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Aastha Pandey

Writer News & Blogger

2025 में 67 पत्रकार मारे गए: RSF रिपोर्ट बताती है पत्रकारों पर बढ़ता जोखिम और खतरनाक स्थिति

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दुनिया भर में सच लिखने और लोगों तक हकीकत पहुँचाने की कीमत कई बार जान देकर चुकानी पड़ती है—और यही बात 2025 की आरएसएफ रिपोर्ट एक बार फिर दर्दनाक तरीके से याद दिलाती है। पेरिस से जारी इस ताज़ा रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक साल में 67 पत्रकार अपने काम को निभाते-निभाते मारे गए, जिनमें से ज्यादातर को युद्ध, हिंसा और संगठित अपराध ने निशाना बनाया। आरएसएफ का बयान दिल दहला देने वाला है—“पत्रकार सिर्फ़ मरते नहीं, उन्हें मारा जाता है।” यह वाक्य साफ दिखाता है कि ये मौतें किसी हादसे का परिणाम नहीं बल्कि सच बोलने और सच दिखाने की सज़ा हैं। रिपोर्ट बताती है कि 67 में से 53 पत्रकारों की हत्या युद्ध क्षेत्रों या आपराधिक गिरोहों द्वारा की गई, जो यह साबित करती है कि पत्रकारों के लिए दुनिया पहले से कहीं अधिक खतरनाक हो चुकी है। RSF रिपोर्ट 2025: 67 पत्रकार मारे गए और प्रेस फ़्रीडम ख़तरे में Reporters Without Borders (आरएसएफ) एक अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्र संस्थान है जो प्रेस फ़्रीडम, यानी समाचार के आज़ाद काम, की रक्षा करता है। इसने 2025 के लिए अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी की है जिसमें बताया गया है कि पिछले 12 महीनों में संपूर्ण दुनिया में 67 पत्रकार काम के दौरान मारे गए हैं। ये आंकड़े इस बात को उजागर करते हैं कि पत्रकारों की सुरक्षा आज भी बहुत बड़े खतरे में है और उन्हें सिर्फ़ दुर्घटना में नहीं बल्कि जानबूझकर अपना काम करने के लिए निशाना बनाया जा रहा है। पत्रकारों की हत्या सिर्फ़ एक आक़ड़े की बात नहीं है, बल्कि यह उस मिशन पर हमला भी है जिसके लिए वे जनता को सच बताते हैं। इस रिपोर्ट के मुख्य बिंदु नीचे सरल, आसान और तथ्य-आधारित भाषा में विस्तार से दिए गए हैं: 🔹मुख्य आंकड़े और तथ्य🔹67 पत्रकार मारे गए पिछले एक साल में सभी दुनियाभर में 67 पत्रकारों को उनके काम के कारण मारा गया है। इनमें से अधिकांश पत्रकारों की मौत हिंसा, युद्ध या क्रिमिनल गिरोहों की गतिविधियों के कारण हुई है, न कि किसी सामान्य दुर्घटना से। लगभग 79% हत्याएं सशस्त्र समूहों या संगठित अपराध कारण हुईं।लगभग 43% पत्रकारों को गाज़ा में मौत का सामना करना पड़ा, वहां के संघर्ष के कारण।🔹 सबसे अधिक खतरनाक क्षेत्र और देश🔹 गाज़ा / इज़राइलगाज़ा संघर्ष क्षेत्र दुनिया में सबसे खतरनाक स्थान है, जहाँ 29 से अधिक पत्रकारों की मौत हुई, जो कुल मौतों का लगभग आधा हिस्सा है। ये खबर भी पढ़े….सीएम मोहन यादव के बेटे की शादी में सामाजिक एकता का संदेश 🔹 मैक्सिकोदुनिया में पत्रकारों के लिए दूसरा सबसे खतरनाक देश मैक्सिको है, जहाँ 9 पत्रकारों को संगठित अपराधों ने मारा। 🔹 सूडान और यूक्रेन में संघर्षसूडान और यूक्रेन जैसे युद्धग्रस्त क्षेत्रों में भी पत्रकारों की जानें चली गईं। सूडान में चार और यूक्रेन में कुछ पत्रकार संघर्ष की घटनाओं के कारण मारे गए। 🔹 स्थानीय पत्रकारों को ज्यादा खतरा रिपोर्ट यह भी बताती है कि जिन पत्रकारों को मारा गया, उनमें से केवल दो ही विदेशी पत्रकार थे — बाकी सभी अपने ही देश में स्थानीय पत्रकारों को निशाना बनाया गया। इसका मतलब है कि पत्रकारों को अपने घर की मिट्टी पर भी सुरक्षित नहीं माना जा सकता। ये खबर भी पढ़े….महिलाओं की गरिमा पर कोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब 🔹 503 पत्रकार हिरासत में हैं RSF की रिपोर्ट के अनुसार, एक 1 दिसंबर 2025 तक 503 पत्रकारों को दुनिया भर में हिरासत में लिया गया है। यह संख्या प्रेस की आज़ादी पर बढ़ते दबाव को दर्शाती है। 🔹 चीन में सबसे अधिक 121 पत्रकार जेल में हैं। 🔹 रूस में 48, और🔹 म्यांमार में 47 पत्रकार हिरासत में हैं। इसके अलावा, रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ देशों में पत्रकारों के खिलाफ अविश्वसनीय तरीके से आरोप लगाए जा रहे हैं, जैसे “देशद्रोह”, “गलत सूचना फैलाना” आदि। ये खबर भी पढ़े….धर्मेंद्र का आख़िरी सफर: बॉलीवुड का ‘ही-मैन’ एक युग छोड़कर चला गया 🔹 135 पत्रकार लापता और 20 बंधक रिपोर्ट में यह भी आंकड़ा शामिल है कि लगभग 135 पत्रकार लापता हैं और 20 को बंधक बनाया गया है, जो यह दिखाता है कि संघर्ष और खतरों से पत्रकारों का सामना कितना गंभीर है। 🔹 RSF का संदेश और चेतावनी RSF ने अपनी रिपोर्ट में कहा है:🔹 “पत्रकार सिर्फ़ मरते नहीं — उन्हें मारा जाता है।”यह वाक्य यह स्पष्ट करता है कि पत्रकारों के खिलाफ हिंसा दुर्घटना नहीं बल्कि जानबूझकर की जा रही है। 2025 में पत्रकारों के खिलाफ मुख्य वजहें🔹 युद्ध और संघर्ष युद्ध के समय पत्रकारों को स्थिति रिपोर्ट करने के लिए आगे जाना पड़ता है, जिससे उनकी जान जोखिम में पड़ जाती है। 🔹 संगठित अपराध मैक्सिको और कुछ अन्य देशों में संगठित अपराध पत्रकारों को डराने और रोकने के लिए हिंसा का उपयोग करते हैं। 🔹 राजनैतिक एवं सरकारी दबाव कुछ देशों में पत्रकारों को “गलत सूचना फैलाना” का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया जाता है या प्रताड़ित किया जाता है। 🔹 डाटा से क्या समझें? 📌 यह जरूरी नहीं कि ये आंकड़े हर मौत को शामिल करें; रिपोर्ट केवल उन मौतों को गिनती में लेती है जिन्हें साक्ष्यों के साथ पत्रकारियों के काम से जोड़ा गया है।📌 अलग-अलग संस्थान, जैसे UNESCO या IFJ, उनके आंकड़े थोड़े अलग दे सकते हैं, लेकिन RSF का तरीका पत्रकार के काम से प्रत्यक्ष जुड़े मामलों पर केंद्रित होता है। 🔹 विश्व में प्रेस आज़ादी की स्थिति दुनिया भर में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा, गिरफ्तारी, उत्पीड़न, और लापता होने की घटनाओं ने यह दिखा दिया है कि प्रेस की आज़ादी पर आज भी भारी खतरा मंडरा रहा है। पत्रकार केवल खबरें नहीं लाते — वे सत्य, साक्ष्य और विश्वसनीय जानकारी साझा करते हैं। इसीलिए उनकी सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। 🔹FAQs🔹1. 2025 में कुल कितने पत्रकार मारे गए? 2025 में Reporters Without Borders की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में 67 पत्रकार मारे गए हैं, जो उनके काम या संघर्ष क्षेत्रों में खबर कवर करते समय हुए हमलों का परिणाम है। 🔹3. कितने पत्रकार जेल में हैं और किस देश में सबसे अधिक?RSF के अनुसार 503 पत्रकार दुनिया भर में जेलों में हैं।🔹 चीन में सबसे ज़्यादा 121 पत्रकार जेल में हैं, उसके बाद रूस और म्यांमार का स्थान है।

