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सैनिक तैनाती और अंतरराष्ट्रीय दांव-पेंच: भारत की नई नीति से US-China-Pak पर बड़ा झटका

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नई दिल्ली  दुनियाभर में जारी संघर्ष और युद्धग्रस्त परिस्थितियों के बीच भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक देशों (UN TCCs) का सम्मेलन बुलाया है। यह तीन दिवसीय सम्मेलन 14 से 16 अक्टूबर तक दिल्ली में आयोजित किया जाएगा, जिसमें लगभग 30 देशों के वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व शामिल होंगे। सम्मेलन का उद्देश्य शांति स्थापना अभियानों के अनुभव, दृष्टिकोण और प्रतिबद्धताओं को साझा करना है। दिलचस्प बात यह है कि इस सम्मेलन में चीन और पाकिस्तान को शामिल नहीं किया गया है, जबकि भारत ने गाजा और यूक्रेन जैसे युद्धग्रस्त क्षेत्रों में सैनिक तैनाती पर भी स्पष्ट रुख अपनाया है। भारतीय अधिकारियों ने कहा कि भारत केवल संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों के तहत ही किसी विदेशी संघर्ष क्षेत्र में सैनिक तैनात करेगा। ट्रंप के लिए झटका उधर,अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी भारत का यह कदम झटका देने वाला होगा क्योंकि वह दुनियाभर में शांति दूत बनने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष, हमास-इजरायल टकराव, भारत-पाक तनाव और कई अन्य विवादित क्षेत्रों में मध्यस्थता के लिए ट्रंप हमेशा सक्रिय रहते हैं। हाल ही में उन्होंने गाजा में शांति विराम के लिए इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को व्हाइट हाउस बुलाया। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप का उद्देश्य शांतिदूत बनकर नोबेल पुरस्कार जीतने की कोशिश में भी छुपा हुआ है। इसी बीच, भारत में भी शांति और सुरक्षा पर बड़ी बैठक अमेरिका, चीन और पाक के लिए  बड़ा झटका साबित हो सकती है।   सम्मेलन का महत्व और भारत का योगदान भारत ने पिछले 75 वर्षों में 50 से अधिक मिशनों में 2,90,000 से अधिक शांति सैनिकों को भेजा, जिनमें से 182 सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। भारत ने 2007 में लाइबेरिया में पहली बार ‘ऑल वुमन पुलिस कंटिंजेंट’ तैनात कर इतिहास रचा। इसके अलावा, फरवरी 2025 में भारत ने ग्लोबल साउथ महिला शांति सैनिकों का सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें 35 देशों ने हिस्सा लिया। भारत ने लगातार यह संदेश दिया है कि शांति सैनिकों की तैनाती केवल यूएन के झंडे तले ही की जाएगी। इसके साथ ही, भारत ने यूएन शांति सैनिकों के खिलाफ अपराधों की जवाबदेही, तकनीकी समाधानों का उपयोग, और शांति स्थापना अभियानों में संसाधनों का समुचित प्रबंधन सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सम्मेलन के मुख्य बिंदु क्षमता निर्माण और सतत शांति स्थापना अभियानों के लिए संसाधन जुटाना शांति स्थापना अभियानों में तकनीक और आधुनिक समाधान का उपयोग प्रतिनिधि दल भारत की आत्मनिर्भर रक्षा पहल और तकनीकी समाधानों का अवलोकन करेंगे और राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देंगे। भारत की वैश्विक छवि लेफ्टिनेंट जनरल राकेश कपूर, एवीएसएम, वीएसएम, डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (IS&T) ने कहा कि यह भारत के लिए गौरव की बात है कि वह इस बहुपक्षीय आयोजन की मेजबानी कर रहा है। उनका कहना था कि यह सम्मेलन साझा मंच तैयार करने का अवसर है, जहां विभिन्न देशों के अनुभव और प्रतिबद्धता संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत शांति स्थापना की जिम्मेदारी को मजबूत करेंगे। भारत का यह कदम उसकी सांस्कृतिक और नैतिक विदेश नीति, वैश्विक शांति और सुरक्षा में योगदान, और शांति सैनिकों की सुरक्षा एवं उचित प्रतिनिधित्व के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। भारत लगातार यह सुनिश्चित करता रहा है कि शांति अभियानों में उसका योगदान निष्पक्ष, पारदर्शी और संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुरूप हो।  

आटे से लेकर सेना तक विवादित मोड़: PoK में स्थिति बिगड़ी, लोगों में चिंता बढ़ी

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इस्लामाबाद  PoK यानी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन लगातार तीसरे दिन जारी हैं। अब प्रदर्शनकारियों ने फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की अगुवाई वाली सेना को भी आड़े हाथों लिया है। पाकिस्तान सरकार और सेना की तुलना चुड़ैल से की जा रही है, जो लोगों की हत्या करने पर तुली हुई है। प्रदर्शनकारी अब भ्रष्टाचार और राजनीतिक अधिकार नहीं दिए जाने के भी आरोप लगा रहे हैं। खबर है कि पाकिस्तानी बलों ने प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग की थी, जिसमें कम से कम 12 आम नागरिकों की मौत हो गई थी और 200 से ज्यादा घायल हो गए थे। पाकिस्तानी रेंजर्स की गोलीबारी में 3 पुलिसकर्मियों की भी मौत हो गई थी। साथ ही 9 घायल हो गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, आवामी ऐक्शन कमेटी के नेता शौकत नवाज मीर ने भाषण दिया, 'हमारा संघर्ष किसी एक व्यक्ति से नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम से है।' उन्होंने कहा, 'यह जनता का संघर्ष है, यह आपका संघर्ष है और यह हम सभी का संघर्ष है। हम सभी मिलकर इस सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाएंगे।' उन्होंने पाकिस्तानी सेना और सरकार को लेकर कहा, 'एक चुड़ैल लोगों को मारने पर तुली हुई है।' मीर ने कहा, 'यह संघर्ष आखिरी सांस तक जारी रहेगा।' उन्होंने कहा, 'हम चुप नहीं रहेंगे। पीओके के लोग अब दबाव के आगे और नहीं झुकेंगे।' कैसे शुरू हुआ प्रदर्शन यह विरोध प्रदर्शन दो साल पहले क्षेत्र में आटे और बिजली की नियमित और रियायती आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए शुरू हुआ था लेकिन अब इसमें अतिरिक्त मांगें भी जुड़ गई हैं, जैसे कश्मीरी अभिजात वर्ग के विशेषाधिकारों में कटौती, आरक्षित विधानसभा सीटों का उन्मूलन और मुफ्त शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाएं। जेकेजेएएसी का आरोप है कि इस बार का विरोध प्रदर्शन इसलिये किया जा रहा है क्योंकि सरकार दो साल पहले हुए समझौते को पूरी तरह से लागू करने में विफल रही है। प्रदर्शनकारियों ने 38 सूत्री मांगपत्र प्रस्तुत किया, जिसमें प्रमुख मांगें शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों की समाप्ति और अभिजात वर्ग के विशेषाधिकारों की वापसी शामिल हैं। अन्य मांगों में कई सड़क परियोजनाओं का निर्माण, करों में राहत, आटे और बिजली पर सब्सिडी, शरणार्थियों के लिए नौकरी कोटा समाप्त करना, न्यायपालिका में सुधार और अन्य स्थानीय मांगें शामिल हैं।  

