंस के आठ मुख्य बिंदु तय किए गए हैं। जिसके बार में मंत्रालय के अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के अधिकारी जानकारी देंगे। दो दिन की बैठक में तैयार होगा रोडमैप जानकारी के मुताबिक, सीएम डॉ मोहन यादव इस कांफ्रेंस में अपनी प्राथमिकताएं देंगे। जिसमें साल भर का रोडमैप तैयार किया जाएगा और पैमाने पर परफॉर्मेंस मॉनिटर की जाएगी। इस कॉफ्रेंस में नगरीय निकायों के कमिश्नर और जिला पंचायत सीईओ को बुलाया जाएगा। बैठक में सभी के साथ ग्रुप डिस्कशन होगा। वहीं, आईएएस अफसरा और पुलिस विभाग के आला-अफसरों का भी एक सत्र होगा। किस मुद्दे पर कौन से विभाग का अफसर बोलेगा नगरीय प्रशासन विभाग की पीएम आवास योजना, अमृत योजना और स्वच्छ भारत मिशन पर संजय दुबे जानकारी देंगे। गुड गवर्नेंस के राजस्व मामलों का निपटारा और डिजिटलाइजेशन, भूमि अधिग्रहण समेत कई अन्य मुद्दों पर संजय कुमार शुक्ला जानकारी देंगे। क्राउड मैनेजमेंट, रोड सेफ्टी, क्रिमिनल लॉ और एयर एंबुलेंस के मुद्दे पर शिवशेखर शुक्ला जानकारी देंगे। सिकल सेल, पोषण, अस्पताल के जुड़े मुद्दों पर संदीप यादव जानकारी देंगे। वहीं, स्किल डेवलपमेंट, एमएसएमई लोन स्कीम, उद्योगों को जमीन का आवंटन, पीएम गतिशक्ति, स्टार्टअप सहित दूसरे मामलों की जानकारी राघवेंद्र कुमार सिंह देंगे। खाद-बीज, नरवाई प्रबंध, प्राकृतिक खेती, सिंचाई की प्लानिंग, दूध उत्पादन सहित दूसरे मामलों की जानकारी अशोक वर्णवाल देंगे। एडमिशन और ड्रॉप आउट रेट, शिक्षा की गुणवत्ता समेत दूसरे मामलों की जानकारी देने का जिम्मा संजय गोयल पर है। पीएम जनमन, दजगुआ, पीएम आवास व स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण), मनरेगा, आजीविका मिशन, पंचायती राज, ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण, इको सेंसेटिव जोन समेत कई दूसरे मामलों की जानकारी दीपाली रस्तोगी देंगी। 

गजराज की निगरानी अब होगी हाईटेक! गज रक्षक ऐप में सायरन, नोटिफिकेशन और ऑफलाइन मोड जैसी सुविधाएं