IndiGo फ्लाइट कैंसिलेशन संकट: क्यों रद्द हो रहीं फ्लाइटें

भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो (IndiGo) पिछले कुछ दिनों से बड़े ऑपरेशनल संकट से जूझ रही है। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि एक ही दिन में 1000 से अधिक उड़ानें रद्द करनी पड़ीं और चार दिनों में यह संख्या 2000 के पार पहुंच गई। लगभग 3 लाख यात्री सीधे तौर पर प्रभावित हुए, जिससे देशभर के एयरपोर्ट्स पर भारी अफरा-तफरी मच गई। यह पूरा संकट आखिर कैसे शुरू हुआ, सरकार ने क्या कदम उठाए और यात्रियों की परेशानी इतनी क्यों बढ़ी—आइए इसे बहुत आसान और साफ भाषा में समझते हैं। IndiGo की 1000+ उड़ानें रद्द – 4 दिन में लाखों यात्री प्रभावित। FDTL नियम, पायलट कमी व DGCA की छूट ने लाया हवाई अराजकता। भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन IndiGo इन दिनों एक बड़े संकट से जूझ रही है। दिसंबर 2025 की शुरुआत में एक ही दिन में 1000 से अधिक उड़ानें रद्द हो गईं। इसके बाद अगले तीन-चार दिन में कुल रद्द उड़ानों की संख्या 2000 के पार चली गई। अनुमान है कि इस दौरान करीब 3 लाख से अधिक यात्री सीधे प्रभावित हुए। Flughorizons पर अफरा-तफरी, टिकट काउंटर पर लंबी कतारें और गुस्साए यात्रियों की तस्वीरें आम हो गईं। इस संकट की जड़ है नया नियम — Flight Duty Time Limitation (FDTL) — जिसे पायलटों की सुरक्षा व थकान कम करने के लिए लागू किया गया था। लेकिन IndiGo ने इस बदलाव के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं की। 🚩 FDTL:नियम तूफान’ खड़ा किया नया FDTL नियम नवंबर 2025 से पूरी तरह लागू हुआ। इसमें पायलटों के काम-आराम समय को बदल दिया गया। पुराने अनुसार 36 घंटे की साप्ताहिक आराम-छुट्टी (weekly rest) अब बढ़ाकर 48 घंटे की गई। रात की उड़ानों व नाइट-लैंडिंग की सीमा भी तय की गई। इसका मकसद पायलटों की थकान कम करना और हवाई यात्रा को सुरक्षित बनाना था। लेकिन इससे इंडिगो जैसे बड़े नेटवर्क वाली एयरलाइन्स के लिए क्रू प्लानिंग मुश्किल हो गई। IndiGo हर दिन करीब 2,200–2,300 उड़ानें संचालित करती है। इतना बड़ा नेटवर्क अगर पायलटों की कमी से चलना हो — तो एक छोटी गड़बड़ी पूरे नेटवर्क को प्रभावित कर सकती है। ये खबर भी पढ़े …सीएम मोहन यादव के बेटे की शादी में सामाजिक एकता का संदेश क्रू कमी व खराब प्लानिंग DGCA (DGCA) की रिपोर्ट कहती है कि नवंबर में IndiGo ने 1,232 उड़ानें रद्द कीं — जिनमें से 755 उड़ानें सिर्फ क्रू / FDTL कारणों से थीं। एयरलाइन ने खुद स्वीकार किया कि उसने नए नियम लागू होने पर “क्रू जरूरत” का सही अनुमान नहीं लगाया। पायलट यूनियन (क्रू एसोसिएशन) ने आरोप लगाया कि IndiGo ने पायलटों की भर्ती रोक दी थी, तनख्वाह स्थिर रखी थी और नॉन-पोचिंग समझौते पर काम कर रही थी — यानी, उनकी कर्मचारी व्यवस्था जानबूझकर पतली थी। इस वजह से, जब FDTL लागू हुआ — पायलटों की संख्या कम पड़ गई, और रात की उड़ानों व शिफ्टों के कारण बहुत सी उड़ानें रद्द हो गईं। ये खबर भी पढ़े …महिलाओं की गरिमा पर कोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब पायलटों की भारी कमी इंडिगो ने खुद माना कि उनके पास कम से कम 200 पायलटों की कमी है।अगर कंपनी ने शुरुआती समय पर भर्ती की होती, तो आज यह संकट नहीं आता। नए पायलटों को भर्ती करने, ट्रेनिंग देने और लाइसेंस जारी करने में 6–8 महीने का समय लगता है। इसलिए अचानक हुए बदलाव ने पूरे सिस्टम को झटका दे दिया। हालत इतनी बिगड़ी एयरपोर्ट पर बैठे हुए यात्रियों की भीड़, टिकट काउंटर पर हंगामा, बोर्डिंग गेट्स पर गुस्से, कई उड़ानें 4–10 घंटे तक लेट हुईं। आमतौर पर जब उड़ानें कम रद्द होती थीं, किराया स्थिर रहता था। लेकिन इस आपदा के बीच कुछ रूट्स पर किराया 4–6 गुना तक बढ़ गया। इससे लोगों को भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ा। कई लोग अपनी यात्रा कैंसिल करके ट्रेन या बस से जाना पड़े; कुछयों को होटल में रात गुजारनी पड़ी। ये खबर भी पढ़े …धर्मेंद्र का आख़िरी सफर: बॉलीवुड का ‘ही-मैन’ एक युग छोड़कर चला गया IndiGo की सफाई DGCA ने FDTL नियम के ‘weekly rest substitution’ वाले प्रावधान को फौरन वापस लिया — यानी अब छुट्टी को रेस्ट न मानने की शर्त हटा दी गई। IndiGo ने कहा है कि वह 8 दिसंबर से अपने ऑपरेशन को नियंत्रित करेगी, और पूरी तरह से 10 फरवरी 2026 तक सामान्य ऑपरेशन बहाल कर देगी। DGCA ने एक जांच समिति बना दी है, ताकि पता चल सके कि गलत योजना थी या शेड्यूल बढ़ा देने की मंशा थी। क्या यह सिर्फ IndiGo की गलती है? कई पायलट संगठन कहते हैं कि ये सिर्फ क्रू कमी नहीं है। सिंक में यह मानना गलत होगा कि FDTL नियम — पायलटों की सेहत के लिए – ही हवाई अराजकता की वजह है। उन्होंने कहा कि दूसरी एयरलाइन्स ने नियमों की तैयारी समय पर कर ली, इसलिए वे प्रभावित नहीं हुईं। कुछ लोग इसे एक तरह का दबाव मानते हैं — कि IndiGo ने जानबूझकर किरायों और शेड्यूल का हाल खराब करके नियमों की ढील दिलाई हो। हालांकि यह आरोप है, पर यात्रियों की असुविधा सच थी। अब आगे क्या होगा ? IndiGo कह रही है कि 10 फरवरी 2026 तक सब सामान्य हो जाएगा — यानी नए पायलटों की भर्ती, शेड्यूल में कटौती, और बेहतर क्रू प्रबंधन। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पायलट भर्ती, ट्रेनिंग, रेस्ट-शेड्यूल, और चार्टर्ड फ्लाइट नेटवर्क पर अच्छी प्लानिंग नहीं हुई -तो फिर से ऐसा संकट दोबारा हो सकता है। सरकार और DGCA को अब सुनिश्चित करना होगा कि यात्रियों का भरोसा बहाल हो, फीस-नियंत्रण हो और एयरलाइन्स भविष्य के लिए सुरक्षित व टिकाऊ योजना बनाएं। यह संकट सिर्फ एक एयरलाइन या एक नियम का नहीं है — यह पूरी इंडस्ट्री, योजना, सुरक्षा, जहाज़ी कर्मचारियों और यात्रियों के विश्वास का मसला है। जहाँ पायलटों की थकान कम करना ज़रूरी है, वहीं यात्रियों को सुविधा व भरोसे की गारंटी भी चाहिए। IndiGo की यह चूक, DGCA की ढील, और यात्रियों की पीड़ा — यह सब हमें याद दिलाता है कि वायु-यात्री व्यवस्था में संतुलन बहुत नाज़ुक है। उम्मीद है कि आगे से बेहतर तैयारी होगी; ऐसी स्थिति फिर नहीं आएगी; और यात्रियों को भरोसा मिलेगा कि उनका सफर आरामदायक, सुरक्षित व विश्वसनीय रहेगा। FAQs … Read more