गांधी के हत्यारे की अदालत में भावुक करने वाली स्पीच, सुनकर हर कोई दंग रह गया

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नई दिल्ली  नाथूराम गोडसे, देश के राजनीतिक इतिहास में इस एक नाम की चर्चा खूब होती है, महात्मा गांधी की जयंती और पुण्यतिथि पर तो खासकर। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि गांधी जी की हत्या के इतने सालों के बाद भी उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को लेकर समाज में दो विचार हैं। एक जो उसे दोषी मानता है, एक जो उसके किए पर उसे शाबाशी देता है। हर साल की तरह 2 अक्टूबर और 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे को ट्रेंड में लाने का रिवाज भी है। महात्मा गांधी के साथ नीचे आपको नाथूराम गोडसे ट्रेंडिंग में लिखा दिख जाएगा। खैर, आज हम हम गांधी हत्याकांड से जुड़ा वो पन्ना खोलेंगे जिसके दम पर गोडसे के समर्थक दंभ भरते हैं। वो पन्ना नाथूराम गोडे की वो स्पीच है जो उसने दोषी सिद्ध होने के बाद कोर्ट में दी थी। कहते हैं कि उस वक्त गोडसे की स्पीच वहां बैठे एक जज के आंखों में भी आंसू ला दिए थे। कहा था कि उस समय अदालत में उपस्थित लोगों को जूरी बना दिया जाता और उनसे फैसला देने को कहा जाता, तो निस्संदेह वे प्रचंड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने का निर्णय देते। तो चलिए आपको भी उस स्पीच की एक-एक बात बता देते हैं। नाथूराम गोडसे की ये स्पीच आपको यूट्यूब या गूगल सर्च पर आसानी से मिल जाएगी। ‘मैंने गांधी को क्यूं मारा’ किताब में भी इसका जिक्र है। तो चलिए शुरू करते हैं। नाथूराम गोडसे ने उस दिन कोर्ट में कहा कि मेरा नेताओं से मतभेद था तथा अब तक है। यह मेरे 28 फरवरी 1935 के सावरकर के नाम पत्र से भली-भांति विदित होता है। आज भी मेरे वही विचार हैं। गांधी जी से मेरी शत्रुता नहीं थी। लोग कहते हैं कि पाकिस्तान योजना में उनका मन शुद्ध था। मैं यह बताना चाहता हूं कि मेरे मन में देश प्रेम के अतिरिक्त कुछ ना था। मुझे इस कारण हाथ उठाना पड़ा कि पाकिस्तान बनने पर जो भयंकर घटनाएं हुई उनके उत्तरदाई केवल गांधी जी थे। मुझे यह पता था कि हत्या के बाद लोगों के विचार मेरे विषय में बदल जाएंगे। समाज में मेरा जितना आदर है वह नष्ट हो जाएगा। मैं जानता था कि समाचार पत्र बुरी तरह मेरी निंदा करेंगे किंतु मैं नहीं जानता था कि अखबार इतने पतित हो जाएंगे कि सत्य का गला घोट देंगे। समाचार पत्रों ने कभी निष्पक्षता से नहीं लिखा। यदि वे देश के हित का अधिक ध्यान रखते और एक मनुष्य की व्यक्तिगत इच्छाओं को कम ध्यान देते तो देश के नेता पाकिस्तान स्वीकार न करते। समाचार पत्रों की यह नीति थी कि लीडरों की गलतियों को प्रकट ना होने दिया जाए। देश का विभाजन इससे सरल हो गया। ऐसे भ्रष्ट समाचार पत्रों के डर से मैंने अपने निश्चय की दृढ़ता को विचलित नहीं होने दिया। गोडसे आगे कहते हैं कि कुछ लोग कहते हैं कि यदि पाकिस्तान ना बनता, तो आजादी न मिलती। मैं इस विचार को ठीक नहीं मानता। लीडरों ने अपने पाप को छिपाने के लिए यह बहाना बनाया है। गांधीवादी कहते हैं कि उन्होंने अपनी शक्ति से स्वराज्य पाया। यदि उन्होंने अपनी शक्ति से स्वराज्य लिया है तो उन्होंने हारे हुए अंग्रेजों को पाकिस्तान की शर्त क्यों रखने दी? और शक्ति से क्यों ना रोका? मेरे विचार से महात्मा और उनके अनुयायियों की एक ही पॉलिसी रही और वो यह कि पहले यवनों की मांग पर विरोध दर्शाना फिर हिचक दिखाना और अंत में आत्मसमर्पण कर देना। इसी प्रकारपाकिस्तान की रूपरेखा स्वीकार कर ली गई। छल से स्वीकार किया पाकिस्तान नाथूराम ने कोर्ट में कहा कि 15 अगस्त 1947 को छल पूर्वक पाकिस्तान स्वीकार कर लिया गया। पंजाब, बंगाल, सीमा प्रांत और सिंध के हिंदुओं का कोई विचार नहीं किया गया। देश के टुकड़े करके एक मजहबी धर्मनिष्ठित मुस्लिम राज्य बना दिया गया। मुसलमानों को अपने अराष्ट्रीय कार्यों का फल पाकिस्तान के रूप में मिल गया। गांधीवादी नेताओं ने उन लोगों को देशद्रोही सांप्रदायिक कहकर पुकारा जिन्होंने पाकिस्तान का विरोध किया था पाकिस्तान स्वयं स्वीकार करके जिन्ना की सब बात मान ली। इस दुर्घटना से मेरे मन की शांति भंग हो गई। पाकिस्तान बनाने के बाद कांग्रेस सरकार पाकिस्तान के हिंदुओं की रक्षा करती तो मेरा क्रोध शांत हो जाता। मैं नहीं देख सकता था कि जनता को धोखा दिया जाए। करोड़ों हिंदुओं को मुसलमानों की दया पर छोड़कर गांधीवादी कहते रहे कि हिंदुओं को पाकिस्तान से नहीं आना चाहिए और वहीं रहना चाहिए। इस प्रकार हिंदू मुसलमानों के चंगुल में फंस गए और विकट विपत्तियों के शिकार हुए। गोडसे ने भरी कोर्ट में अपने बचाव में आगे कहा कि जब मुझे इन घटनाओं की याद आती है तो मैं कांप उठता हूं। प्रतिदिन सहस्त्रों हिंदुओं का संहार होता था। 15,000 सिखों को गोलियों से बून दिया गया। हिंदू स्त्रियों को नग्न करके जुलूस निकाले गए। उनको पशुओं की भांति बेचा गया। लाखों हिंदुओं को धर्म बचाकर भागना पड़ा। 40 मील लंबा हिंदू निराश्रितों का जत्था हिंदुस्तान की ओर आ रहा था। हिंदुस्तान शासन इस भयानक कृत्य का कैसे भयानक निवारण करता था।