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उमरिया  बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व बाघों का गढ़ तो है ही, लेकिन पिछले कुछ सालों से ये हाथियों का भी गढ़ बन चुका है. हाथियों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है. हाथियों ने बांधवगढ़ को अपना स्थाई अड्डा बना लिया है. लगभग पूरे शहडोल संभाग में हाथियों की मूवमेंट देखने को मिलती है. साल भर वे धमाचौकड़ी मचाते नजर आते हैं. शहडोल, अनूपपुर, उमरिया सभी जिले हाथियों से प्रभावित हैं. हाथियों के मूवमेंट के दौरान अक्सर ही हाथी-मानव द्वंद की स्थिति बनती है. ऐसे में हाथियों के हर एक मूवमेंट के बारे में जानकारी के लिए अब इनकी निगरानी भी हाईटेक होने जा रही है. बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में इसकी तैयारी भी शुरू हो चुकी है, गज रक्षक अब हाथियों से करेगा रक्षा. इस पहल से हाथी-मानव संघर्ष को रोकने में मदद मिलेगी. क्या है गज रक्षक ऐप? गज रक्षक ऐप, जैसा नाम वैसा काम. हाथियों से रक्षा के लिए ये ऐप तैयार किया गया है. वैसे तो इस ऐप की लॉन्चिंग विश्व बाघ दिवस 29 अगस्त को भोपाल में मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा की गई थी. इस मोबाइल एप्लिकेशन को वन विभाग मध्य प्रदेश, वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट और कल्पवैग कंपनी के सहयोग से तैयार किया गया है. बांधवगढ़ में 26 से 29 सितंबर तक इस ऐप की ट्रेनिंग वनकर्मियों को दी जा चुकी है. गज रक्षक ऐप के फायदे गज रक्षक ऐप के फायदों के बारे में बताते हुए बांधवगढ़ के डायरेक्टर अनुपम सहाय ने कहा, "इस ऐप के माध्यम से हाथियों की रियल टाइम लोकेशन की जानकारी लगेगी. उनके मूवमेंट और व्यवहार की जानकारी भी ये ऐप उपलब्ध कराएगा. गांव के नजदीक हाथियों के आते ही इसके माध्यम से समय रहते अलर्ट मिल जाएगा, जिससे हाथी मानव द्वंद को रोकने में सहायता मिलेगी. इससे हाथियों की मॉनिटरिंग आसान होगी." मूवमेंट ट्रैक किया जा सकेगा खेतों में लगी फसल की जानकारी से लेकर हाथी जिन जगहों पर लगातार मूवमेंट करते हैं. उनके रोजमर्रा के स्थलों और विद्युत लाइन की जानकारी इकट्ठा करके रियल टाइम मॉनिटरिंग की जाएगी. जिससे हाथी-मानव द्वंद को कम किया जा सकेगा. इसके अलावा हाथियों की करेंट लोकेशन मिलते ही स्थानीय जनसमुदाय को व्हाट्सएप के माध्यम से सूचना देकर उन्हें सतर्क किया जा सकेगा. हाथियों के लिए हाईटेक ऐप गज रक्षक एक हाईटेक ऐप है, जिससे हाथियों की निगरानी डिजिटल तरीके से की जा सकेगी. इसमें एसएमएस अलर्ट, वॉइस कॉल, पुश नोटिफिकेशन, सायरन, और ऑफलाइन मोड जैसी सुविधाएं भी दी गई है, जो हाथियों की निगरानी में बहुत कारगर साबित हो सकती हैं. ऐप से हाथियों पर निगरानी रखने वाला व्यक्ति उनकी यथास्थिति के बारे में जानकारी साझा करेगा. साथ ही हाथियों की फोटो खींचकर और करंट लोकेशन ऐप पर अपलोड करेगा. साथ ही बताएगा कि हाथी अकेला विचरण कर रहा है या फिर झुंड में है. यह जानकारी हाथियों की करंट लोकेशन से 10 किलोमीटर के दायरे में ऐप यूजर्स को मिल जाएगी. इससे हाथी-मानव द्वंद को कम करने और हाथियों के संरक्षण में सहयोग मिलेगा. बांधवगढ़ सहित अन्य जिलों के वन स्टाफ को ट्रेनिंग गज रक्षक ऐप को लेकर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में ट्रेनिंग जारी है. बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के आसपास के कई जिलों के कर्मियों को ट्रेंड किया जा रहा है. खासकर उन इलाके के वनकर्मियों को जहां हाथियों का मूवमेंट अधिक रहता है. जैसे बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व, संजय दुबरी टाइगर रिजर्व, नॉर्थ शहडोल, साउथ शहडोल, अनुपपुर, सीधी, सिंगरौली, सतना, उमरिया, डिंडोरी के वन कर्मचारियों को इस ऐप की ट्रेनिंग दी जाएगी. बांधवगढ़ में कितने हाथी बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में वर्तमान में काफी संख्या में हाथी है. वैसे तो यहां पहले भी हाथी आते थे, लेकिन अब हाथियों ने इसे अपना स्थाई ठिकाना बना लिया है. साल 2018 में 40 हाथियों का एक झुंड आया था फिर वो वापस नहीं गया. बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में स्थायी रूप से रहने लगा है. इन हाथियों की संख्या अब लगभग 60 से 65 तक पहुंच गई है, जो लगातार बढ़ती ही जा रही है. फसलों के समय में ये हाथी ग्रामीण इलाकों में भी कभी-कभी मूव करते हैं. हाथियों को बांधवगढ़ क्यों पसंद आया एक्सपर्ट बताते हैं "हाथी या फिर कोई भी वन्य प्राणी हो, वह वहीं रुकेगा जहां उसे पीने के लिए पर्याप्त पानी, खाने को भोजन मिले और रहने को सुरक्षित आवास मिले. जहां ये सुविधाएं मौजूद होती है, जंगली जानवर अपना बसेरा बना लेते हैं. हाथियों के लिए ये तीनों ही चीजें बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में आसानी से मिल रही है. इसलिए हाथियों के लिए यह जगह फेवरेट हो गई है. इसके अलावा वे वहां सुरक्षित भी महसूस करते हैं. " हाथियों का गढ़ बना शहडोल शहडोल संभाग जो आदिवासी बाहुल्य है. इसमें शहडोल, अनूपपुर, उमरिया सहित तीन जिले आते हैं. यहां जंगल बहुत घना है और प्राकृतिक संपदा से भरपूर है. यही वजह है कि इस इलाके में तरह-तरह के वन्य प्राणी और दुर्लभ पक्षी रहते हैं. फिलहाल ये तीनों जिले हाथियों के गढ़ बन चुके हैं. यहां साल भर हाथियों का मूवमेंट रहता है. ये जिले छत्तीसगढ़ राज्य से सटे हुए हैं. इस कारण वहां से भी हाथियों की मूवमेंट होती रहती है. 