आधार अब जन्म तिथि प्रमाण नहीं रहेगा — यूपी सरकार ने फैसला किया

Adhaar

उत्तर प्रदेश सरकार (UP Government) ने 28 नवम्बर 2025 को आदेश जारी किया है कि आधार कार्ड को अब जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate) या जन्म-तिथि (Date of Birth / DOB) का वैध सबूत नहीं माना जाएगा। इस निर्देश में कहा गया है कि राज्य के सभी विभाग आधार को DOB प्रूफ के तौर पर स्वीकार न करें। ऐसा क्यों किया? — वजहें और तर्क UIDAI (Unique Identification Authority of India) ने 31 अक्टूबर 2025 को स्पष्ट किया था कि Aadhaar में दर्ज जन्म-तिथि (DOB) स्वतंत्र रूप से सत्यापित (verified) नहीं होती। मतलब, आधार बनवाते समय जन्म प्रमाण पत्र या स्कूल रिकॉर्ड साथ में नहीं दिए होते। इसलिए उस तारीख को “जन्म की सच्ची तिथि” के तौर पर नहीं माना जा सकता। पहले भी EPFO ने लिया था ऐसा कदम दरअसल, केंद्र सरकार के निकाय EPFO (Employees’ Provident Fund Organisation) ने 2024 में ही आधार को DOB प्रूफ की सूची से हटा दिया था। उन्हें भी UIDAI का निर्देश मिला था। इसलिए ये नया फैसला पहले से जारी गाइडलाइन का स्वागत योग्य विस्तार है। फर्जी दस्तावेज़ों और घुसपैठ की समस्या सरकार ने कहा है कि कई मामले ऐसे आए हैं जहाँ आधार के आधार पर गलत जन्म-तिथि दर्ज कर दी जाती थी। इससे सरकारी सेवाओं, पेंशन, नौकरी, स्कूल प्रवेश आदि में दुरुपयोग हो रहा था। इसलिए DOB प्रूफ मानकों को सख्त करना ज़रूरी था। अब कौन-कौन से दस्तावेज़ मान्य होंगे? अब अगर किसी को अपनी जन्म-तिथि प्रमाणित करनी है, तो केवल आधार पर्याप्त नहीं रहेगी। सरकार ने कहा है कि निम्न दस्तावेज़ वैध माने जाएंगे: नगर निगम / रजिस्टार द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate) स्कूल/बोर्ड मार्कशीट या स्कूल छोड़ने का प्रमाण (जिसमें जन्म-तिथि दर्ज हो) पासपोर्ट, PAN, पेंशन आदेश, या अन्य सरकारी सेवा रिकॉर्ड जिसमें जन्म-तिथि हो अन्य वैध सरकारी प्रमाणपत्र जिनमें जन्म-तिथि दर्ज हो इसलिए जिनके पास उपरोक्त में से कोई दस्तावेज़ नहीं है, उन्हें नया जन्म प्रमाण पत्र बनवाना पड़ सकता है। आम नागरिकों पर असर — क्या करना चाहिए? जिनके पास सिर्फ आधार  है, उन्हें अब Birth Certificate या स्कूल-मार्कशीट आदि तैयार रखना होगा। किसी सरकारी नौकरी, शिक्षा प्रवेश, पेंशन, पासपोर्ट आदि कार्यों के लिए Aadhaar अकेला प्रूफ नहीं चलेगा। यदि आपके पास Birth Certificate पहले से है, तो डॉक्यूमेंट तैयार रखें — कोई परेशानी नहीं होगी। जिनके पास ठीक Birth Certificate नहीं है — अपने क्षेत्र के RBD (Registrar of Births and Deaths) कार्यालय से आवेदन करें। यह फैसला क्यों ज़रूरी था? आधार  पहले से ही “पहचान और पते” के लिए था, न कि “जन्म तिथि” के लिए। UIDAI की 2018 व 2025 की सफाई इसी धारणा पर आधारित है। कई लोग falsas उम्र या गलत दस्तावेजों का प्रयोग कर लाभ उठा लेते थे — इसके खिलाफ यह कदम सुरक्षा और प्रमाणिकता दोनों के लिए जरूरी था। सरकारी प्रक्रियाओं, भर्ती, योजना लाभ, पेंशन, शैक्षणिक प्रवेश आदि में DOB की प्रमाणिकता आवश्यक होती है। इसलिए DOB प्रूफ पर सख्ती जनता और सरकार दोनों के हित में है। यह बदलाव सिर्फ यूपी में क्यों? और क्या अन्य राज्य भी ऐसा करेंगे? फिलहाल इस निर्देश को उत्तर प्रदेश (UP) ने जारी किया है। पहले से ही EPFO ने आधार DOB प्रूफ हटाया है। इससे स्पष्ट है कि देश में आधार की भूमिका सिर्फ पहचान तक सीमित हो जाएगी — अन्य सरकारी दस्तावेज़ों के संदर्भ में DOB के लिए Birth Certificate या अन्य वैध प्रूफ मांगे जाएंगे। भविष्य में अन्य राज्यों द्वारा भी ऐसा ही आदेश आ सकता है — इसलिए नागरिकों को पहले से ही अपने प्रूफ तैयार रखने में ही भलाई है। अगर आपके पास केवल आधार है — तो जल्दी Birth Certificate या वैध डॉक्यूमेंट बनवाएं, ताकि भविष्य में सरकारी काम में दिक्कत न हो। सरकार और UIDAI का मकसद साफ है -दस्तावेजों की प्रमाणिकता, धोखाधड़ी से बचाव, और साफ प्रशासन।  FAQs प्रश्न 1: क्या आधार पूरी तरह अमान्य हो गया है? उत्तर: नहीं। आधार अभी भी पहचान (identity) और पते (address) के लिए वैध है। सिर्फ जन्म-तिथि (DOB) या बर्थ सर्टिफिकेट के रूप में अब स्वीकार नहीं होगा। प्रश्न 2: अगर मेरे पास स्कूल मार्कशीट या पासपोर्ट नहीं है, तो मैं क्या करूं? उत्तर: आप अपने क्षेत्र के Birth & Death Registrar office से जन्म प्रमाण पत्र बनवा सकते हैं। ऐसा करना बेहतर रहेगा। प्रश्न 3: क्या यह फैसला सिर्फ उत्तर प्रदेश के लिए है? उत्तर: अभी हाँ — उत्तर प्रदेश सरकार ने यह आदेश दिया है। लेकिन EPFO जैसे राष्ट्रीय निकाय पहले ही ऐसा कर चुके हैं। इसलिए अन्य राज्यों में भी समान नियम लागू हो सकते हैं। :

62 की उम्र में ऑस्ट्रेलियाई पीएम ने रचाई शादी, जानें Jodie Haydon कौन हैं

Shadi

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज (62) ने 29 नवंबर 2025 को अपनी लंबे समय से साथी रही जोडी हेडन (46) से शादी की वो पहले प्रधानमंत्री बने जिन्होंने कार्यकाल के दौरान शादी की; उनकी प्रेम-कहानी, निजी समारोह और शादी की ख़ास बातें अब सामने आई हैं। इन दोनों के उम्र में 16 साल का अतंर है। ◆ ऐतिहासिक शादी  क्यों खास है? ये खबर भी पढ़े…सीएम मोहन यादव के बेटे की शादी में सामाजिक एकता का संदेश ◆ समारोह और शादी की बातें ये खबर भी पढ़े…महिलाओं की गरिमा पर कोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब ◆ प्रेम कहानी: कैसे शुरू हुई थी? ये खबर भी पढ़े…Central Board of Secondary Education (CBSE) 10वीं दो-सेशन पर ◆ निजी जीवन और पहले परिवार की जानकारी  FAQs Q1: कौन हैं जोडी हेडन — प्रधानमंत्री की नई दुल्हन?उत्तर: जोडी हेडन एक अनुभवी वित्तीय / सुपरएनेशन (retirement savings/ fund) पेशेवर रही हैं। उनकी पर्सनल लाइफ आलोचना/सरकारी दबाव में नहीं रही, और उन्होंने निजी तौर पर 2020 में अल्बानीज से मुलाक़ात की थी। उन्होंने बाद में सोशल मीडिया के जरिये उनसे संपर्क किया। 2024 में दोनों की सगाई हुई, और 2025 में शादी हुई। Q2: शादी किस तरह हुई — क्या यह सार्वजनिक समारोह था या निजी?उत्तर: यह शादी एक बहुत निजी, गोपनीय समारोह थी — सिर्फ करीबी परिवार, दोस्त और कुछ मंत्री उपस्थित थे। समारोह स्थान था प्रधानमंत्री का सरकारी निवास The Lodge, लेकिन शादी-व्यवस्था और खर्च दोनों दम्पति ने निजी रूप से किए थे। मीडिया को तब तक जानकारी नहीं दी गई थी जब तक शादी पूरी न हो गई थी। Q3: क्या यह पहली बार है कि ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ऑफिस में रहते हुए शादी कर रहे हैं?उत्तर: हाँ। 29 नवंबर 2025 की यह शादी इतिहास रचने वाली रही: एंथनी अल्बानीज बने पहले ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जिन्होंने अपने पदकाल के दौरान विवाह किया।