पाकिस्तान सर क्रीक में सैन्य तैयारी कर रहा, भारत की सतर्कता बढ़ी – राजनाथ सिंह का बयान

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भुज रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सर क्रीक क्षेत्र में पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और बुनियादी ढांचे के निर्माण पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में कोई दुस्साहस किया, तो भारत इसका कड़ा और निर्णायक जवाब देगा। राजनाथ सिंह ने कहा, "पाकिस्तान ने सर क्रीक में अपनी सैन्य ढांचागत सुविधाओं को बढ़ाया है। अगर पाकिस्तान कोई गलत हरकत करता है, तो हम उसे एक मजबूत संदेश देंगे। पाकिस्तान को याद रखना चाहिए कि कराची का रास्ता सर क्रीक से होकर जाता है।" गुजरात के भुज में एक सैन्य अड्डे पर सैनिकों को संबोधित करते हुए, राजनाथ सिंह ने दशहरा के अवसर पर 'शस्त्र पूजा' करने से पहले यह बयान दिया। रक्षा मंत्री ने यह भी बताया कि भारत ने स्वतंत्रता के 78 वर्षों बाद भी सर क्रीक क्षेत्र में सीमा विवाद को सुलझाने के लिए बार-बार बातचीत के प्रयास किए हैं, लेकिन पाकिस्तान की मंशा साफ नहीं है। उन्होंने कहा, "स्वतंत्रता के 78 साल बाद भी सर क्रीक क्षेत्र में सीमा को लेकर विवाद बना हुआ है। भारत ने इस मुद्दे को बातचीत के जरिए हल करने की कोशिश की, लेकिन पाकिस्तान की नीयत में खोट है।" सर क्रीक क्या है और इसका क्या महत्व है? सर क्रीक भारत और पाकिस्तान के बीच गुजरात के कच्छ क्षेत्र और सिंध प्रांत के बीच स्थित एक 96 किलोमीटर लंबी खाड़ी (estuary) है, जो अरब सागर में मिलती है। यह क्षेत्र दलदली और ज्वारीय प्रभावों वाला है, जहां पानी का स्तर ज्वार-भाटे के साथ बदलता रहता है। यह भारत-पाकिस्तान सीमा का हिस्सा है और दोनों देशों के बीच एक विवादित क्षेत्र भी है। सर क्रीक भारत और पाकिस्तान के बीच समुद्री सीमा को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र अरब सागर के तटीय क्षेत्र में स्थित है, जो सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समुद्री व्यापार और नौसैनिक गतिविधियों के लिए रणनीतिक बिंदु है। इस क्षेत्र में नौसेना की गतिविधियों और समुद्री निगरानी के लिए यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है। सर क्रीक क्षेत्र में समुद्री संसाधन, जैसे मछली और संभावित तेल व गैस भंडार, मौजूद हो सकते हैं। यह क्षेत्र समुद्री आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के निर्धारण के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो मछली पकड़ने, खनन और अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है। भारत और पाकिस्तान के बीच सर क्रीक की सीमा को लेकर विवाद है। भारत का कहना है कि सीमा को खाड़ी के बीच से होकर गुजरना चाहिए, जबकि पाकिस्तान का दावा है कि सीमा को भारत की ओर अधिक होना चाहिए। यह विवाद 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद से चला आ रहा है। भारत ने हमेशा इस मुद्दे को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने की वकालत की है, लेकिन पाकिस्तान की ओर से बार-बार उकसावे की कार्रवाइयां देखने को मिली हैं। ऑपरेशन सिंदूर की सफलता पर गर्व रक्षा मंत्री ने भारतीय सशस्त्र बलों की हालिया उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि 'ऑपरेशन सिंदूर' में भारतीय सेना ने सभी सैन्य उद्देश्यों को सफलतापूर्वक हासिल किया। उन्होंने कहा, "मुझे गर्व है कि भारतीय सशस्त्र बलों ने ऑपरेशन सिंदूर के सभी सैन्य लक्ष्यों को पूरा किया। हालांकि, आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई अभी जारी है।" राजनाथ सिंह ने यह भी खुलासा किया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने लेह से लेकर सर क्रीक क्षेत्र तक भारत की रक्षा प्रणाली को भेदने की नाकाम कोशिश की थी। उन्होंने कहा, "पाकिस्तान ने भारत की रक्षा प्रणाली को तोड़ने का प्रयास किया, लेकिन भारतीय सशस्त्र बलों ने अपनी जवाबी कार्रवाई से पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया।"  