इंदौर में मेट्रो ट्रायल रन जल्द, लेकिन यात्रियों को सफर के लिए 1 साल और इंतजार

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इंदौर  इंदौर में मेट्रो ट्रेन का ट्रायल रन अब तक 13 किलोमीटर का हो चुका है। कुल 17 किलोमीटर तक इसका ट्रायल रन रेडिसन चौराहे तक होगा। दीपावली के बाद यह ट्रायल किया जाएगा, लेकिन इसके संचालन में अभी समय लगेगा, क्योंकि मेट्रो के स्टेशन अभी पूरी तरह तैयार नहीं हुए हैं। अफसरों की प्राथमिकता चंद्रगुप्त मौर्य प्रतिमा स्टेशन, सुखलिया ग्राम स्टेशन, विजय नगर और रेडिसन चौराहा स्टेशन बनाने की है। फरवरी तक इन स्टेशनों का काम समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि अगले साल तक मेट्रो का संचालन 17 किलोमीटर हिस्से में किया जा सके। यहां तक मेट्रो के चलने के बाद यात्रियों के लिए भी सुविधा होगी। सुपर काॅरिडोर की आईटी कंपनी व काॅलेजों में पढ़ने वाले विजय नगर व आसपास के हिस्सो में रहते हैं। घट गई यात्री, एक फेरे में दस-पंद्रह यात्री फिलहाल मेट्रो का संचालन छह किलोमीटर हिस्से में हो रह है, लेकिन मेट्रो कार्पोरेशन को इससे आय नहीं हो रही है, क्योंकि एक बार के फेरे में दस से पंद्रह यात्री ही सफर कर रहे हैं। इस कारण अब मेट्रो ट्रेन के संचालन में फेरबदल भी किया गया है। चार माह पहले जब इंदौर में मेट्रो का संचालन शुरू हुआ था तो अधिकतम 25 हजार तक एक दिन में यात्रियों ने सफर किया था, लेकिन अब यात्रियों की संख्या 50 से 100 तक सिमट गई है। इस कारण मेट्रो के संचालन की लागत भी नहीं निकल पा रही है, जबकि मेट्रो के संचालन और स्टेशन पर 300 से ज्यादा कर्मचारियों का स्टाॅफ रखा गया है। दरअसल शहरवासी मेट्रो को देखने के लिए उसमे सफर कर रहे थे। अभी जिस हिस्से में मेट्रो का संचालन हो रहा है वहां न तो बसाहट है और न ही कोई औद्योगिक क्षेत्र। इस कारण वहां मेट्रो को वास्तविक यात्री नहीं मिल रहे है। अभी भी लोग जरुरत के बजाए शौकिया तौर पर मेट्रो के सफर का आनंद लेने जा रहे हैं। मेट्रो ट्रेन-फैक्ट फाइल इंदौर मेट्रो एयरपोर्ट, दो बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन को कवर करेगी। शहर के मध्य हिस्से के ट्रैफिक को कम करने में मददगार साबित होगी। हर 30 मिनट के अंतर से मेट्रो ट्रेन चलेगी।शहर में कुल 28 स्टेशनों से ट्रेन गुजरेगी। फिलहाल दस जगह स्टेशनों का काम चल रहा है। मेट्रो ट्रेन का संचालन  फिलहाल छह किलोमीटर हिस्से में हो रहा है। यहां मेट्रो का किराया अधिकतम 30 रुपये है। 20 से ज्यादा मेट्रो ट्रेन का संचालन होगा। एक ट्रेन में साढ़े चार सौ यात्री संवार हो सकेंगे। बैठने के अलावा खड़े रहकर सफर करने में भी आसानी होगी। ट्रेन के भीतर लगे पोल में चार ग्रिप दी गई है। जिसे यात्री पकड़ कर सफर कर सकते है। मेट्रो ट्रेन बाहरी और आतंरिक रुप से सीसीटीवी कैमरों से लैस होगी।     

दशहरे का पावन अवसर: करें ये दान और जीवन में आएँ धन-धान्य और सुख-शांति

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भारत में दशहरा या विजयादशमी (Dussehra 2025) का पर्व सिर्फ उत्सव ही नहीं, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंका के राक्षसराज रावण का वध कर अधर्म का अंत किया था। यही नहीं, इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर देवताओं और समस्त प्रजा को भयमुक्त किया था। हर वर्ष आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को यह पर्व बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोग घरों में विशेष पूजा-पाठ करते हैं, शस्त्र पूजन का आयोजन होता है, और शाम को रावण दहन के माध्यम से बुराई को प्रतीकात्मक रूप से समाप्त किया जाता है। इसके साथ ही इस दिन दान-पुण्य करने का विशेष महत्व बताया गया है।    इन वस्तुओं का करना चाहिए दान शास्त्रों में वर्णित है कि विजयादशमी के दिन किया गया दान अक्षय फल देने वाला होता है। यानी इस दिन जो भी पुण्य कार्य किया जाए, उसका फल लंबे समय तक बना रहता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि दशहरे के दिन किन वस्तुओं का दान करना शुभ माना गया है। अन्न और वस्त्र का गुप्त दान धार्मिक ग्रंथों में गुप्त दान को सर्वोत्तम माना गया है। विजयादशमी के दिन यदि कोई व्यक्ति किसी जरूरतमंद, गरीब अथवा ब्राह्मण को चुपचाप अन्न और वस्त्र का दान करता है, तो इससे घर की दरिद्रता दूर होती है। कहा जाता है कि इससे परिवार में स्थायी सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। झाड़ू का दान भारतीय परंपरा में झाड़ू को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। यह न केवल घर की सफाई का साधन है बल्कि नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता को दूर करने का प्रतीक भी है। दशहरे के दिन किसी धार्मिक स्थल पर या किसी जरूरतमंद को नई झाड़ू दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे घर के वास्तु दोष दूर होते हैं और आर्थिक स्थिति में मजबूती आती है। पीले वस्त्र और मिठाई ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दशहरे पर पीले वस्त्रों का दान करना विशेष फलदायी होता है। पीला रंग सौभाग्य और समृद्धि का द्योतक है। इस दिन यदि कोई व्यक्ति पीले वस्त्र अथवा पीली मिठाई का दान करता है, तो उसके जीवन में रुके हुए कार्य पूरे होते हैं। यह कारोबार और करियर में आ रही बाधाओं को दूर करने में भी सहायक माना गया है। सुहाग की सामग्री दशहरे पर विवाहित महिलाओं को सुहाग की सामग्री जैसे चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, काजल, मेहंदी आदि का दान करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से मां दुर्गा और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इस दान से पारिवारिक जीवन में खुशहाली और वैवाहिक जीवन में स्थिरता आती है। दान करते समय ध्यान रखने योग्य बातें दान हमेशा ब्राह्मणों, साधुओं, या फिर वास्तव में जरूरतमंद लोगों को ही करना चाहिए। इस दिन धारदार वस्तुओं, नुकीली चीजों और चमड़े से बनी वस्तुओं का दान करने से बचना चाहिए क्योंकि इन्हें अशुभ माना गया है। दान हमेशा विनम्र भाव से करना चाहिए। दान देने के बाद उसका दिखावा या घोषणा नहीं करनी चाहिए। दान करते समय मन में अहंकार या घमंड नहीं होना चाहिए।