दिमाग की परिपक्वता, 30s डेटिंग और असली रिश्तों की चुनौतियाँ

Relenshanship

कई बार लोग यह मानते हैं कि 25–26 की उम्र तक दिमाग पूरी तरह परिपक्व हो जाता है, लेकिन कैंब्रिज विश्वविद्यालय की एक रिसर्च इस सोच को पूरी तरह बदल देती है। अध्ययन के अनुसार, मानव मस्तिष्क लगभग 32 साल की उम्र तक पूरी तरह मैच्योर नहीं होता। यही वजह है कि अपने 30s तक पहुँचने के बावजूद कई लोग रिश्तों में स्थिरता, समझ-बूझ और भावनात्मक संतुलन को लेकर संघर्ष करते दिखाई देते हैं। खासतौर पर डेटिंग के मामले में यह अधूरी परिपक्वता गलत फैसलों, जल्दी-बाज़ी में बने रिश्तों और अपेक्षाओं के टकराव का कारण बन सकती है। यह शोध बताता है कि उम्र बढ़ने और मानसिक परिपक्वता का सफर हमेशा एक जैसा नहीं होता, और रिश्तों में सफलता काफी हद तक दिमाग की तैयारियों पर निर्भर करती है। मस्तिष्क 32 तक परिपक्व क्यों नहीं होता और क्यों रिश्तों में 30s पुरुष अस्थिर दिखते । एक नई रिसर्च हाल ही में University of Cambridge की एक बड़ी रिसर्च में पाया गया है कि मानव मस्तिष्क जीवन भर एक समान नहीं रहता। वैसे जो हम सोचते थे — कि किशोरावस्था (teens) में खत्म हो जाती है — वो सही नहीं। अध्ययन में MRI‑scan के डेटा लिए गए — करीब 3,800 लोगों की उम्र 0 से 90 साल तक थी। इसके मुताबिक मानव जीवन में पाँच “दिमागी युग (brain‑epochs)” आते हैं: बचपन (birth–9), किशोरावस्था (9–32), व्यस्कता (32–66), प्रारंभिक बुढ़ापा (66–83), और बुढ़ापे का अगला चरण (83+)। यानी कि 32 साल की उम्र तक हमारे दिमाग के तार (neural wiring) पूरी तरह से स्थिर नहीं होते। 32 के बाद ही मस्तिष्क “पूर्ण वयस्कता (adult mode)” में आता है। नतीजा: जो व्यक्ति 30 के आसपास है — उससे हम उम्मीद कर सकते हैं कि उम्र कम है लेकिन दिमाग अभी “लोडिंग” में हो सकता है। ये खबर भी पढ़े…सीएम मोहन यादव के बेटे की शादी में सामाजिक एकता का संदेश क्यों अक्सर रिश्ता आगे नहीं बढ़ पाता? कई महिलाएँ बताती हैं कि 30 वर्ष की उम्र का पुरुष डेटिंग में शुरुआती उत्साह तो दिखाता है — बातें होती हैं, प्यार‑मोहब्बत, बड़े सपने, “सीरियस” होने की बातें। लेकिन महीनों बाद अचानक बातें ठंडा हो जाती हैं, प्रतिक्रिया बंद हो जाती है, जब रिश्ते में असली जिम्मेदारी, संवेदनशीलता, भावनात्मक जुड़ाव की बात आती है। ये खबर भी पढ़े…धर्मेंद्र का आख़िरी सफर: बॉलीवुड का ‘ही-मैन’ एक युग छोड़कर चला गया ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि: दिमाग अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं हुआ — “white‑matter connectivity” यानी दिमाग के तार ठीक से मजबूत नहीं हुए। “परिपक्वता (emotional maturity)” अभी पूरी तरह नहीं आई है — इसलिए संबंधों में समझ, भरोसा, स्थिरता की कमी रह जाती है। समाज और परवरिश की वजह से पुरुषों को “भावनाओं को दबाए रखना” सिखाया जाता है; खुल कर बात करना, संवेदनशीलता दिखाना उनके लिए कठिन हो सकता है। रीसनिंग कोच और रिश्तों पर सलाह देने वाले लोग भी कहते हैं कि कई बार पुरुष भावनात्मक रूप से “लोडिंग मोड” में ही रहते हैं — जबकि बहनियां रिश्ते से स्थिरता और भावनात्मक जुड़ाव चाहती हैं। इसलिए, कई महिलाओं का अनुभव ऐसा होता है कि पहली‑दूसरी डेट तो ठीक रहती है — लेकिन तीसरी‑चौथी डेट के बाद पुरुष गायब हो जाते हैं, बातचीत बंद कर देते हैं, या फिर commitment से भागने लगते हैं। ये खबर भी पढ़े…महिलाओं की गरिमा पर कोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब कुछ असली अनुभव — 30s में रिश्तों की जद्दोजहद एक महिला कहती हैं कि तीन साल तक उन्होंने डेट किया — पर अंत में उन्हें सिर्फ “थोड़ी उत्सुकता” और “लंबी चुप्पी” मिली। दूसरी ओलivia कहती थीं कि 30s का पुरुष शायद परिपक्व लगे, पर बाद में अचानक गायब हो गया — बिना किसी सफाई के। एक तीसरी महिला बताती हैं कि शुरू में सब ठीक था, फिर वह कहने लगी कि मैं ड्रग्स नहीं लेती — और फिर रिश्ते से दूरी बन गई। कुछ पुरुष बिना किसी वजह “संभालना हमसे बेहतर नहीं” कहना शुरू कर देते हैं — जैसे उन्हें रिश्तों की जिम्मेदारी नहीं लेनी है। ये कहानियां इसलिए इतनी आम हो गई हैं क्योंकि — अब ‌वैज्ञानिक आधार भी मिल गया है — कि दिमाग 32 साल तक पूरी तरह mature नहीं होता, और emotional maturity में देरी हो सकती है। दिमाग की परिपक्वता शोध के अनुसार, बचपन में दिमाग सीखने, synapses (तारों) बनाने, pruning (अनावश्यक तार हटाने) का दौर होता है। किशोर व 20s में दिमाग तेजी से बदलता रहता है — नए neural connections बनते हैं, white‑matter बढ़ती है, लेकिन wiring पूरी तरह स्थिर नहीं होती। 32 के आसपास ही दिमाग मुख्यतः स्थिर होता है — इस उम्र के बाद neural wiring में बड़े बदलाव नहीं आते, और मस्तिष्क “adult mode” में आता है। भावनात्मक और सामाजिक परिपक्वता की देरी इसका मतलब यह नहीं कि 25‑30 की उम्र के लोग बेअक्ल या बुरे होते हैं। लेकिन दिमाग की wiring अधूरी होती है: ये लोग impulsive decisions ले सकते हैं। भावनाओं को व्यक्त करना या समझना उनके लिए आसान नहीं होता। रिश्तों में भरोसा, स्थिरता, समझ, संवेदनशीलता, जो जरूरी है – वो कमज़ोर हो सकती है।इस वजह से, कई महिलाएं महसूस करती हैं कि 30s के पुरुष “भावनात्मक रूप से अधूरे” से हैं, और commitment से भागते हैं। क्या मतलब है — “बचपन चलता 32 तक”? जिस उम्र में हम सोचते थे कि आदमी जवान हो गया -दिमाग का wiring उस उम्र तक mature नहीं होता।इसलिए यह जरूरी है कि हम रिश्तों में “उम्र” से ज़्यादा “परिपक्वता” पर ध्यान दें। अगर आप डेट कर रहे हैं, तो शुरुआत में ही यह समझ लें कि सिर्फ उम्र से तय नहीं होता कि व्यक्ति emotionally ready है या नहीं। समय, व्यवहार, consistency और संवाद देखना चाहिए। Q1: क्या सच में दिमाग 32 साल तक पूरी तरह परिपक्व नहीं होता?हाँ – हालिया रिसर्च के अनुसार, दिमाग 5 अलग‑अलग developmental phases से गुजरता है। किशोरावस्था (adolescence) 9 साल से शुरू होती है और लगभग 32 साल तक चलती है। 32 के बाद ही brain wiring स्थिर होती है। Q2: 30s में होने वाली डेटिंग का ये मतलब है कि पुरुष immature है?हर 30 साल का पुरुष immature नहीं होता। लेकिन wiring की वजह से कई लोग emotional maturity late … Read more