क्या ट्रंप ने पुतिन से शांति का ख्वाब खत्म कर दिया? यूक्रेन को लेकर खुला राज

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वाशिंगटन  ऐसा लगता है कि यूक्रेन को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नजरिया काफी बदल गया है। पहली नजर में तो ऐसा लगता है कि उन्होंने पूरी तरह से इस आशावादी रुख को अपना लिया है कि कीव ‘‘पूरे यूक्रेन को उसके मूल स्वरूप में वापस लाने के लिए लड़ने और जीतने की स्थिति में है’’। इसके साथ यह संदेश भी आया कि इसे साकार करने के लिए यूरोपीय देशों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। ट्रंप के अनुसार यूक्रेन की जीत “समय, धैर्य और यूरोप तथा विशेष रूप से उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के वित्तीय समर्थन” पर निर्भर करती है। अमेरिका की एकमात्र प्रतिबद्धता ‘‘नाटो को हथियार उपलब्ध कराना है ताकि नाटो उनके साथ जो चाहे कर सके।’’ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर अपने संदेश के अंत में लिखा, ‘‘सभी को शुभकामनाएं!’’ यह शायद अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत है कि अमेरिकी राष्ट्रपति शांति समझौते के अपने प्रयासों से पीछे हट रहे हैं। इससे यह भी पता चलता है कि उन्होंने रूस के अपने समकक्ष व्लादिमीर पुतिन के साथ एक अलग समझौते का विचार छोड़ दिया है। लेकिन यहीं पर अच्छी खबर समाप्त हो जाती है और यहीं पर यूरोपीय नेतृत्व वाले गठबंधन को इस महाद्वीप को और अधिक अस्थिर वातावरण में सुरक्षा और स्थिरता प्रदान करने की आवश्यकता होगी। नाटो हवाई क्षेत्र में रूसी घुसपैठ के कई सप्ताह बाद, ड्रोनों ने – जिनके रूस से जुड़े होने की अत्यधिक संभावना है – कोपेनहेगन हवाई अड्डे के आसपास के क्षेत्र में दो बार डेनमार्क के हवाई क्षेत्र को बाधित किया। ऐसा लगा जैसे कि यह यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की द्वारा 24 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए उनके भाषण में की गई भविष्यवाणी का पूर्वाभास था। पुतिन की लगातार उकसावे वाली गतिविधियां कीव के यूरोपीय सहयोगियों के लिए एक खुली चुनौती हैं। इस गठबंधन के केंद्र में, यूरोपीय संघ ने निश्चित रूप से यह प्रदर्शित किया है कि वह इस चुनौती का सामना करने के लिए अपनी वाक्पटुता दिखाने को तैयार है। ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के संस्थानों ने अपने दृढ़ संकल्प के बारे में कभी कोई संदेह नहीं छोड़ा है कि यूक्रेन के खिलाफ रूस के आक्रामक युद्ध को ‘‘यूक्रेन के लिए एक न्यायसंगत और स्थायी शांति के साथ समाप्त करने की आवश्यकता है’’। यूरोपीय संघ आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने हाल में अपने संबोधन में इसका जिक्र किया था। सबसे पहले, इच्छुक देशों का गठबंधन एक सुसंगत निकाय नहीं है। इसके सदस्यों में नाटो और यूरोपीय संघ के सदस्य, साथ ही ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान और दक्षिण कोरिया शामिल हैं। लेकिन अमेरिका इसमें शामिल नहीं है। फरवरी में आठ देशों, यूरोपीय संघ और नाटो से बढ़कर, अप्रैल में 33 और सितंबर में 39 सदस्य हो गए। कीव को सैन्य उपकरणों से सहायता देने वाले 57 सदस्यीय यूक्रेन रक्षा संपर्क समूह, जिसकी 30वीं बैठक सितंबर की शुरुआत में हुई थी, के साथ इसका संबंध पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यह भी पूरी तरह साफ नहीं है कि यूरोपीय संघ और नाटो के नेता अपने संगठन के सभी सदस्यों की ओर से बोल रहे हैं या नहीं। उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ और नाटो के सदस्यों में हंगरी और स्लोवाकिया ने रूस के विरुद्ध यूरोप की रक्षा के मामले में अस्पष्ट रुख अपनाया है। नाटो के यूरोपीय सदस्य अमेरिका के इस कदम से बेहद चिंतित हैं और यह चिंता गलत भी नहीं है कि अमेरिका ने नाटो को छोड़ दिया है। यूरोप को अपना धन बढ़ाने, अपनी सैन्य शक्ति विकसित करने तथा निर्णय लेने की ऐसी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है जो टालमटोल में न फंसी हो, ताकि वह उस छद्म युद्ध को जीत सके जिसे क्रेमलिन ने यूक्रेन और उसके सहयोगियों पर थोपा है। ऐसा करने से यह सुनिश्चित हो जायेगा कि यूरोपीय देश रूस को यूक्रेन के विरुद्ध युद्ध को पश्चिम के साथ पूर्ण सैन्य टकराव में बदलने से रोकने में बेहतर स्थिति में हैं।  

