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आर्कटिक में भारत के लिए नए अवसर, पुतिन की रणनीति से चीन पर शिकंजा कसा जाएगा

मॉस्को/ नईदिल्ली  वैश्विक भू-राजनीति के बदलते परिदृश्य में, रूस और भारत के बीच सदियों पुरानी दोस्ती एक बार फिर नई ऊंचाइयों को छूने वाली है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दिसंबर में प्रस्तावित भारत यात्रा न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगी, बल्कि आर्कटिक क्षेत्र में एक ऐतिहासिक समझौते की नींव भी रखेगी। यह समझौता नॉर्दर्न सी रूट (NSR) और संसाधन विकास पर केंद्रित होगा जो भारत को आर्कटिक परिषद में बड़ी भूमिका दिलाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह कदम न केवल आर्थिक अवसरों के द्वार खोलेगा, बल्कि चीन की बढ़ती आर्कटिक महत्वाकांक्षाओं के बीच रूस के लिए एक रणनीतिक संतुलन भी साबित होगा। पारंपरिक दक्षिणी समुद्री मार्गों की तुलना में छोटा यह मार्ग ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली की नॉर्दर्न सी रूट के विकास में संभावित भागीदारी को लेकर बातचीत चल रही है और संभावना है कि इस साल होने वाले वार्षिक शिखर सम्मेलन में इस दिशा में ठोस परिणाम सामने आ सकते हैं। नॉर्दर्न सी रूट रूस के उत्तरी तट के साथ आर्कटिक महासागर से होकर गुजरता है और पारंपरिक दक्षिणी समुद्री मार्गों की तुलना में करीब 40% छोटा है। इस मार्ग से यूरोप और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के बीच तेज, सुरक्षित और किफायती कार्गो परिवहन संभव हो सकेगा। जुलाई 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मॉस्को यात्रा के दौरान दोनों देशों ने आर्कटिक शिपिंग में सहयोग की संभावनाओं को लेकर एक संयुक्त कार्य समूह बनाने पर सहमति जताई थी। यह समूह रूस के विशेष आर्कटिक विकास प्रतिनिधि व्लादिमीर पानोव (Rosatom) और भारत के नौवहन मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा की संयुक्त अध्यक्षता में काम कर रहा है। इस कार्य समूह की पहली बैठक अक्टूबर 2024 में नई दिल्ली में हुई, जिसमें आर्कटिक जहाज निर्माण परियोजनाओं में साझेदारी, भारतीय नाविकों को ध्रुवीय नौवहन प्रशिक्षण देने, और एनएसआर पर कार्गो शिपिंग सहयोग के लिए एक एमओयू तैयार करने पर चर्चा हुई। भारत को आर्कटिक काउंसिल में बड़ी भूमिका देना चाहता है रूस सूत्रों के अनुसार, रूस चाहता है कि भारत को आर्कटिक काउंसिल में अधिक प्रभावशाली भूमिका दी जाए। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि मॉस्को क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल को संतुलित करना चाहता है। आर्कटिक इलाका जीवाश्म ईंधन और महत्वपूर्ण खनिजों से समृद्ध है, जिससे रूस और भारत दोनों के लिए यह रणनीतिक रूप से अहम बनता है। इसके साथ ही रूस इस बात पर भी जोर दे रहा है कि नॉर्दर्न सी रूट को ईरान के चाबहार बंदरगाह से जोड़ा जाए। भारत ने इस बंदरगाह के संचालन की जिम्मेदारी अगले दस वर्षों के लिए हासिल की है। रूस इस बंदरगाह का इस्तेमाल भारतीय महासागर क्षेत्र तक पहुंच के लिए करना चाहता है। पुतिन के आगामी भारत दौरे से उम्मीद की जा रही है कि भारत-रूस आर्कटिक सहयोग में एक नया अध्याय शुरू होगा, जो न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि सामरिक दृष्टिकोण से भी दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। आर्कटिक: वैश्विक व्यापार का नया गेटवे आर्कटिक क्षेत्र पृथ्वी के सबसे ठंडे और संसाधन-समृद्ध इलाकों में से एक है। यह आज जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से पिघल रहा है। इससे न केवल नए शिपिंग मार्ग खुल रहे हैं, बल्कि तेल, गैस, दुर्लभ खनिजों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच भी आसान हो रही है। रूस आर्कटिक महासागर के 53 प्रतिशत तट को नियंत्रित करता है। वह इस क्षेत्र में अपनी प्रभुता कायम रखने के लिए सक्रिय है। 