सीएम मोहन यादव के बेटे की शादी में सामाजिक एकता का संदेश

Mohan yadav

उज्जैन: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने छोटे पुत्र डॉ. अभिमन्यु यादव की शादी को एक यादगार और सादगी भरे अंदाज़ में आयोजित किया। शिप्रा तट पर आयोजित इस अनोखे सामूहिक विवाह सम्मेलन में 22 जोड़ों ने एक साथ सात फेरे लिए। न कोई भव्य सजावट, न वीआईपी स्टेज—फिर भी यह समारोह सामाजिक समरसता और सादगी का शानदार संदेश बन गया। योग गुरु बाबा रामदेव ने वैदिक रीति से मंत्र पढ़कर जोड़ों का मंगल किया, जबकि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और जूना अखाड़ा के संतों ने सभी जोड़ों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। यह आयोजन न केवल सीएम परिवार की सरलता को दर्शाता है, बल्कि देश में सामूहिक विवाह की परंपरा को भी नया आयाम देता है। मध्य प्रदेश में सामूहिक विवाह: CM बेटे की शादी बनी मिसालएक समारोह, 22 जोड़े — सादगी, समरसता और संस्कार उज्जैन (Sanwarkhedi) — 30 नवंबर 2025 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री Mohan Yadav के पुत्र Abhimanyu Yadav ने अपनी प्रेमिका Ishita Patel के साथ सात फेरे लिए। लेकिन यह शादी सामान्य नहीं थी। उनके साथ 21 अन्य जोड़ों ने भी एक साथ विवाह किया — यानी कुल 22 दूल्हा-दुल्हन एक ही सामूहिक विवाह समारोह में परिणय सूत्र में बंधे। इस प्रकार का समूहीकरण — जहां दिखावे और भारी खर्च के बजाय सादगी और सामाजिक समरसता पर जोर हो — आज के समय में बेहद चर्चा का विषय बन गया है। ये खबर भी पढ़े…महिलाओं की गरिमा पर कोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब समारोह का स्वरूप: दिखावे नहीं, सबका साथ विवाह स्थल सांवराखेड़ी के शिप्रा नदी किनारे सजाया गया। बारात में दूल्हे घोड़ों पर सवार हुए, जबकि दुल्हनें सज-धजकर बग्घियों में आईं। समारोह आयोजन बेहद व्यवस्थित था — 22 मंडप बनाए गए, ग्रीन रूम, अतिथि व्यवस्था व अन्य सुविधाएं पूरी की गई थीं। शादी के निमंत्रण कार्ड में मेहमानों से आग्रह किया गया था कि वे कोई उपहार न लाएँ — एक साफ संदेश कि शादियों में दिखावा नहीं, संवेदनशीलता व सामूहिकता होनी चाहिए। CM ने कहा कि यह कदम ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना का प्रतीक है। उनका मानना है कि इससे गरीब और जरूरतमंद परिवारों की बेटियों को भी सम्मानजनक विवाह का अवसर मिले। ये खबर भी पढ़े…धर्मेंद्र का आख़िरी सफर: बॉलीवुड का ‘ही-मैन’ एक युग छोड़कर चला गया गणमान्य अतिथि और सामाजिक संदेश इस समारोह में उपस्थित थे — योग गुरु Baba Ramdev जिन्होंने पूरी रस्में करवाईं, और धर्मगुरु Dhirendra Shastri भी मौजूद थे। दोनों ने इस पहल की सराहना की और इसे समाज में wasteful expenditure (अनावश्यक खर्च) को रोकने व सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने वाला कदम बताया। राज्य के राज्यपाल Mangubhai Patel ने भी CM की इस सोच को सराहा और कहा कि सामूहिक विवाह समाज में भाई-चारे व समानता का संदेश देता है। बहुत से दूल्हा-दुल्हन — जिनके परिवार आर्थिक रूप से बहुत मजबूत नहीं थे — अब बिना भारी खर्च के, सम्मान और गरिमा के साथ अपना गृहस्थ जीवन शुरू करेंगे। उन्होंने बताया कि वे इस पहल से बहुत खुश हैं। ये खबर भी पढ़े…Central Board of Secondary Education (CBSE) 10वीं दो-सेशन परीक्षा: पूरी जानकारी क्यों है यह विवाह अलग और महत्वपूर्णशादी में दिखावे से बचाव: कोई महंगा होटल, कोई भव्य सजावट नहीं। सादगी का संदेश: न्यूनतम खर्च और सादे निमंत्रण कार्ड — पारिवारिक और सामाजिक बोझ को कम करना। सर्वसमावेशिता: 22 जोड़ें, अलग-अलग पृष्ठभूमि — यह दिखाता है कि विवाह सिर्फ परिवार नहीं, समाज भी है। समरसता और आर्थिक न्याय: आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों को सम्मान के साथ विवाह — यह सामाजिक जिम्मेदारी है। CM ने खुद कहा कि “बड़ा नहीं, छोटा नहीं; सब बराबर हैं। मेरे बेटे की शादी हो रही है, लेकिन 21 और जोड़ों की भी नई जिंदगी शुरुआत हो रही है।” सामाजिक ओर राजनीतिक प्रतिक्रिया कई लोग कह रहे हैं कि यह पहल भविष्य में अन्य राजनेताओं और बड़े परिवारों के लिए मिसाल बनेगी। धार्मिक और सामाजिक गुरु भी इस तरह की सामूहिक विवाह सभाओं को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं — इससे समाज में wasteful expenditure कम होगा और विवाह समारोहों का असली मकसद — जोड़ना, आशीर्वाद, नए जीवन की शुरुआत — सामने आएगा। विपक्षी दलों में भी इस फैसले की सराहना हुई है कि एक राजनीतिक परिवार ने निजी दिखावे से हटकर आम जनता, गरीबों और समाज को प्राथमिकता दी है। इस सामूहिक विवाह समारोह ने ये साबित कर दिया कि शादी महज एक परिवार का निजी पर्व नहीं, बल्कि समाज का उत्सव हो सकता है। जब एक मुख्यमंत्री अपने बेटे की शादी में ऐसा उदाहरण पेश करता है, तो निश्चित रूप से आगे कई लोग इसे अपनाएंगे। यह दिखावा नहीं, संवेदनशीलता, व्यर्थ खर्च नहीं, सामूहिक खुशी — इस तरह की सोच समाज में स्थायी परिवर्तन ला सकती है। FAQs Q1: यह सामूहिक विवाह क्यों किया गया?A: इस विवाह को सामूहिक रूप से इसलिए आयोजित किया गया ताकि दिखावे (lavish weddings) से बचा जा सके और गरीब-जरूरतमंद परिवारों की बेटियों को भी सम्मानजनक विवाह मिल सके। इससे शादी में होने वाले व्यर्थ खर्च और सामाजिक असमानता दोनों कम होती है। Q2: इस विवाह में कितने जोड़ें शामिल हुए?A: मुख्यमंत्री के बेटे सहित कुल 22 जोड़ें — यानी 1 दूल्हा-दुल्हन + 21 अन्य जोड़े — एक ही समारोह में विवाह के बंधन में बंधे। Q3: इसमें कौन-कौन शामिल हुआ — साधु-महात्मा, राजनीतिक शख्सियतें, आम लोग?A: समारोह में योग गुरु बाबा रामदेव, धर्मगुरु धीरेंद्र शास्त्री, राज्यपाल, कई मंत्री, विधायक आदि प्रमुख लोगों के साथ साथ 21 सामान्य जोड़े भी शामिल थे। यह शादी राजनीति, धर्म और समाज के तेनातंत्र को एकत्रित करने वाला उदाहरण बनी।