RSS की राष्ट्र साधना के 100 वर्ष, नरेन्द्र मोदी की कलम से

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  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) आज विजयादशमी पर संगठन का शताब्दी समारोह मना रहा है। 100 वर्ष पूर्व विजयदशमी के महापर्व पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी। 1 अक्टूबर को दिल्ली के डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित समारोह में पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) भी शामिल हुए थे। इस अवसर पर  RSS से जुड़ा 100 रुपये का स्पेशल सिक्का और RSS के योगदान को दर्शाने वाला स्मारक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया। वहीं आरएसएस के शताब्दी वर्ष पर पीएम नरेंद्र मोदी ने एक लेख लिखा है। तो चलिए पीएम की कलम से लिखे इस लेख को यहां पढते हैंः- प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को 100 वर्ष पूरे हो गए हैं। संघ प्रारंभ से ही राष्ट्रभक्ति और सेवा का पर्याय रहा है। संघ के लिए देश की प्राथमिकता ही उसकी अपनी प्राथमिकता रही। अपनी 100 वर्षों की इस यात्रा में संघ ने समाज के अलग-अलग वर्गों में आत्मबोध जगाया. संघ ने हमेशा राष्ट्र निर्माण का मार्ग चुना। पीएम मोदी ने आगे लिखा कि- ये हजारों वर्षों से चली आ रही उस परंपरा का पुनर्स्थापन था, जिसमें राष्ट्र चेतना समय-समय पर उस युग की चुनौतियों का सामना करने के लिए,नए-नए अवतारों में प्रकट होती है। इस युग में संघ उसी अनादि राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार है। ये हमारी पीढ़ी के स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमें संघ के शताब्दी वर्ष जैसा महान अवसर देखने मिल रहा है। मैं इस अवसर पर राष्ट्रसेवा के संकल्प को समर्पित कोटि-कोटि स्वयंसेवकों को शुभकामनाएं देता हूं। मैं संघ के संस्थापक, हम सभी के आदर्श… परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी के चरणों में श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। संघ की 100 वर्षों की इस गौरवमयी यात्रा की स्मृति में भारत सरकार ने विशेष डाक टिकट और स्मृति सिक्के भी जारी किए हैं। जिस तरह विशाल नदियों के किनारे मानव सभ्यताएं पनपती हैं, उसी तरह संघ के किनारे भी सैकड़ों जीवन पुष्पित-पल्लवित हुए हैं. जैसे एक नदी जिन रास्तों से बहती हैं, उन क्षेत्रों को अपने जल से समृद्ध करती हैं, वैसे ही संघ ने इस देश के हर क्षेत्र, समाज के हर आयाम को स्पर्श किया है। जिस तरह एक नदी कई धाराओं में खुद को प्रकट करती है, संघ की यात्रा भी ऐसी ही है। संघ के अलग-अलग संगठन भी जीवन के हर पक्ष से जुड़कर राष्ट्र की सेवा करते हैं। शिक्षा, कृषि, समाज कल्याण, आदिवासी कल्याण, महिला सशक्तिकरण, समाज जीवन के ऐसे कई क्षेत्रों में संघ निरंतर कार्य करता रहा है। विविध क्षेत्र में काम करने वाले हर संगठन का उद्देश्य एक ही है, भाव एक ही है… राष्ट्र प्रथम। संघ की शाखाएं… व्यक्ति निर्माण की यज्ञवेदी अपने गठन के बाद से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र निर्माण का विराट उद्देश्य लेकर चला। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संघ ने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण रास्ता चुना और इस चलने के लिए जो कार्यपद्धति चुनी, वो थी नित्य-नियमित चलने वाली शाखाएं। संघ शाखा का मैदान, एक ऐसी प्रेरणा भूमि है, जहां से स्वयंसेवक की अहम् से वयं की यात्रा शुरू होती है। संघ की शाखाएं… व्यक्ति निर्माण की यज्ञवेदी हैं। आजादी के बाद संघ को कुचलने का प्रयास किया गया राष्ट्र निर्माण का महान उद्देश्य, व्यक्ति निर्माण का स्पष्ट पथ और शाखा जैसी सरल, जीवंत कार्यपद्धति… यही संघ की 100 वर्षों की यात्रा का आधार बने। इन्हीं स्तंभों पर खड़े होकर संघ ने लाखों स्वयंसेवकों को गढ़ा, जो विभिन्न क्षेत्रों में देश को आगे बढ़ा रहे हैं। संघ जब से अस्तित्व में आया, संघ के लिए देश की प्राथमिकता ही उसकी अपनी प्राथमिकता रही। आज़ादी की लड़ाई के समय परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी समेत अनेक कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। डॉक्टर साहब कई बार जेल तक गए। आजादी की लड़ाई में कितने ही स्वतंत्रता सेनानियों को संघ संरक्षण देता रहा। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता रहा। आजादी के बाद भी संघ निरंतर राष्ट्र साधना में लगा रहा. इस यात्रा में संघ के खिलाफ साजिशें भी हुईं, संघ को कुचलने का प्रयास भी हुआ। ऋषितुल्य परम पूज्य गुरु जी को झूठे केस में फंसाया गया, लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने कभी कटुता को स्थान नहीं दिया, क्योंकि वो जानते हैं, हम समाज से अलग नहीं हैं, समाज हमसे ही तो बना है। समाज के साथ एकात्मता और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति आस्था ने संघ के स्वयंसेवकों को हर संकट में स्थित प्रज्ञ रखा है… समाज के प्रति संवेदनशील बनाए रखा है। खुद कष्ट उठाकर दूसरों के दुख हरना… ये हर स्वयंसेवक की पहचान प्रधानमंत्री ने आगे लिखा है कि- प्रारंभ से संघ राष्ट्रभक्ति और सेवा का पर्याय रहा है। जब विभाजन की पीड़ा ने लाखों परिवारों को बेघर कर दिया, तब स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों की सेवा की। हर आपदा में संघ के स्वयंसेवक अपने सीमित संसाधनों के साथ सबसे आगे खड़े रहते रहे। यह केवल राहत नहीं थी, यह राष्ट्र की आत्मा को संबल देने का कार्य था। खुद कष्ट उठाकर दूसरों के दुख हरना… ये हर स्वयंसेवक की पहचान है। आज भी प्राकृतिक आपदा में हर जगह स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचने वालों में से एक रहते हैं। संघ दशकों से आदिवासी परंपराओं, आदिवासी रीति-रिवाजों को सहेज रहा अपनी 100 वर्षों की इस यात्रा में, संघ ने समाज के अलग-अलग वर्गों में आत्मबोध जगाया। स्वाभिमान जगाया। संघ देश के उन क्षेत्रों में भी कार्य करता रहा है, जो दुर्गम है. जहां पहुंचना सबसे कठिन है। संघ दशकों से आदिवासी परंपराओं, आदिवासी रीति-रिवाज, आदिवासी मूल्यों को सहेजने-संवारने में अपना सहयोग देता रहा है। अपना कर्तव्य निभा रहा है। आज सेवा भारती, विद्या भारती, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम, आदिवासी समाज के सशक्तिकरण का स्तंभ बनकर उभरे हैं। संघ का एक ही मंत्र- न हिन्दू पतितो भवेत् समाज में सदियों से घर कर चुकी जो बीमारियां हैं, जो ऊंच-नीच की भावना है, जो कुप्रथाएं हैं, ये हिन्दू समाज की बहुत बड़ी चुनौती रही हैं। ये एक ऐसी गंभीर चिंता है, जिस पर संघ लगातार काम करता रहा है। डॉक्टर साहब से लेकर आज तक, संघ की हर महान विभूति ने, हर सर-संघचालक ने भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। परम पूज्य गुरु जी ने निरंतर “न हिन्दू … Read more