2024 में NSR से 37 मिलियन टन से अधिक माल ढोया गया, जो 2025 में और बढ़ने की उम्मीद है। भारत के लिए यह अवसर सुनहरा है। स्वेज कनाल या पनामा चैनल जैसे पारंपरिक मार्गों की तुलना में NSR एशिया और यूरोप के बीच यात्रा को 40 प्रतिशत छोटा कर देता है। इससे न केवल ईंधन की बचत होगी, बल्कि व्यापारिक लागत भी घटेगी। रूसी स्रोतों के अनुसार, पुतिन की यात्रा के दौरान NSR के उपयोग पर ठोस कार्रवाई की योजना बनेगी। इसमें भारत को रूसी आइसब्रेकर बेड़े (जिसमें 40 आइसब्रेकर और 8 न्यूक्लियर-संचालित जहाज शामिल हैं) का सहयोग मिलेगा। यह कदम चीन की 'पोलर सिल्क रोड' महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला करने के लिए रूस की रणनीति का हिस्सा है। आर्कटिक में चीन की बढ़ती उपस्थिति रूस के लिए चुनौती बनी हुई है, और भारत का प्रवेश एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में काम करेगा। भारत-रूस संबंध: इतिहास से वर्तमान तक भारत और रूस के बीच संबंध सोवियत काल से ही विशेष रहे हैं। 1971 के भारत-पाक युद्ध में सोवियत संघ का समर्थन हो या आज रूस का S-400 मिसाइल सिस्टम, दोनों देशों की साझेदारी रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में अटूट रही है। 2024 में द्विपक्षीय व्यापार 63 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें रूसी तेल भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत बना। यूक्रेन संघर्ष के बावजूद, भारत ने रूसी ऊर्जा पर निर्भरता बनाए रखी, जिसकी आलोचना अमेरिका ने की। लेकिन राष्ट्रपति पुतिन ने हाल ही में वलदाई चर्चा क्लब में कहा, "भारत हमारे ऊर्जा वाहकों को अस्वीकार करे तो उसे 9-10 अरब डॉलर का नुकसान होगा। हमारी साझेदारी मजबूत है।" पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "प्रिय मित्र" और "बुद्धिमान नेता" कहा, जो देश की भलाई के बारे में सोचते हैं।

टैरिफ पॉलिसी ने अमेरिका की जेब पर किया चोट, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

वाशिंगटन डोनाल्ड ट्रंप ने किसी देश पर 25%, तो भारत और ब्राजील जैसे देशों पर 50%  का हाई टैरिफ लगाया है, लेकिन उनका ये कदम खुद अमेरिका के लिए ही परेशानी का सबब बनता जा रहा है. दुनियाभर के तमाम दिग्गज इकोनॉमिस्ट ने इसकी आलोचना की है. अब IMF की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ भी इसमें शामिल हो गई हैं. उन्होंने कहा है कि US Tariff के छह महीने के बाद भी इसका कोई खास असर देखने को नहीं मिला है और अमेरिका में जो राजस्व बढ़ा है, वो खुद अमेरिकी जनता और यहां की कंपनियों से ही लिया गया है.  अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर निगेटिव असर ट्रंप टैरिफ के चलते दुनिया में ट्रेड वॉर जैसी स्थिति बनी है. फिर बात चाहे चीन के साथ व्यापार युद्ध की हो, या फिर ब्राजील जैसे देशों की. भारत के बारे में देखें, तो ट्रंप ने पहले 25% टैरिफ का ऐलान किया और फिर रूसी तेल खरीद को मुद्दा बनाते हुए इसे दोगुना करते हुए 50% कर दिया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के तमाम देशों पर टैरिफ लगाकर आखिर अमेरिका को क्या हासिल हुआ? तो इसे लेकर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर भारतीय मूल की गीता गोपीनाथ ने बड़ा दावा किया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए कहा कि इसका निगेटिव असर खुद US Economy पर ही हुआ है.  US के ग्राहकों-कंपनियों पर बढ़ा बोझ गीता गोपीनाथ ने अपनी एक्स पोस्ट में कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप को टैरिफ का ऐलान किए छह महीने से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन इसका कोई खास नतीजा नहीं निकल सका है. उन्होंने लिखा, 'अमेरिका के टैरिफ से क्या हासिल हुआ? क्या सरकार के लिए राजस्व बढ़ा? हां, काफी बढ़ा, लेकिन यह पैसा करीब-करीब पूरी तरह से अमेरिकी कंपनियों से ही वसूला गया और कुछ हद तक इसकी भरपाई अमेरिकी उपभोक्ताओं से की गई. कुल मिलकार ट्रंप का टैरिफ इनके लिए एक टैक्स जैसा ही साबित हुआ.  टैरिफ से सुधार के कोई संकेत नहीं IMF की पूर्व चीफ इकोनॉमिस्ट गीता गोपीनाथ ने टैरिफ की आलोचना करते हुए कहा कि ये सीधे तौर पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए निगेटिव स्कोरकार्ड रहा है. भारत और ब्राजील से आयात पर 50% तक, और कुछ भारतीय दवाओं पर तो 100% तक टैरिफ घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और व्यापार संतुलन में सुधार लाने के लिए थे. लेकिन इसका अमेरिका को बहुत कम या कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ है. उन्होंने लिखा कि न तो व्यापार संतुलन में सुधार और न ही अमेरिका विनिर्माण क्षेत्र में इसके पॉजिटिव असर का कोई संकेत मिला है.  उल्टा महंगाई में कर दिया इजाफा  गीता गोपीनाथ ने टैरिफ के चलते अमेरिका में महंगाई दर को लेकर कहा कि इसके लागू होने के बाद से देश में महंगाई में थोड़ा इजाफा देखने को मिला है. खासतौर पर घरेलू उपकरणों, फर्नीचर, कॉफी जैसी चीजों के दाम में बढ़ोतरी देखने को मिली है. गोपीनाथ ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम एक्सपर्ट्स ने भी अपने-अपने तरीके से ट्रंप के टैरिफ की आलोचना की है और इसे खुद अमेरिका के लिए खराब करार दिया है. 

भारतवंशी वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता: शुक्र ग्रह पर मिला भरपूर पानी

नई दिल्ली शुक्र ग्रह के बादल हमेशा से वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बने हुए हैं. क्या वहां जीवन हो सकता है? ये सवाल सालों से चर्चा में है. अब अमेरिकी वैज्ञानिकों की एक टीम ने 50 साल पुराने डेटा को दोबारा जांचा है. नतीजा चौंकाने वाला है – शुक्र के बादल ज्यादातर पानी से बने हैं.  ये पानी साफ-सुथरे बूंदों के रूप में नहीं, बल्कि हाइड्रेटेड सामग्री (जिसमें पानी बंधा हुआ हो) के रूप में मौजूद है. पुरानी सोच थी कि बादल ज्यादातर सल्फ्यूरिक एसिड से बने हैं, लेकिन अब पता चला है कि पानी का हिस्सा 62 प्रतिशत है. ये खोज नासा के पायनियर मिशन के पुराने आंकड़ों से आई है.  