सरकारी कृषि कॉलेजों में यूजी सीटें खाली, जबलपुर और ग्वालियर में रजिस्ट्रेशन धीमा

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जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर और ग्वालियर में यूजी की सीटों के लिए प्रवेश प्रक्रिया 18 सितंबर से चल रही है, जो आठ अक्टूबर तक चलेगी।प्री एग्रीकल्चर टेस्ट (पीएटी) का रिजल्ट आने के बाद दोनों विवि के 17 सरकारी कालेजों की करीब 1472 सीटों पर प्रवेश दिया जाएगा, लेकिन इस बार एग्रीकल्चर पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की घटती संख्या ने दोनों विवि की चिंता बढ़ा दी है। दरअसल, पहली आनलाइन काउंसलिंग में 1472 सीटों के लिए सिर्फ 2715 विद्यार्थियों ने ही पंजीयन कराया है, जबकि 12 हजार 563 विद्यार्थी पीएटी परीक्षा में सफल रहे। इनमें नौ हजार 848 विद्यार्थी ऐसे हैं, जिन्होंने पीएटी उत्तीर्ण करने के बाद भी काउंसलिंग में भाग नहीं लिया। जबलपुर विवि के जानकार बताते हैं कि प्रदेश के अन्य निजी और आटोनामस कालेजों में बिना पीएटी के प्रवेश दिया जा रहा है। पीएटी उत्तीर्ण करने वाले अधिकांश विद्यार्थियों ने इन कालेजों में प्रवेश ले लिया है। 20 और कॉलेजों में बिना पीएटी के प्रवेश जबलपुर के 12 और ग्वालियर के पांच कृषि कॉलेज हैं, जिनमें प्रवेश के लिए पीएटी परीक्षा अनिवार्य है। यह परीक्षा बीते कुछ वर्षों से लगातार विलंब से हो रही है। इस बार भी जुलाई में यह परीक्षा हुई, जबकि अन्य निजी और ऑटोनॉमस कॉलेजों में समय पर प्रवेश दे दिया गया। अब जल्द ही 20 पारंपरिक शासकीय कॉलेजों में एग्रीकल्चर सिलेबस शुरू करने की तैयारी हो रही है। ऐसे में 2026 में पीएटी में बैठने वालों की संख्या और कम हो जाएगी। पीएटी में शामिल होने वाली विद्यार्थियों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो 2024 में 17304 विद्यार्थियों ने प्री एग्रीकल्चर टेस्ट दिया था, जबकि 2025 में यह संख्या 12563 रही। सरकारी कॉलेज में इसलिए कम प्रवेश प्रदेश के कई निजी और पारंपरिक शिक्षा प्रदान करने वाले शासकीय कॉलेजों में अब कृषि में यूजी कराया जा रहा है। इन कॉलेजों में प्रवेश के लिए पीएटी परीक्षा उत्तीर्ण करना आवश्यक नहीं। बिना पीएटी के सीधे प्रवेश दिया जा रहा है। जबलपुर और ग्वालियर कृषि विवि से संबद्ध सरकारी कॉलेजों में पीएटी परीक्षा में पास होने पर ही प्रवेश दिया जाता है। जबलपुर कृषि विवि में लगातार प्रोफेसरों की कमी हो रही है, लेकिन भर्ती नहीं हो रही। कृषि विवि का बजट न मिलने से भवन और अन्य शिक्षा संबंधित कार्यों में बाधा आ रही है। कृषि विवि की सीटों पर एक नजर जबलपुर कृषि विवि- जबलपुर- 77 रीवा- 77 टीकमगढ़- 77 गंजबसौदा- 77 वारासिवनी- 77 पवारखेड़ा- 77 खुरई सागर- 66 पन्ना- 66 पेमेंट सीट- 201 हार्टिकल्चर- 132 फारेस्ट्री- 28 एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग- 77 ग्वालियर कृषि विवि से संबद्ध- ग्वालियर, इंदौर, सीहोर, खंडवा और मंदसौर की कुल 494 सीटें

नुनहाई का अनोखा दुर्गा उत्सव: मां का श्रृंगार 10 करोड़ के आभूषणों से, विदाई 5 करोड़ के चांदी रथ में