ट्रंप की डिमांड्स ने हमास को बांटा, 2 अतिरिक्त गारंटी की भी मांग

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दोहा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पिछले दिनों गाजा में शांति स्थापना और युद्धविराम की शर्तों पर सहमति जताई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने शांति योजना के तहत 20 सूत्री प्रस्ताव दिया है, जिस पर इजरायल ने सहमति दे दी है लेकिन हमास की तरफ से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। हमास को इसके लिए 72 घंटों का समय दिया गया है। इस बीच, फिलिस्तीनी सूत्रों ने बताया है कि हमास ने ट्रंप के 20 सूत्री प्लान की दो अहम शर्तों पर सवाल उठाए हैं और उसे मानने से इनकार कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, हमास के अधिकारी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की गाजा शांति योजना में निरस्त्रीकरण संबंधी प्रावधानों में संशोधन चाहते हैं। यह जानकारी समूह के नेतृत्व के एक करीबी फिलिस्तीनी सूत्र ने दी है। सूत्र ने नाम न छापने का अनुरोध करते हुए बताया कि हमास के वार्ताकारों ने मंगलवार को दोहा में तुर्की, मिस्र और कतर के अधिकारियों के साथ चर्चा की। इस दौरान ट्रंप की दो शर्तों पर अपनी असहमति जताई है और उसमें बदलाव की चाहत जताई है।फिलिस्तीनी सूत्र ने बताया कि हमास अपने गुट के निरस्त्रीकरण और अपने लड़ाकों के गाजा से निष्कासन जैसे कुछ प्रावधानों में संशोधन करना चाहता है। इसके अलावा हमास नेता गाजा पट्टी से इजरायल की पूर्ण वापसी के लिए अंतर्राष्ट्रीय गारंटी चाहते हैं। हमास के लोग यह भी चाहते हैं कि गाजा के अंदर या बाहर कहीं भी उनके लोगों पर हमला न हो और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इसकी गारंटी दे कि भविष्य में हमास के लोगों की हत्या नहीं की जाएगी। अरब साझेदारों के संपर्क में हमास दरअसल, पिछले महीने दोहा में युद्धविराम प्रस्ताव पर चर्चा के लिए हमास अधिकारियों की बैठक के दौरान ही इजराइल ने हमला बोल दिया था, जिसमें छह लोग मारे गए थे। फिलिस्तीनी सूत्र ने विस्तृत जानकारी दिए बिना कहा कि हमास अन्य क्षेत्रीय और अरब साझेदारों के साथ भी संपर्क में है। इस बीतचीत से परिचित एक अन्य सूत्र ने एएफपी को बताया कि ट्रम्प की योजना को लेकर फिलिस्तीनी समूह में मतभेद है। हमास के भीतर दो विचार चल रहे फिलिस्तीनी सूत्र ने कहा कि अभी तक हमास के भीतर दो विचार चल रहे हैं। पहला बिना शर्त ट्रंप के पीस प्लान का समर्थन करता है क्योंकि उन्हें इसके जरिए ट्रम्प गाजा में युद्धविराम की गारंटी दे रहे हैं लेकिन दूसरे समूह को निरस्त्रीकरण और गाजा छोड़ने की शर्त पर आपत्ति है। सूत्र ने कहा, "वे निरस्त्रीकरण और किसी भी फिलिस्तीनी नागरिक को गाजा से निकाले जाने का विरोध कर रहे हैं।" बता दें कि हमास के पास ट्रंप के 20 सूत्री प्लान पर जवाब देने के लिए अब कम समय बचा है। हालांकि, सूत्र ने कहा कि समूह को जवाब देने के लिए अभी दो या तीन दिन और लग सकते हैं।  

तीन लोन, एक केस और बर्बरता की यादें: रामपुर तिराहा कांड के गवाह की दिल दहला देने वाली कहानी