शुक्र के बादल: पृथ्वी जैसे हालात, लेकिन रहस्यमयी शुक्र सूर्य का सबसे करीब ग्रह है. इसका वातावरण बहुत गर्म और जहरीला है. सतह पर तापमान 460 डिग्री सेल्सियस तक जाता है. लेकिन उसके ऊपरी बादलों की परतें? वहां दबाव और तापमान पृथ्वी जैसे हैं – करीब 50 डिग्री सेल्सियस और सामान्य हवा का दबाव. इसलिए वैज्ञानिक सोचते हैं कि कहीं वहां सूक्ष्म जीवन (माइक्रोब्स) हो सकता है. लेकिन समस्या ये थी कि हम मानते थे बादल सल्फ्यूरिक एसिड (एक तेजाब) से भरे हैं. ये एसिड इतना जहरीला है कि जीवन की कल्पना मुश्किल लगती थी. पानी की कमी भी बड़ी बाधा थी. अब ये नया अध्ययन कहता है कि पानी बहुत ज्यादा है – बस वो हाइड्रेटेड रूप में बंधा हुआ है. कैसे हुई दोबारा जांच? पुराने डेटा की खोज ये खोज कैलिफोर्निया पॉलिटेक्निक स्टेट यूनिवर्सिटी (कैल पॉली पॉमोना), विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी, एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी और नासा के वैज्ञानिकों ने की. आइडिया आया डॉ. राकेश मोगुल (कैल पॉली पॉमोना) और डॉ. संजय लिमाये (विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी) की बातचीत से. वे शुक्र के बादलों की रचना पर चर्चा कर रहे थे. उन्होंने सोचा कि 1978 के नासा पायनियर वीनस मिशन के डेटा को दोबारा देखना चाहिए. पायनियर वीनस मिशन में एक बड़ा प्रोब (साउंडर) शुक्र के वातावरण में उतरा था. उस पर दो उपकरण थे – न्यूट्रल मास स्पेक्ट्रोमीटर (LNMS) और गैस क्रोमैटोग्राफ (LGC)। ये गैसों को मापने के लिए बने थे. लेकिन डेटा नासा के आर्काइव में माइक्रोफिल्म पर दबा था. पहले इसे डिजिटाइज करना पड़ा. ये काम आसान नहीं था – जैसे पुरानी किताबों को स्कैन करना. डेटा में क्या छिपा था? उपकरणों की 'जाम' से राज खुला वैज्ञानिकों ने पाया कि प्रोब जब बादलों वाली मोटी हवा में उतरा, तो उपकरणों के इनलेट (छेद) बादलों के कणों से जाम हो गए. इससे CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड) का स्तर अचानक गिर गया. पहले इसे खराबी समझा गया, लेकिन अब इसे मौका माना गया.  प्रोब नीचे उतरता गया. गर्मी से जाम कण पिघले. अलग-अलग तापमान पर अलग-अलग गैसें निकलीं. इससे पता चला कि कण क्या बने हैं. मुख्य बातें…      पानी की भारी मौजूदगी: 185 डिग्री सेल्सियस और 414 डिग्री सेल्सियस पर पानी की बड़ी मात्रा निकली. ये हाइड्रेटेड फेरिक सल्फेट (लोहे का हाइड्रेटेड यौगिक) और हाइड्रेटेड मैग्नीशियम सल्फेट जैसे यौगिकों से आई. कुल कणों का 62 प्रतिशत पानी था – ज्यादातर बंधा हुआ.     सल्फ्यूरिक एसिड भी है: 215 डिग्री सेल्सियस पर SO2 (सल्फर डाइऑक्साइड) निकला, जो सल्फ्यूरिक एसिड के पिघलने से होता है. इसका हिस्सा 22 प्रतिशत.     एक और रहस्य: 397 डिग्री सेल्सियस पर फिर SO2 निकला, साथ ही लोहे के आयनों का स्पाइक. ये फेरिक सल्फेट (लोहे का सल्फेट) का संकेत है. इसका अनुमान 16 प्रतिशत. ये यौगिक ज्यादा गर्मी सहन करता है. लोहा कहां से आया? वैज्ञानिकों का मानना है कि अंतरिक्ष की धूल (कॉस्मिक डस्ट) शुक्र के वातावरण में आती है. ये एसिड बादलों से रिएक्ट होकर फेरिक सल्फेट बनाती है. पुरानी भूल क्यों हुई? दूर से जांच vs करीब से जांच पहले दूरबीनों से स्पेक्ट्रोस्कोपी (रंगों से विश्लेषण) की जाती थी. ये सिर्फ हवा में घुला पानी दिखा सकती थी, न कि हाइड्रेटेड पानी. लेकिन प्रोब ने सीधे बादलों के कणों को मापा, इसलिए सही नतीजा मिला. ये रहस्य सुलझ गया. जीवन की संभावना पर क्या असर? नई उम्मीदें शुक्र के बादलों में जीवन का सबसे बड़ा तर्क पानी की कमी था. अब पता चला कि पानी बहुत है – 62 प्रतिशत. लेकिन ये तेजाबी पानी है, जो पृथ्वी के जीवों के लिए कठिन. एसिड-सहने वाले माइक्रोब्स (जैसे पृथ्वी के एसिड झीलों में) वहां जी सकते हैं. ये खोज एस्ट्रोबायोलॉजी (ग्रहों पर जीवन की खोज) को नई दिशा देगी.