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जबलपुर नुनहाई की दुर्गा प्रतिमा का 10 करोड़ के जेवर से श्रृंगार किया गया है. जिस रथ में माता की विदाई होती है, वह 350 किलो चांदी का बना है, जिसकी बाजार में कीमत 5 करोड़ रुपए से ज्यादा है. जबलपुर के इस क्षेत्र में 157 सालों से दुर्गा उत्सव मनाया जा रहा है. नवरात्रि के दौरान सराफा का यह कारोबारी क्षेत्र 9 दिनों तक माता की भक्ति में डूब जाता है. 157 सालों से बैठा रहे दुर्गा प्रतिमा जबलपुर में दुर्गा उत्सव का इतिहास 150 साल से अधिक पुराना है. सराफा इलाके में रहने वाले विनीत सोनी नुनहाई दुर्गा उत्सव समिति के अध्यक्ष हैं. विनीत बताते हैं कि उनकी दुर्गा उत्सव समिति ने पहली बार मां दुर्गा प्रतिमा की स्थापना 1867 में की थी. तब से यह सिलसिला रुका नहीं है, बीते 157 साल से इसी स्थान पर दुर्गा प्रतिमा की स्थापना की जा रही है. देवरानी-जेठानी माता की प्रतिमा जबलपुर के सराफा इलाके में 2 दुर्गा प्रतिमाएं स्थापित होती हैं. एक सर्राफ की और दूसरी नुनहाई की. यह लगभग एक ही समय शुरू हुई थी. इन दोनों को ही नगर सेठानी कहा जाता है और दोनों में देवरानी-जेठानी का संबंध माना जाता है. इसकी वजह यह है कि सड़क के दोनों तरफ ये प्रतिमाएं बैठाई जा रही हैं. इन दोनों दुर्गा उत्सव की स्थापना लगभग 150 साल पहले ही हुई थी. बुंदेली शैली की प्रतिमा विनीत सोनी ने बताया "दुर्गा उत्सव में अलग-अलग किस्म की प्रतिमाएं रखी जाती हैं, लेकिन उनके नुनहाई वाली माता की प्रतिमा का स्वरूप कभी नहीं बदला. वे हमेशा ही बुंदेली शैली में ही बनाई गई. इस मूर्ति को भी पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही परिवार बनता चला आ रहा है." 10 करोड़ के गहनों से श्रृंगार विनीत सोनी का कहना है कि माता के श्रृंगार में 1 किलो से ज्यादा सोने के गहने चढ़ाए जाते हैं. इसमें बुंदेली शैली के कई ऐसे आभूषण हैं जिनका चलन सालों पहले था. अब इन्हें कोई नहीं पहनता है, लेकिन हम आज भी उन्हीं आभूषणों से माता का श्रृंगार करते हैं. आज सोने के दाम 1 लाख रुपए तोला से ज्यादा है. ऐसी स्थिति में केवल माता का श्रृंगार ही 10 करोड़ रुपए से ज्यादा के जेवर से होता है. 5 करोड़ के रथ से मां की विदाई बात केवल श्रृंगार पर ही खत्म नहीं हो जाती. नुनहाई की माता की विदाई जिस रथ से होती है. उस रथ की कीमत 5 करोड़ रुपये है. इसे 350 किलो चांदी से बनाया गया है. आज चांदी 1 लाख 35 हजार रुपए किलो है, ऐसी स्थिति में इस रथ की कीमत 5 करोड़ रुपए हो जाती है. साल भर यह रथ सुरक्षा में रखा रहता है और अब इसे माता की विदाई के लिए तैयार किया जा रहा है. सुरक्षा में लगे 4 गनमैन यूं तो जिस स्थान पर इस पंडाल की स्थापना की जाती है. वह क्षेत्र सराफा में है. यहां सड़क छोटी है और आसानी से यहां से कोई भाग नहीं सकता, इसके बावजूद माता के पंडाल में सरकार की ओर से पूरे 9 दिन तक चार गनमैन तैनात रहते हैं. आस्था का केंद्र सराफा बाजार 9 दिनों तक लगभग बंद रहता है. दुकानदार दुकान खोलते जरूर हैं, लेकिन ज्यादातर समय वे दुर्गा उत्सव की व्यवस्थाओं में ही लगे रहते हैं. इस क्षेत्र में रहने वाले परिवारों की बेटियां दुर्गा उत्सव में अपने ससुराल से मायके आती हैं. जबलपुर शहर का आम आदमी भी भारी भीड़ के बावजूद यहां दर्शन करने जरूर आता है. रजनी राजपूत ने बताया "यह प्रतिमा बेहद सुंदर है और जिस भावना से इस क्षेत्र के लोग देवी प्रतिमा की स्थापना करते हैं. वह भावना सभी को प्रभावित करती है." बड़ी कृपा है माता की इस क्षेत्र के लोग माता को अपनी बेटी मानते हैं, और इन्हें कंधे पर उठाकर लाते हैं और विदाई भी ऐसी होती है कि देखने वालों की आंखों में आंसू आ जाते हैं. पूरी सड़क पर फूल बिछा दिए जाते हैं और आसपास के हर घर में ऊपर से फूलों की बरसात होती है. 9 दिनों का यह त्यौहार इस कारोबारी इलाके को भक्ति से भर देता है. विनीत सोनी कहते हैं "माता की ही कृपा है कि इस क्षेत्र में लोग खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं."  