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चंपावत आज रामपुर तिराहा गोलीकांड की 31वीं बरसी है। 1994 में आज ही के दिन उत्तराखंड राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारियों पर यूपी पुलिस ने बर्बरता दिखाई थी। 31 साल पहले आंदोलनकारियों पर ऐसा कहर बरपा था, जिसने जलियावाला बाग हत्याकांड की याद ताजा कर दी थी। चंपावत के नवीन भट्ट अपने दम आज भी रामपुर तिराहा कांड की लड़ाई लड़ रहे हैं। सीबीआई ने उन्हें इस हत्याकांड का मुख्य गवाह बनाया है। रामपुर तिराहा कांड पर सरकार की अनदेखी से नवीन बेहद आहत हैं। स्थिति यह है कि वह गवाही देने निजी खर्च पर मुजफ्फरनगर जाते हैं। नवीन लंबे समय से मजदूरी कर परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं। खेतीखान के कानाकोट निवासी नवीन भट्ट 30 साल से अपने खर्चें से मुजफ्फरनगर की अदालत में गवाही देने जाते रहे हैं। उनका कहना है कि इसमें सरकार से उन्हें कोई मदद नहीं मिलती है। नवीन रामपुर तिराहा कांड के चश्मदीद गवाह रहे हैं। मुख्यमंत्री धामी ने आंदोलनकारियों को किया याद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रामपुर तिराहा कांड के आंदोलनकारियों को याद किया। उन्होंने X हैंडल पर लिखा, "रामपुर तिराहा गोलीकांड में अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर राज्य आंदोलनकारियों को कोटि-कोटि नमन। आपके अदम्य साहस, बलिदान और संघर्ष के परिणामस्वरूप ही उत्तराखण्ड पृथक राज्य का गठन संभव हुआ। हमारी सरकार अमर शहीदों के सपनों के अनुरूप प्रदेश के सर्वांगीण विकास के लिए पूर्ण समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है।" महिलाओं से दुष्कर्म में दो जवान दोषी मार्च 2024 में मुजफ्फरनगर की अदालत ने 1994 की एक और दो अक्टूबर की रात हुए इस बर्बर कांड में पीएसी के दो जवानों को दुष्कर्म का दोषी ठहराया। नवीन ने बताया कि मामले में कुल 12 गवाह थे। जिनमें से पांच की ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी है। नवीन वर्तमान में मजदूरी कर रहे हैं। नवीन के तीन बेटे हैं। उनके दो बेटे स्नातक करने के बाद बेरोजगार हैं जबकि सबसे छोटा बेटा अभी पढ़ाई कर रहा है। केस लड़ने के लिए तीन बार लोन लिया नवीन ने बताया कि वह 30 साल से लगातार अपनी जेब से पैसा खर्च कर हर तारीख पर मुजफ्फरनगर की अदालत में उपस्थित होते हैं। बताया कि एक तारीख में जाने में उनकी अच्छी खासी रकम खर्च हो जाती है। नवीन ने बताया कि इसके लिए उन्होंने खेतीखान के एक बैंक से 60-60 हजार रुपये का तीन बार लोन भी लिया। सरकार की अनदेखी से नवीन बेहद आहत हैं। उन्हें अभी तक राज्य आंदोलनकारी भी घोषित नहीं किया गया है। घटनास्थल से मिले थे महिलाओं के कपड़े नवीन ने बताया कि आंदोलनकारी महिलाओं को गन्ने के खेत और पास के निर्माणाधीन मकानों में ले जाकर दुष्कर्म किया गया। दो अक्तूबर की सुबह, रामपुर तिराहे से लगभग 200 मीटर दूर हुई फायरिंग में सात लोग मारे गए। इस घटना ने राज्य आंदोलन को और अधिक हिंसक और संवेदनशील बना दिया। पुलिस का लाठीचार्ज और गोलीबारी नवीन भट्ट को एक और दो अक्तूबर 1994 की रात आज भी याद है। नवीन बताते हैं कि वे मुजफ्फरनगर में एक होटल में काम करते थे। उन्होंने काम-धंधा छोड़कर राज्य आंदोलन में कूदने का फैसला किया। एक अक्तूबर को वे दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए मुजफ्फरनगर पहुंचे। यूपी पुलिस ने आंदोलनकारियों को रोकने के रामपुर तिराहे पर बेरिकेडिंग की थी। रात करीब आठ बजे पुलिस ने दिल्ली कूच कर रहे आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया। पूरी रात पुलिस की बर्बरता जारी रही।  

HC का आदेश: डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन साफ-साफ और बड़े अक्षरों में लिखें, मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करें

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नई दिल्ली  डॉक्टरों की लिखावटें अक्सर सुर्खयों में रहती हैं। तकनीक के इस दौर में भी हाथ से वे ऐसी पर्चियां लिखते हैं कि मरीजों की समझ से बाहर होती है। कई बार तो दवा दुकानदार भी नहीं समझ पाते हैं। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का मानना है कि ऐसी पर्चियां लिखना मरीजों की जान से खिलवाड़ करने के समान है। इतना ही नहीं, हाईकोर्ट ने पढ़ने योग्य प्रिस्क्रिप्शन को मरीजों का मौलिक अधिकार करार दिया है। न्यायमूर्ति जसगुरप्रीत सिंह पुरी ने कहा कि अक्सर डॉक्टरों की लिखावट इतनी खराब होती है कि मरीज या उनके परिजन समझ ही नहीं पाते कि कौन सी दवा लिखी गई है। कभी-कभी दवा बेचने वाले के गलत पढ़ने से भी गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि सभी डॉक्टर अब बड़े अक्षरों (CAPITAL LETTERS) में स्पष्ट लिखकर ही दवाइयां लिखें। जब तक डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन की व्यवस्था लागू नहीं होती, यह नियम सख्ती से अपनाया जाए। मेडिकल कॉलेजों में दो साल के भीतर हैंडराइटिंग की ट्रेनिंग शुरू की जाए। आपको बता दें कि हाईकोर्ट यह टिप्पणी उस समय आई जब कोर्ट एक मामले में बलात्कार, धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोपित की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था। हालांकि मूल मामला अलग था, लेकिन अदालत ने इस दौरान पर्चियों की समस्या पर स्वतः संज्ञान लिया। न्यायमूर्ति पुरी ने कहा, “सरकार और संस्थानों के पास इतनी तकनीक उपलब्ध होने के बावजूद अगर आज भी डॉक्टर अपठनीय लिखावट में दवाएं लिख रहे हैं, तो यह बेहद चिंताजनक है। यह सीधे-सीधे जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन सकता है।”  