ऑक्सफोर्ड डिबेट विवाद: पाकिस्तान झूठ बोला, भारत ने पोल खोली

Pakistan

भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव भले ही नया नहीं है, लेकिन ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनियन डिबेट में जो हुआ, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया। यह बहस भारत-पाक नीति पर होने वाली थी, जिसमें दोनों देशों के वक्ताओं को अपने पक्ष रखने थे। भारत से एडवोकेट जे साई दीपक, एक्टिविस्ट मनु खजूरिया और पंडित सतीश के शर्मा शामिल होने पहुंचे थे। लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से कुछ घंटे पहले ही जानकारी मिली कि पाकिस्तानी पक्ष बहस में आने से पीछे हट गया है। 🇮🇳 क्या हुआ — असली मामला एक बहुप्रतीक्षित डिबेट थी — ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन में, जिस विषय पर बहस होनी थी: “This House Believes India’s Policy Towards Pakistan Is a Populist Strategy Sold as Security Policy”पाकिस्तान की तरफ से वक्ता रहने वाले थे: पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर, पूर्व सेना जनरल ज़ुबैर महमूद हयात और ब्रिटेन में पाकिस्तान के राजदूत मोहम्मद फैसल — ये पहले ही लंदन पहुंचे हुए थे। भारत की ओर से मूल वक्ता थे: पूर्व सेना प्रमुख M.M. Naravane (सेवानिवृत्त), पूर्व कानून मंत्री व सांसद सुब्रमनियन स्वामी, और पूर्व राज्य मंत्री व नेता सचिन पायलट — लेकिन ये तीनों आखिरी समय पर उपलब्ध नहीं रहे। भारत-पक्ष की ओर से J Sai Deepak थे, जिनके अनुसार उन्होंने पहले से तैयारियों की पुष्टि कर रखी थी। बाद में, नियत वक्ताओं के न होने पर उन्होंने ब्रिटेन में रह रहे अन्य व्यक्तियों — Manu Khajuria व Satish K Sharma — को विकल्प के रूप में शामिल कराया। ये खबर भी पढ़े…UIDAI: 2 करोड़ से अधिक आधार नंबर बंद, पोर्टल पर दी गई यह सुविधा भी 🛑 विवाद कैसे शुरू हुआ डिबेट से ठीक कुछ घंटे पहले ही आयोजकों यानी Oxford Union के अध्यक्ष Moosa Harraj (जो पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री के बेटे बताए गए हैं) ने J Sai Deepak को कह दिया कि पाकिस्तान की टीम लंदन नहीं पहुंची है — इसलिए डिबेट रद्द करनी पड़ी। लेकिन इसके ठीक बाद यह जानकारी मिली कि पाकिस्तान की टीम असल में लंदन में थी और होटल में रुकी थी — यानी उनकी अनुपस्थिति के दावे में गड़बड़ी थी। भारत की ओर से यह वादा था कि अगर समय रहते स्पीकर उपलब्ध न हो सके, तो दूसरा पैनल भेजा जाएगा — लेकिन आयोजकों ने वो प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। इस वजह से British-based भारतीय नागरिक (Manu Khajuria, Satish K Sharma) की अनुमति देने में भी आनाकानी हुई ये खबर भी पढ़े…IFFI Award: जापानी ‘ए पेल व्यू ऑफ हिल्स’, इफ्फी प्रेमियों ने लिया आनंद 🇵🇰 पाकिस्तान का दावा और भारत की प्रतिक्रिया पाकिस्तान हायर कमीशन लंदन ने सार्वजनिक रूप से कहा कि “भारतीय वक्ताओं ने आखिरी समय पर बहस से पीछे हटने का फैसला किया”। इस दावे ने पाकिस्तान को वॉकओवर जीत का हवाला दिया। इसके जवाब में J Sai Deepak ने कहा कि भारत की टीम तैयार थी, और बहस रद्द होना असल में पाकिस्तान की टीम की अनुपस्थिति व आयोजन प्रबंधन की असफलता का परिणाम था। उन्होंने ईमेल और कॉल-लॉग्स सार्वजनिक कर दिए। Deepak ने कहा: “अगर पाकिस्तान वालों में हिम्मत है, तो अब वे सीधे भाजपा, मीडिया या सोशल-मीडिया के मंच की बजाय वही मंच चुनें जहाँ मुद्दे पर खुलकर बहस हो सके।” कुछ दक्षिण एशियाई और ब्रिटिश मीडिया तथा आकलनकर्ता भी इस पूरे नाटक को “स्टंट” या “ड्रामा” कह रहे हैं — उनका कहना है कि शुरुआत से ही यह बहस एक असली बहस नहीं थी, बल्कि एक प्रचार-प्रयोग था। ये खबर भी पढ़े…Assam Anti Polygamy Bill 2025: बहुविवाह पर सख़्त रोक: असम में बिल को मंजूरी 🎯 इस घटना का मतलब क्या है यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, जहाँ अकादमिक मंचों और डिबेट सोसायटीज़ की प्रतिष्ठा होती है, वे भी राजनीतिक एजेंडा, दावे और प्रचार के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच अब सिर्फ बॉर्डर या नीति का विवाद नहीं है; बहस की तक़ाज़ा, सार्वजनिक बाहस और छवि-प्रबंधन की जंग भी अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँच गई है। जो देश या पक्ष खुलकर बहस से भागता दिखे — उसकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आती है। इस मामले में, पाकिस्तान की ओर से पहले दावे, फिर उनके असत्य साबित होने से, बहस के महत्व और तर्क-वाद की जगह प्रचार की प्राथमिकता उजागर हुई। FAQs Q1: यह डिबेट आखिर किन राज्यों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के बीच तय थी?इस डिबेट में पाकिस्तान की ओर थे पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर, पूर्व जनरल जुबैर महमूद हयात और यूके में पाकिस्तानी राजदूत मोहम्मद फैसल। वहीं भारत की ओर मूल वक्ता थे पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे, पूर्व मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी और सचिन पायलट। बाद में जब ये तीनों उपलब्ध नहीं हुए, तो भारत-पक्ष ने अन्य वक्ताओं (Manu Khajuria, Satish K Sharma) को प्रस्तावित किया। Q2: डिबेट रद्द क्यों हुई — पाकिस्तान के न पहुँचने की वजह से या भारत के हटने की वजह से?भारत-पक्ष का कहना है कि डिबेट रद्द इसलिए हुई क्योंकि पाकिस्तान की टीम आखिरी समय में उपस्थित नहीं हुई; आयोजक द्वारा सूचना दी गई थी कि पाकिस्तानी वक्ता लंदन में नहीं पहुँचे। वहीं पाकिस्तान हाई कमीशन का दावा था कि भारत के वक्ता पीछे हट गए। लेकिन J Sai Deepak ने दोनों दावों को असत्य साबित किया — उन्होंने कॉल-लॉग्स व ईमेल सबूत दिखाए। Q3: क्या इस घटना का मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अब विश्वसनीय बहस नहीं होती?हां — यह घटना एक उदाहरण है कि कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल सच्ची बहस की बजाय पब्लिक ट्रंपेटिंग व प्रचार के लिए किया जाता है। जहाँ पर तैयारी, भरोसा, और तर्क-वाद की बजाय, आखिरी समय की रणनीतियाँ, बदलाव और कथित ‘वॉकओवर’ की चाल होती है। इस तरह के मामलों में विश्वसनीयता और निष्पक्षता हमेशा नहीं रहती।