1 अक्टूबर से कूनो में चीता सफारी की शुरुआत, खुले जंगल में नजर आएंगे 16 चीते

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श्योपुर  श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में आज एक अक्टूबर पर्यटक चीतों का रोमांच देख सकेंगे। इसी दिन से नेशनल पार्क में चीता सफारी की शुरुआत हो जाएगी। कूनो पार्क में बाड़ों के अतिरिक्त खुले जंगल में 16 चीते विचरण कर रहे हैं। कूनो और मंदसौर जिले के गांधीसागर अभयारण्य में कुल 27 चीते हैं। जिनमें भारत में जन्मे शावक भी शामिल हैं। बता दें कि चीता पुनर्वास परियोजना के तहत 17 सितंबर 2022 को अपने जन्म दिवस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा था। इसके बाद फरवरी 2023 में 12 चीते दक्षिण अफ्रीका से लाकर यहां छोड़े गए थे। वर्तमान में कूनो पार्क में 24 चीते हैं, जिसमें से आठ चीते और शावक बाड़े में हैं। शेष खुले जंगल में हैं जिनका दीदार पर्यटक कर सकेंगे। प्रदेश में चीतों के दूसरे रहवास मंदसौर जिले के गांधीसागर अभयारण्य यहां से भेजे गए तीन चीते बाड़ों में हैं। पर्यटन विभाग पार्क खुलने के बाद यहां कूनो रिट्रीट के आयोजन की भी तैयारी कर रहा है, जिसमें पर्यटकों के लिए रहने व खान-पान सहित कई अतिरिक्त सुविधाएं होंगी। एक अक्टूबर से पर्यटक यहां पहुंचेंगे, इसलिए वन विभाग की ओर से कूनो नेशनल पार्क की वेबसाइट पर भी कूनो सफारी को हाइलाइट किया गया है। हेल्पडेस्क भी बनाई गई है, जिस पर चीतों को लेकर पर्यटकों की जिज्ञासा आ रही है। ऐसे कर सकते हैं बुकिंग कूनो नेशनल पार्क में चीतों समेत अन्य वन्य जीव भी देखने को मिलेंगे। इसके लिए कूनो नेशनल पार्क की वेबसाइट पर जाकर रजिस्ट्रेशन करना होगा। छह लोगों के लिए कूनो में सफारी का शुल्क जिप्सी सहित 4,500 रुपये हैं, वहीं अगर आप अपने वाहन से जा रहे हैं तो 1,200 रुपये ही लगेंगे। पार्क के अहेरा गेट और पीपलवाड़ी गेट से कूनो सफारी के लिए जा सकते हैं। इसी क्षेत्र में चीतों को छोड़ा गया है। उत्तम कुमार शर्मा (सीसीएफ व फील्ड डायरेक्टर कूनो पार्क) के अनुसार, वर्जन कूनो में चीतों को देखने के लिए पर्यटक एक अक्टूबर से आ सकते हैं। प्रबंधन की ओर से तैयारियां की गई हैं। शुल्क कितना होगा? पर्यटन विभाग सफारी के शुभारंभ के साथ ही पर्यटकों के लिए कुनो रिट्रीट का भी आयोजन कर रहा है, जहां आवास, भोजन और अन्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी. सफारी का एक निश्चित शुल्क भी है छह लोगों के लिए जिप्सी की सवारी का शुल्क ₹4,500 है, जबकि निजी वाहन से सफारी का शुल्क केवल ₹1,200 होगा. ऐसे करें ऑनलाइन बुकिंग पर्यटक वेबसाइट पर बुकिंग के लिए रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं. इसके लिए कूनो राष्ट्रीय उद्यान की वेबसाइट पर जाना होगा. वन विभाग ने कूनो राष्ट्रीय उद्यान की वेबसाइट पर कूनो सफारी को भी प्रदर्शित किया है. एक हेल्पडेस्क भी बनाया गया है. आप वहां से अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.  सतपुड़ा के लिए इंतजार कोर जोन 10 अक्र्टूबर तक बंद रहेगा। तेज बारिश से मढ़ई, चूरना की सड़कें खराब हो गई हैं। फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा ने निरीक्षण के बाद यह निर्णय लिया। ऐसे पहुंचें टाइगर रिजर्व/नेशनल पार्क (Tiger reserve in MP) पहुंचने नजदीकी एयरपोर्ट भोपाल, जबलपुर, बनारस, प्रयागराज, नागपुर हैं। रेलवे स्टेशन नर्मदापुरम, शहडोल, सिवनी, दमोह, मंडला फोर्ट, त्यौहारी, मड़वास, नागपुर हैं। ये जानवर देख सकते हैं बाघ, चीते (कूनो में), तेंदुआ, हाथी, बायसन, चीतल, हिरण, बारहसिंघा, गौर, भालू, सांभर, चौसिंगा, चिंकारा के साथ ही विलुप्त प्रजाति के पक्षी भी। 10 टाइगर रिजर्व – संजय दुबरी, सीधी – पन्ना, पन्ना, छतरपुर – सतपुड़ा, नर्मदापुरम – कान्हा, मंडला-बालाघाट – बांधवगढ़, शहडोल – पेंच, सिवनी-छिंदवाड़ा – वीरांगना दुर्गावती, दमोह – डॉ. विष्णु वाकणकर (रातापानी), भोपाल सीहोर, रायसेन – माधव- शिवपुरी – नौरादेही- सागर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व उमरिया जिले के लगभग 1536 वर्ग किमी में फैला है। पार्क प्रबंधन ने सफारी टिकट दर में 10% और गाइड चार्ज में 65% की बढ़ोत्तरी की है। नजदीकी एयरपोर्ट जबलपुर है। निजी वाहन से पहुंच सकते हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन उमरिया है। कान्हा टाइगर रिजर्व मंडला-बालाघाट जिले में लगभग 2,051.74 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। नजदीकी एयरपोर्ट जबलपुर और निकटतम रेलवे स्टेशन चिरईडोंगरी है। पेंच टाइगर रिजर्व कुछ हिस्सा महाराष्ट्र और कुछ मध्यप्रदेश के सिवनी, छिंदवाड़ा जिले से लगा है। यहां ब्लैक पैंथर आकर्षण का केंद्र होता है। हालांकि ये कभी-कभार ही दिखते हैं। प्रदेश के नेशनल पार्क -1- वन विहार, भोपाल -2- कूनो पालपुर, श्योपुर -3- माधव- शिवपुरी -4- कान्हा- मंडला से बालाघाट -5- बांधवगढ़ – उमरिया -6- सतपुड़ा – भोपाल -7- पेंच – सिवनी-छिंदवाड़ा -8- पन्ना – पन्ना -9- डायनासोर जीवाश्म पार्क – धार -10- रानी दुर्गावती- दमोह -11- संजय दुबरी- सीधी-सिंगरौली जंगल या टाइगर सफारी के लिए कैसे करें एडवांस बुकिंग इसके लिए आपको मध्य प्रदेश के वन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट https://forest.mponline.gov.in/ पर जाना होगा या फिर आप अपने पसंदीदा टाइगर रिजर्व या नेशनल पार्क को चुनकर उसकी वेबसाइट पर एडवांस बुकिंग के लिए एप्लाई कर सकते हैं। 