UN शांति सैनिक सम्मेलन: भारत की पहल, गाजा पर चर्चा लेकिन चीन-पाक को न्योता नहीं

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नई दिल्ली  दुनियाभर में मची उथल-पुथल के बीच भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों का सम्मेलन बुलाया है। संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक देशों (UN TCCs) के आर्मी चीफ्स का सम्मेलन 14 से 16 अक्तूबर तक राजधानी दिल्ली में आयोजित किया जाएगा। इसमें करीब 30 देशों के वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व शामिल होंगे, जो संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में योगदान देते हैं। दिलचस्प बात ये है कि भारत ने चीन और पाकिस्तान को इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए आमंत्रित नहीं किया है। इसके अलावा, भारत ने गाजा और यूक्रेन जैसे युद्धग्रस्त क्षेत्रों में अपने सैनिकों की तैनाती पर भी दो टूक जवाब दिया है। भारतीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि भारत तब तक विदेशी संघर्ष क्षेत्रों जैसे यूक्रेन या गाजा में सैनिकों की तैनाती नहीं करेगा, जब तक कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) इसकी अनुमति नहीं देता है। भारत का कहना है कि दूसरे देशों में सैनिकों की तैनाती केवल यूएन के झंडे तले ही होगी। इससे पहले 1 अक्टूबर को आयोजित कर्टेन रेजर कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल राकेश कपूर, एवीएसएम, वीएसएम, डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (IS&T) ने सेनाध्यक्ष की ओर से सभा को संबोधित किया और सभी अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह भारत के लिए गौरव की बात है कि वह इस बहुपक्षीय आयोजन की मेजबानी कर रहा है। सम्मेलन का उद्देश्य एक साझा मंच तैयार करना है, जहां विभिन्न देशों और सेनाओं का अनुभव, दृष्टिकोण और प्रतिबद्धता एकत्रित होकर संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत शांति स्थापना की जिम्मेदारियों पर विमर्श करेंगे। भारत का योगदान बहुत बड़ा कार्यक्रम में कहा गया कि यह भारत की सांस्कृतिक मूल्यों, नैतिक विदेश नीति और वैश्विक शांति व सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। पिछले 75 वर्षों में भारत ने 50 मिशनों में 2,90,000 से अधिक शांति सैनिक भेजे हैं, जिनमें से 182 सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। भारत ने 2007 में लाइबेरिया में पहली बार ‘ऑल वुमन पुलिस कंटिंजेंट’ तैनात कर इतिहास रचा था। हाल ही में, फरवरी में भारत ने ग्लोबल साउथ के महिला शांति सैनिकों का सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें 35 देशों ने हिस्सा लिया। भारत की पहलकदमियां संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अध्यक्षता के दौरान भारत ने 2021 में "UN शांति सैनिकों के खिलाफ अपराधों की जवाबदेही" और "शांति स्थापना के लिए तकनीक" जैसे अहम दस्तावेजों को अपनाने में भूमिका निभाई। वहीं जून 2023 में भारत ने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में शांति सैनिकों की स्मृति में ‘मेमोरियल वॉल’ स्थापित कराने के लिए प्रस्ताव को प्रायोजित किया। भारत लगातार बेहतर जनादेश, शांति सैनिकों की सुरक्षा और योगदान देने वाले देशों के उचित प्रतिनिधित्व की वकालत करता रहा है। सम्मेलन के मुख्य बिंदु इस तीन दिवसीय सम्मेलन के दौरान दो प्रमुख सत्र होंगे: 1. क्षमता निर्माण और सतत शांति स्थापना अभियानों के लिए संसाधन जुटाना 2. शांति स्थापना अभियानों में तकनीक का उपयोग प्रतिनिधि दल भारत की आत्मनिर्भर रक्षा पहलों और तकनीकी समाधानों को भी देखेंगे और राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देंगे। भारत ने इन देशों को किया आमंत्रित     एलजीरिया     आर्मीनिया     बांग्लादेश     भूटान     ब्राजील     बुरुंडी     कंबोडिया     कोटे डी आइवर     इथियोपिया     फिजी     फ्रांस     घाना     इंडोनेशिया     कजाखस्तान     केन्या     किर्गिस्तान     मेडागास्कर     मलेशिया     मंगोलिया     मोरक्को     नेपाल     नाइजीरिया     रवांडा     सेनेगल     श्रीलंका     तंजानिया     युगांडा     उरुग्वे     वियतनाम     इटली  5-S दृष्टिकोण और NORMS यह सम्मेलन प्रधानमंत्री मोदी के ‘5-S विजन’ — सम्मान, संवाद, सहयोग, शांति और समृद्धि — की भावना में आयोजित किया जाएगा। साथ ही यह भारत के "न्यू ओरिएंटेशन फॉर ए रिफॉर्म्ड मल्टीलेटरल सिस्टम (NORMS)" के दृष्टिकोण के अनुरूप भी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, “भारत संवाद, समझ और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। मिलकर हम ऐसा भविष्य बना सकते हैं, जहां हर व्यक्ति शांति, सौहार्द और गरिमा के साथ जीवन जी सके।” सम्मेलन से अपेक्षा है कि यह शांति स्थापना अभियानों की हकीकत पर साझा समझ बनाएगा, परामर्श प्रक्रिया को मजबूत करेगा, शांति सैनिकों की सुरक्षा बढ़ाएगा और मिशन की प्रभावशीलता सुधारने के लिए तकनीकी विकल्पों की खोज करेगा। गाजा-यूक्रेन में तैनाती का सवाल रक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव (अंतरराष्ट्रीय सहयोग) विश्वेश नेगी ने संभावित तैनाती पर सवालों का जवाब देते हुए कहा, "यूएन शांति सैनिक बलों का यूक्रेन या गाजा में तैनात होना अत्यंत असंभव है।" उन्होंने यूएनएससी की संरचना का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि ऐसी सहमति प्राप्त करना कठिन है। नेगी ने कहा, "भारत केवल यूएन के झंडे तले ही सैनिकों को विदेश भेजता है, और यह हमारी लंबे समय से चली आ रही नीति है।" भारत यूएन शांति सैनिक मिशनों का एक प्रमुख योगदानकर्ता रहा है। 1950 के दशक से अब तक, भारत ने 50 से अधिक मिशनों में 3 लाख से ज्यादा सैनिक तैनात किए हैं, और 182 भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गंवाई है, जो किसी भी देश में सबसे अधिक है। वर्तमान में, भारत के लगभग 5,000 सैनिक 11 सक्रिय मिशनों में तैनात हैं, जिनमें सूडान, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, गोलान हाइट्स, दक्षिण सूडान, माली, लेबनान, अबी जन हाइट्स, साइप्रस, केंद्रीय अफ्रीकी गणराज्य, पश्चिमी सहारा और मध्य पूर्व जैसे क्षेत्र शामिल हैं। नेपाल और बांग्लादेश के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है। पाक-चीन को न्योता नहीं पाकिस्तान और चीन को आमंत्रित न करने का फैसला भारत-पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण संबंधों और भारत-चीन सीमा विवाद को ध्यान में रखते हुए लिया गया लगता है। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना और इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) की कथित संलिप्तता के कारण सभी सैन्य-से-सैन्य संपर्क निलंबित हैं। चीन के मामले में, सीमा तनाव और रणनीतिक चिंताओं ने इस निर्णय को प्रभावित किया है। हालांकि, दोनों देश यूएन शांति सैनिकों के प्रमुख योगदानकर्ता हैं, लेकिन भारत ने इस आयोजन को बहुपक्षीय सहयोग के लिए सीमित रखा है।