श्रीमद् भगवद् गीता का रहस्य और सार: आसान भाषा में समझें

BHAGAVAT

श्रीमद् भगवद् गीता का रहस्य क्या है? गीता का सार, अध्यायों का महत्व, रोज़ कौन सा अध्याय पढ़ें और मुक्ति का मार्ग—सबकुछ आसान, बोलचाल की हिंदी में समझें। यह लेख शिक्षा-प्रधान, विश्वसनीय और सरल भाषा में तैयार किया गया है। गीता का रहस्य: आखिर श्रीकृष्ण क्या कहना चाहते थे? श्रीमद् भगवद् गीता सिर्फ 700 श्लोकों की पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा दिखाने वाला एक आध्यात्मिक विज्ञान है। महाभारत के युद्ध के बीच अर्जुन मोह और भ्रम में थे। सामने अपने ही रिश्तेदार थे, इसलिए उनका मन युद्ध करने को तैयार नहीं था। तभी श्रीकृष्ण ने समय रोककर अर्जुन को वह ज्ञान दिया, जिसे हम आज “भगवद् गीता” कहते हैं। इस ज्ञान का उद्देश्य सिर्फ युद्ध कराना नहीं, बल्कि मनुष्य को “कर्तव्य, विवेक और आत्मा” का असली अर्थ समझाना था। कई आध्यात्मिक आचार्यों के अनुसार, गीता का मूल सार दो शब्दों में समझा जा सकता है— “पैकिंग और माल” जिसका अर्थ है— शरीर पैकिंग है और आत्मा असली माल है। जो आत्मा को पहचान लेता है, वही जीवन का असली रहस्य जान लेता है। कथा की तरह समझें: क्यों अर्जुन को युद्ध के लिए कहा गया? अर्जुन एक क्षत्रिय थे और उनका जीवन-धर्म युद्धभूमि से भागना नहीं था। लेकिन मोह के कारण वे कर्तव्य भूल चुके थे। श्रीकृष्ण जानते थे कि यह मोह थोड़ी ही देर का है। इसलिए उन्होंने अर्जुन को झकझोरकर कहा— “तुम सिर्फ अपने धर्म का पालन करो, अहंकार और मोह छोड़ दो।” कृष्ण ने अर्जुन को यह नहीं कहा कि – “सबको मार डालो” बल्कि कहा— “कर्तव्य करो, पर अहंकार मत करो।” यही कर्मयोग का मूल है। कृष्ण का ‘अंतरआशय’: जो समझना सबसे कठिन है कृष्ण स्वयं कहते हैं कि गीता का गहराई वाला अर्थ हर कोई नहीं समझ सकता।उनका कहना था कि— 1000 में से 1 इंसान गीता का स्थूल अर्थ समझ सकता है। ऐसे 1000 में से 1 ही सूक्ष्म अर्थ समझता है। और ऐसे ही कई स्तरों को पार करने के बादएक व्यक्ति कृष्ण का असली “अंतरआशय” समझ पाता है। यही कारण है कि गीता पर हजारों टीकाएँ लिखी गईं, लेकिन असली मर्म बहुत कम लोग समझ पाते हैं। ‘पैकिंग और माल’ का असली मतलब क्या है? इस दुनिया में हर इंसान को हम उसके शरीर के आधार पर पहचानते हैं।किसी का शरीर सुंदर है, किसी का छोटा है, कोई बूढ़ा है, कोई जवान। पर असली सत्य यह है— शरीर बदलता है, आत्मा नहीं बदलती। यह वैसा ही है जैसे बाजार में अलग-अलग पैकिंग होती है, लेकिन अंदर का माल एक जैसा शुद्ध हो सकता है। कृष्ण कहते हैं— “अपने अंदर के माल को पहचानो, वही मैं हूँ, वही तुम हो।” जब कोई इस सत्य को समझ लेता है, उसका जीवन बदल जाता है। गीता रोज़ क्यों पढ़नी चाहिए? भारतीय परंपरा में कहा जाता है कि— उपनिषद गाय हैं और गीता उनका दुग्ध है। यानी उपनिषद का सार गीता में ही मिलता है। गीता को समझने के चार चरण बताए गए है पठन/श्रवण – पहले सिर्फ शब्द समझ आते हैं मनन – फिर मतलब समझ आने लगता है निदिध्यासन – समझ को जीवन में उतारने की प्रक्रिया अनुभव – जब ज्ञान जीवन का हिस्सा बन जाता है इसीलिए गीता को बार-बार पढ़ना आवश्यक माना गया है। कौन सा अध्याय रोज़ पढ़ना चाहिए? हालाँकि पूरी गीता ज्ञान का खजाना है, लेकिन कुछ अध्याय खास रूप से दैनिक पठन के लिए जरूरी माने गए हैं। इसमें पूरी गीता का सार दिया गया है। 78 श्लोकों वाला यह अध्याय जीवन के व्यावहारिक मार्ग पर सबसे ज्यादा प्रकाश डालता है। रोज़ थोड़ी मात्रा में पढ़ना भी बहुत उपयोगी माना जाता है। अध्याय 5 – कर्मयोग का सरलतम वर्णन कर्म और मन के संबंध को समझाता है। इसमें बताया गया है कि ईश्वर हर जीव में समान रूप से रहते हैं। यह अध्याय जाति-भेद, छुआ-छूत और भेदभाव खत्म करने का संदेश देता है। अध्याय 15 – आत्मा का ज्ञान इसमें बताया गया है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है। यह अध्याय ‘पुरुषोत्तम योग’ भी कहलाता है। अध्याय 14 – प्रकृति के तीन गुण सत्व, रज और तम – इन तीन गुणों से मनुष्य का स्वभाव कैसे बनता है, यह समझाया गया है। किस अध्याय से मुक्ति का मार्ग बताया गया है? अध्याय 16 और 18 – मोक्ष का ज्ञान इन अध्यायों में बताया गया है कि—कौन से गुण मनुष्य को बांधते हैं कौन से गुण मनुष्य को मुक्त करते हैं जीवन और मृत्यु के बाद आत्मा किस दिशा में जाती है अध्याय 8 – अंतिम समय का विज्ञान मृत्यु के समय व्यक्ति जो सोचता है, उसकी आत्मा वहीं पहुंचती है। इसलिए इस अध्याय को मरते हुए व्यक्ति को सुनाना लाभकारी माना जाता है। यह अध्याय “अक्षर ब्रह्म योग” भी कहलाता है। गागर में सागर: गीता का सार 12 सरल वाक्यों में 1. शरीर अस्थायी है, आत्मा अमर है।2. मनुष्य को अपने कर्तव्य से कभी नहीं भागना चाहिए।3. कर्म करो, फल की चिंता मत करो।4. मोह और डर मनुष्य को कमजोर बनाते हैं।5. ज्ञान और विवेक जीवन की असली शक्ति हैं।6. हर जीव में भगवान समान रूप से मौजूद हैं।7. मन को जीतने वाला संसार को जीत लेता है।8. सही विवेक मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाता है।9 लोभ, क्रोध, अहंकार से दूरी जरूरी है।10 जीवन में संतुलन सबसे बड़ी साधना है।11. भक्त, ज्ञानी और कर्मयोगी—सब ईश्वर तक पहुँच सकते हैं।12. आत्मा को पहचानना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है। FAQs नहीं। गीता का ज्ञान सार्वभौमिक है और हर धर्म व हर व्यक्ति के लिए उपयोगी है। हाँ। गीता आपको सही निर्णय, मानसिक शांति और जीवन का उद्देश्य समझाती है। मूल गीता दार्शनिक है, लेकिन सरल भाषा में टीकाएँ उपलब्ध हैं, जिन्हें हर कोई समझ सकता है। अध्याय 12 (भक्ति योग) सबसे सरल और सहज माना जाता है। हाँ, रोज़ कुछ श्लोक पढ़ना भी मन को शांत और मजबूत बनाता है।

महिलाओं की गरिमा पर कोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब

SC

सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स में महिलाओं की निजता और स्वास्थ्य सुरक्षा पर केंद्र और हरियाणा सरकार से जवाब मांगा, दिशानिर्देश बनाने पर हो सकती है बड़ी पहल।सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं की गरिमा और अधिकारों को केंद्र में रखते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीर पहल की है। हरियाणा के एमडीयू में महिलाओं की कथित ‘पीरियड चेकिंग’ की खबर ने देश को झकझोर दिया, और इसी के बाद अदालत ने केंद्र और हरियाणा सरकार से तत्काल जवाब तलब किया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि पीरियड्स एक प्राकृतिक और निजी प्रक्रिया है, जिसे किसी भी महिला के सम्मान से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। अब अदालत ऐसे अपमानजनक मामलों को रोकने के लिए पूरे देश में समान और सख्त दिशानिर्देश बनाने पर विचार कर रही है। यह फैसला महिलाओं की निजता, स्वास्थ्य और सम्मान की सुरक्षा में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। पीरियड्स कोई शर्म की बात नहीं –सुप्रीम कोर्ट ये खबर भी पढ़े…एआईसीटीई की नई मंजूरी प्रक्रिया: 2026–27 में खुलेंगे नए इंजीनियरिंग कॉलेज नयी दिल्ली की सर्द सुबह में जब सुप्रीम कोर्ट की एक महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू हुई, तो अदालत ने महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर बड़ा कदम उठाया। सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स के दौरान महिलाओं की निजता और स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार और हरियाणा सरकार दोनों को नोटिस जारी किया। यह मामला तभी उठा जब हरियाणा के महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (MDU) में महिला सफाई कर्मचारियों की कथित तौर पर फिजिकल चेकिंग किए जाने की खबरें सामने आईं। यह चेकिंग इस लिए की गई कि यह पता लगाया जाए कि कौन सी महिला “पीरियड में है और कौन नहीं’। यह खबर चौंकाने वाली थी, और इसी के बाद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने एक जनहित याचिका दायर की ताकि पूरे देश में ऐसे मामलों को रोकने के लिए स्पष्ट और मजबूत दिशानिर्देश तैयार किए जा सकें। ये खबर भी पढ़े…NEET PG में नया सीट चार्ट – हाई कोर्ट की सख्ती के बाद बदला हुआ फैसला “महिलाओं की इज्जत पर कोई समझौता नहीं”-सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के दौरान पीठ की अगुआई कर रहीं जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने बेहद सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अगर कोई महिला पीरियड्स की वजह से भारी काम नहीं कर पा रही है, तो नियोक्ता का कर्तव्य है कि: उसे हल्का काम दिया जाए, या किसी और को अस्थायी रूप से नियुक्त किया जाए।उन्होंने साफ कहा— “पीरियड्स एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, कोई जांच का विषय नहीं।” जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि समाज में कुछ लोगों की सोच अब भी महिलाओं के प्रति भेदभाव से भरी है, और एमडीयू की घटना इसी मानसिकता को दिखाती है। ये खबर भी पढ़े…डिज़ाइन + टेक्नोलॉजी: कैसे बन रहा है UI/UX, VFX और XR में भविष्य का सबसे स्मार्ट करियर? “देश भर में ऐसी घटनाएं हो रही हैं” SCBA के अध्यक्ष विकाश सिंह ने अदालत को बताया कि हरियाणा ही नहीं, देश के दूसरे राज्यों से भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां महिलाओं से पीरियड्स के बारे में अनैतिक और अपमानजनक तरीके से सवाल या जांच की गई है। उन्होंने कहा कि इस तरह की हरकतें: महिलाओं की निजता का उल्लंघन करती हैं, संविधान के आर्टिकल 14, 19 और 21 का सीधा हनन करती हैं और महिलाओं को मानसिक व भावनात्मक रूप से अपमानित करती हैं। इस पर पीठ ने गंभीर टिप्पणी की— “इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।” हरियाणा सरकार की रिपोर्ट— हरियाणा सरकार ने कोर्ट को बताया कि:- प्रशासन ने इस मामले में सहायक रजिस्ट्रार समेत दो लोगों के खिलाफ कार्रवाई की है। ठेके पर रखे गए दो सुपरवाइजर्स को बर्खास्त करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही, यदि किसी महिला के साथ जातीय या सामाजिक भेदभाव हुआ है, तो SC/ST (अत्याचार रोकथाम) कानून भी लगाया गया है। अदालत ने इस अपडेट को गंभीरता से लिया और कहा कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। पूरे देश के लिए दिशानिर्देश बनेंगे? सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अदालत सोच रही है कि क्या पूरे देश के लिए: स्पष्ट दिशानिर्देश- और सख्त नियम बनाए जाएं- ताकि कार्यस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों में कोई भी महिला अपमानजनक जांच या भेदभाव का शिकार न हो। जस्टिस नागरत्ना ने कहा— “यह एक गंभीर मुद्दा है, और इस पर बात करने की जरूरत है।” उन्होंने कर्नाटक में “मंथली पीरियड लीव” नीति के प्रस्ताव का जिक्र करते हुए कहा:“अगर छुट्टी का प्रावधान बने, तो क्या महिलाओं से यह साबित करने के लिए कहा जाएगा कि वे पीरियड्स में हैं?” यह टिप्पणी अदालत की चिंता को साफ दर्शाती है।अगली सुनवाई अगले सप्ताह—महिलाओं के अधिकारों पर हो सकता है बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और हरियाणा दोनों से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह निर्धारित की है। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड प्रज्ञा बघेल ने दायर की थी। याचिका में कई पुराने मामलों और घटनाओं का उल्लेख भी है, जहां महिलाओं के साथ मासिक धर्म के नाम पर अत्याचार किया गया था। यह मामला आगे चलकर पूरे देश में महिलाओं की निजता की सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, सुरक्षा, और सम्मान से जुड़े कानूनों को नए रूप देने का आधार बन सकता है। FAQs — अक्सर पूछे जाने वाले सवाल हाँ, ऐसी जांच महिलाओं की निजता का उल्लंघन है और संविधान के आर्टिकल 14, 19 और 21 के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट भी इसी मुद्दे पर दिशानिर्देश बनाने की सोच रहा है। क्योंकि हरियाणा के एमडीयू में महिलाओं की पीरियड्स जांच का मामला सामने आया था। अदालत चाहती है कि देशभर में ऐसी घटनाएं न हों और इसके लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं।