क्या खतरे में है हमारी चाय? असम में क्लाइमेट चेंज की वजह से बागानों में मचा हाहाकार

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नईदिल्ली  असम के चाय बागानों में धूप की तपिश में काम करने वाली मजदूर कामिनी कुरमी सिर पर छाता बांध लेती हैं. इससे हाथ खाली रहते हैं. नाजुक पत्तियां तोड़ना आसान हो जाता है. लेकिन गर्मी इतनी तेज है कि सिर चकराने लगता है और दिल की धड़कन तेज हो जाती है. कामिनी जैसी सैकड़ों महिलाएं अपनी कुशल उंगलियों से चाय की फसल काटती हैं. मशीनें आम फसलों को जल्दी काट लेती हैं, लेकिन चाय के लिए हाथों की जरूरत पड़ती है. क्लाइमेट चेंज से मौसम की मार बढ़ रही है. इससे चाय की फसल सूख रही है.  असम और दार्जिलिंग जैसी मशहूर चाय का भविष्य खतरे में है. दुनिया का चाय व्यापार सालाना 10 अरब डॉलर से ज्यादा का है. टी रिसर्च एसोसिएशन की वैज्ञानिक रूपंजली देब बरुआ कहती हैं कि तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव अब कभी-कभी की बात नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति है. गर्मी और अनियमित बारिश से फसलें कम हो रही हैं.  भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है. लेकिन घरेलू खपत बढ़ने से निर्यात घट रहा है. पिछले साल उत्पादन 7.8% गिरकर 1.3 अरब किलोग्राम रह गया. खासकर असम में भारी नुकसान हुआ. इससे कीमतें 20% बढ़ गईं. औसतन 201.28 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई. 30 साल में चाय की कीमतें सालाना सिर्फ 4.8% बढ़ीं, जबकि गेहूं-चावल की 10%. 40 साल से चाय बागान में काम करने वाली मंजू कुरमी कहती हैं कि पहले 110 किलोग्राम पत्तियां तोड़ लेती थीं. लेकिन अब गर्मी बढ़ने से सिर्फ 60 किलोग्राम ही संभव है. गर्मी से मजदूर थक जाते हैं.  फैक्ट्रियों में पत्तियां सुखाने के दौरान हर 30 मिनट में ब्रेक लेना पड़ता है. पुतली लोहार, जो 12 साल से फैक्ट्री में काम कर रही हैं, कहती हैं कि हम दीवार पर लगे पंखों के नीचे ठंडक लेते हैं. फैक्ट्री में सूखी पत्तियों को बड़े ड्रम में कुचला जाता है. फिर महिलाएं कैप, मास्क और एप्रन पहनकर चेक करती हैं. असम की चाय का सबसे अच्छा हिस्सा दूसरी फ्लश है, जो खुशबू और स्वाद के लिए मशहूर है. लेकिन गर्म लहरें इसे सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं. गर्मी और नमी जरूरी है, लेकिन लंबे सूखे और अचानक भारी बारिश बर्बाद कर देती हैं.  टिनसुकिया जिले के 82 साल पुराने बागान के मालिक मृतुनजय जालान कहते हैं कि ऐसे मौसम से कीट बढ़ते हैं. हमें सिंचाई करनी पड़ती है, जो पहले कम इस्तेमाल होती थी. टी रिसर्च के मुताबिक 1921 से 2024 तक बारिश 250 मिमी कम हुई. न्यूनतम तापमान 1.2 डिग्री बढ़ा. इस मॉनसून में बारिश औसत से 38% कम रही. कीटों से पत्तियां भूरी हो जाती हैं, छेद हो जाते हैं. इससे फसल का समय छोटा हो गया. वरिष्ठ चाय उत्पादक प्रभात बेजबोरुआ कहते हैं कि चाय की कीमतें अब अस्थिर हैं. इस साल सुधार हो रहा, लेकिन अगले साल कम उत्पादन से कीमतें बढ़ेंगी. चाय उद्योग पहले से कर्ज में डूबा है. लागत सालाना 8-9% बढ़ रही – मजदूरी और खाद महंगी. इंडियन टी एसोसिएशन के चेयरमैन हेमंत बंगुर कहते हैं कि पिछले साल सूखे से फसल घटी, तो पेड़ काटे, खाद गड्ढे बनाए और कीटनाशक इस्तेमाल बढ़ाया. इससे खर्च और बढ़ा.  असम में औपनिवेशिक काल के कई पेड़ 40-50 साल पुराने हो चुके. वे कम फलते हैं. मौसम सहन नहीं कर पाते. नए पौधे लगाने के लिए सरकारी मदद कम है. पिछले दशक में घरेलू खपत 23% बढ़कर 1.2 अरब किलोग्राम हो गई. उत्पादन सिर्फ 6.3% बढ़ा. 2024 में भारत का वैश्विक व्यापार हिस्सा 12% था.  निर्यात घट रहा, आयात दोगुना होकर 45.3 मिलियन किलोग्राम पहुंचा. कोलकाता के एक निर्यातक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि भारत में कमी से वैश्विक सप्लाई टाइट हो सकती है. कीमतें बढ़ेंगी. केन्या और श्रीलंका में भी उत्पादन कम हो रहा. 