एआईसीटीई की नई मंजूरी प्रक्रिया: 2026–27 में खुलेंगे नए इंजीनियरिंग कॉलेज

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आईसीटीई ने 2026–27 शैक्षणिक सत्र के लिए एक बड़ा और अहम फैसला लिया है, जिसके तहत देशभर में नए मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग कॉलेजों की स्थापना का रास्ता खोल दिया गया है। तकनीकी शिक्षा में तेजी से बढ़ती जरूरतों को ध्यान में रखते हुए परिषद ने 28 नवंबर से आवेदन प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की है। इस बार न सिर्फ नए कॉलेजों को अवसर मिलेगा, बल्कि पुराने संस्थानों को भी अपनी स्वीकृति बढ़ाने या नए कोर्स जोड़ने का मौका दिया जाएगा। नए कॉलेज खोलने व मंजूरी की प्रक्रिया शुरू एआईसीटीई ने 2026-27 सत्र के लिए नए तकनीकी संस्थान (इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, कंप्यूटर एप्लीकेशन आदि) खोलने व पुरानी संस्थाओं की मंजूरी (renewal) का आवेदन आमंत्रित किया है। आवेदन प्रक्रिया 28 नवंबर 2025 से शुरू हो चुकी है। संस्थानों को आवेदन करने के लिए National Single Window System (NSWS) पोर्टल का उपयोग करना होगा। नए कॉलेज खोलने वाले संस्थानों की समय-सीमा 28 नवंबर 2025 से 12 जनवरी 2026 है। पुराने कॉलेजों के लिए renewal/application की तिथि अलग-अलग ये खबर भी पढ़े…NEET PG में नया सीट चार्ट – हाई कोर्ट की सख्ती के बाद बदला हुआ फैसला इंदौर में क्या बदलने की तैयारी है? खबर के अनुसार, आप जिस तरह बता रहे थे — यानी इंदौर में लगभग 76 मैनेजमेंट कॉलेज पहले से हैं — अब एआईसीटीई की इस नई प्रक्रिया के चलते 2 और मैनेजमेंट कॉलेज और 1 नया इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू हो सकते हैं। इसके लिए संस्थानों को एआईसीटीई से पूरी मंजूरी लेनी होगी — यानी partial approval नहीं, बल्कि हर कोर्स और संस्था के लिए पूरी मंजूरी अनिवार्य होगी। ये खबर भी पढ़े…डिज़ाइन + टेक्नोलॉजी: कैसे बन रहा है UI/UX, VFX और XR में भविष्य का सबसे स्मार्ट करियर? एआईसीटीई के नए नियम इससे पहले कुछ संस्थान इन पाठ्यक्रमों को बिना कठोर मानकों के चला रहे थे; अब उनकी इन्फ्रास्ट्रक्चर, फैकल्टी, अन्य गुणवत्ता मानकों के आधार पर समीक्षा होगी। ये खबर भी पढ़े…JEE Main 2026: अगर नियम तोड़े-3 साल तक होगी परीक्षा से बैन 📈 Intake (छात्र संख्‍या) पर पहले की पाबंदी हटाई एआईसीटीई ने 2024 से उन “well-performing” इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए छात्रों की intake पर लगी सीमा (cap) हटा दी है। अब इनमें एक साथ तीन साल की मंजूरी दी जा सकती है। मतलब, यदि कॉलेज infrastructural क्षमता और गुणवत्ता बनाए रखे, तो seats बढ़ाई जा सकती हैं। इससे इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीटों की संख्या बढ़ने की गुंजाइश है। 🖥️ ऑनलाइन एवं ओपन कोर्सेस की मंजूरी जरूरी इस स्थिति में नए इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने से पहले यह देखना होगा कि वे स्थाई रूप से कामयाब रह सकेंगे या नहीं — तभी मान्यता मिलना संभव है। एआईसीटीई की नई पॉलिसी इसी की ओर इशारा करती है। छात्रों और अभिभावकों को क्या जानना चाहिए यदि आप 12वीं पास हैं और मैनेजमेंट, BBA/BCA या इंजीनियरिंग में दाखिला लेना चाहते हैं – ध्यान रखें कि अब कॉलेजों को एआईसीटीई से मान्यता मिलनी चाहिए। बिना मान्यता वाला कॉलेज चुनना जोखिम भरा हो सकता है। 1.नए कॉलेज खोलने की प्रक्रिया शुरू है — इसलिए इस समय भाईचारे (campus), फैकल्टी स्ट्रेंगटी 2.इंफ्रास्ट्रक्चर प्लेसमेंट रिकार्ड्स आदि देखने पर ज़्यादा ध्यान दें। 3.यह भी देख लें कि कॉलेज ने NSWS पोर्टल पर आवेदन किया है या स्वीकृति पायी है — ताकि भविष्य में डिग्री व मान्यता से संबंधित दिक्कत न आए। 4.साथ में, यह भी ध्यान रखें कि निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों का ट्रैक रिकॉर्ड अब उतना मजबूत नहीं है — इसलिए विकल्पों को समझ-समझकर चुनें। FAQs Q1. क्या अब BBA / BCA कॉलेजों को भी एआईसीटीई से मंजूरी लेनी जरूरी है?हाँ. 2025–26 से, BBA, BCA तथा अन्य मैनेजमेंट/कंप्यूटर एप्लीकेशन पाठ्यक्रम अब एआईसीटीई के अंतर्गत आए हैं। किसी भी कॉलेज को ये पाठ्यक्रम चलाने के लिए एआईसीटीई स्वीकृति (approval) लेना जरूरी है। Q2. नए इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट कॉलेज खोलने के लिए आवेदन की प्रक्रिया क्या होगी?संस्था को 28 नवंबर 2025 से शुरू हुए ऑनलाइन NSWS पोर्टल के माध्यम से आवेदन करना होगा। इसके बाद एआईसीटीई एप्रूवल प्रक्रिया (inspection, infrastructure, faculty आदि) के आधार पर मंजूरी देगा। नए संस्थानों के लिए अंतिम तिथि 12 जनवरी 2026 है। Q3. मध्यप्रदेश में इतने कॉलेज बंद क्यों हो रहे हैं — फिर भी नए कॉलेज खोलने की अनुमति क्यों दी जा रही है?पिछले दशक में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में छात्रों की संख्या कम हुई है और 126 कॉलेज बंद हुए हैं।