राजस्थान का नया शैक्षणिक कैलेंडर: 1 अप्रैल से शुरुआत, शिक्षकों को चिंता है तेज़ी से काम निपटाने की

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जयपुर   राजस्थान के शिक्षा महकमे ने आगामी शैक्षणिक सत्र 1 अप्रैल 2026 से शुरू करने का प्रस्ताव रखा है. इससे सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ेगा. प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए स्कूलों के अधिग्रहण से छात्रों की बाधित होने वाली पढ़ाई की भरपाई होगी. साथ ही सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूलों से प्रतिस्पर्धा भी कर पाएंगे. हालांकि, शिक्षक इससे इत्तेफाक नहीं रखते. उनका मानना है कि राजस्थान में 1 अप्रैल से शिक्षा सत्र शुरू करने की कवायत राजस्थान की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से ठीक नहीं है. पहले भी इस तरह के प्रयोग किए गए हैं, जो फेल हुए हैं. मार्च तक परीक्षा और रिजल्ट : शिक्षक संघ शेखावत के प्रदेश अध्यक्ष महावीर सिहाग ने बताया कि 1 अप्रैल से शुरू करने का संदर्भ ही यही है कि परीक्षा और रिजल्ट का काम मार्च तक पूरा करना पड़ेगा, जो संभव नहीं है. इस सत्र में सितंबर खत्म होने को आ गया है, लेकिन अब तक छात्रों को किताबें प्राप्त नहीं हुई हैं और यदि मार्च में सत्र खत्म होगा तो छात्रों तक किताबें पहुंचना भी एक चुनौती होगी. इसलिए सरकार की ये सोच राजस्थान की भौगोलिक दृष्टि के हिसाब से ठीक नहीं है. पहले भी ये अनुभव किया जा चुका है, बावजूद इसके बार-बार प्रयोग करके शिक्षा विभाग को बर्बाद करने का प्रयास किया जा रहा है. ये सरकार को बंद करना चाहिए. कम से कम इस विषय में शिक्षा से जुड़े हुए शिक्षक संगठनों से बातचीत करके कोई निर्णय करना चाहिए. तानाशाही तरीके से जो भी निर्णय लिए जाते हैं, वो कभी भी शिक्षा के लिए फलदाई नहीं रहे और फिर सरकार को बाद में बदलाव करना पड़ता है. किसने क्या कहा, सुनिए. बोर्ड और स्थानीय परीक्षाओं में रखना होगा तारतम्य : हालांकि, शिक्षकों का एक धड़ा इस पहल का स्वागत भी कर रहा है. राजस्थान प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष विपिन प्रकाश शर्मा ने बताया कि राजस्थान में प्राइवेट स्कूल 1 अप्रैल या उससे भी पहले से एडमिशन शुरू कर देते हैं. जबकि सरकारी स्कूल 1 जुलाई से प्रवेश उत्सव शुरू करते हैं. इससे सरकारी स्कूल पीछे रह जाते हैं और नामांकन में संतोषजनक वृद्धि नहीं होती. यदि सत्र 1 अप्रैल से सत्र शुरू होगा, तो सरकारी स्कूलों का नामांकन निश्चित रूप से बढ़ेगा. साथ ही शहरी क्षेत्र में लगभग 35 से 40 दिन प्रतियोगी परीक्षाओं के कारण जो पढ़ाई के दिन कम हो रहे हैं, उनकी भरपाई भी होगी. हालांकि, उन्होंने इसके साथ ही चुनौतियां गिनाते हुए कहा कि विभाग को इसके लिए विशेष तैयारी करनी होगी. सबसे बड़ी चुनौती परीक्षाओं के टाइम टेबल को लेकर रहेगी. बोर्ड और स्थानीय परीक्षाओं को पहले आयोजित करना जरूरी होगा. शिक्षा मंत्री का दावा- छात्रों और अभिभावकों को राहत : हालांकि, शिक्षा मंत्री इस प्रयोग से आश्वस्त हैं. मंत्री मदन दिलावर ने कहा कि ये अभी प्रस्ताव है. अंतिम मोहर लगनी बाकी है, लेकिन यदि सत्र 1 अप्रैल से शुरू होता है तो गरीब बच्चों को भी लाभ मिलेगा और सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ेगा. निजी स्कूल फीस के मामले में कभी-कभी अनुचित तरीके अपनाते हैं. ऐसे में ये नई व्यवस्था अभिभावकों को भी राहत देगी. दिलावर ने ये भी स्पष्ट किया कि ग्रीष्मकालीन अवकाश से पहले एक से डेढ़ महीने की पढ़ाई का टेस्ट लिया जाएगा. विभाग ये सुनिश्चित करेगा कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को उनका कोर्स अप्रैल के पहले सप्ताह में ही मिल जाए, ताकि परीक्षा में छात्र अच्छा प्रदर्शन कर सकें. उन्होंने बताया कि 1 अप्रैल से 15 मई तक शिक्षक घर-घर जाकर एडमिशन लेंगे, जिससे जुलाई में प्रवेश उत्सव की आवश्यकता नहीं होगी. इसके अलावा, ड्रॉपआउट छात्रों को प्रोत्साहित कर उनका भी संबंधित कक्षा में दाखिला कराया जाएगा. शिक्षा विभाग की होगी बड़ी 'परीक्षा' : बहरहाल, 1 अप्रैल से सत्र शुरू होने से कक्षा 1 से 12 तक की परीक्षाएं 31 मार्च तक खत्म कर रिजल्ट जारी करना होगा. अप्रैल के पहले सप्ताह में किताबें, वर्क बुक छात्रों तक पहुंचानी होगी, क्योंकि यदि सामग्री अप्रैल तक नहीं पहुंचती है तो ग्रीष्मावकाश में इसे छात्रों को उपलब्ध कराना आसान नहीं होगा. वहीं, यदि इसे मूर्त रूप मिलता है तो इसका सीधा लाभ सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों और उनके अभिभावकों को मिलेगा.