ग्रोथ के बावजूद खतरे में है स्थिरता? विश्व बैंक ने क्यों जताया दक्षिण एशिया में मंदी का अंदेशा

नई दिल्ली  इस वर्ष दक्षिण एशिया में 6.6 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर का अनुमान है, लेकिन एक गंभीर मंदी का खतरा मंडरा रहा है. विश्व बैंक ने अपने वार्षिक क्षेत्रीय दृष्टिकोण में कहा है कि व्यापार में खुलेपन और प्रौद्योगिकी अपनाने को बढ़ावा देने वाले सुधारों से इस क्षेत्र में रोजगार सृजन और विकास को गति मिल सकती है. नवीनतम दक्षिण एशिया विकास अद्यतन, नौकरियां, एआई और व्यापार, अनुमान लगाता है कि 2026 में इस क्षेत्र की वृद्धि दर धीमी होकर 5.8 प्रतिशत हो जाएगी. इस ग्रोथ में अप्रैल के पूर्वानुमान से 0.6 प्रतिशत अंकों की कमी है. नकारात्मक जोखिमों में वैश्विक आर्थिक मंदी और व्यापार नीति को लेकर अनिश्चितता, क्षेत्र में सामाजिक-राजनीतिक अशांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी उभरती प्रौद्योगिकी के कारण श्रम बाजार में व्यवधान शामिल हैं. भारत के मजबूत उपभोग वृद्धि, बेहतर कृषि उत्पादन और ग्रामीण मजदूरी वृद्धि के बल पर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बने रहने की उम्मीद है. हालांकि, वित्त वर्ष 2026/27 के पूर्वानुमान को आंशिक रूप से निर्यात पर उच्च शुल्कों के कारण घटा दिया गया है. दक्षिण एशिया पर अमेरिकी शुल्कों की घोषणा 2 अप्रैल को की गई थी, फिर विलंबित और समायोजित की गई, और अंततः अगस्त में लागू की गई. प्रकाशन की तिथि तक, ये अतिरिक्त शुल्क भारत पर 50 प्रतिशत हैं. कुछ श्रेणियों की वस्तुओं पर उत्पाद-विशिष्ट शुल्क लागू होते हैं, जो वर्तमान में आम तौर पर देश-विशिष्ट शुल्कों से कम होते हैं, लेकिन भविष्य में बढ़ सकते हैं. इन वस्तुओं में जेनेरिक फॉर्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं, जो दोनों ही भारत से अमेरिकी आयात का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. वर्ष की शुरुआत में शेयर बाजार के मूल्यांकन में संघर्ष हुआ, लेकिन हाल ही में इसमें तेजी आई है. दरों में कटौती और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच जून में भारत में शुद्ध विदेशी पोर्टफोलियो निवेश नकारात्मक हो गया. यह 7.8 प्रतिशत (वर्ष-दर-वर्ष) हो गया. मजबूत निजी उपभोग और निवेश से विकास को समर्थन मिला और उम्मीद से कम कीमतों से भी इसमें तेजी आई. सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, मजबूत ऋण वृद्धि और ढीली मौद्रिक नीति के समर्थन से निवेश वृद्धि मजबूत बनी हुई है. मुद्रास्फीति के केंद्रीय बैंक के लक्ष्यों के भीतर या उसके अनुरूप बने रहने की उम्मीद है. कमजोर निर्यात संभावनाओं, बढ़ते विदेशी मुद्रा दबाव और सामाजिक अशांति के कारण क्रमशः भारत, मालदीव और नेपाल के लिए 2026 के विकास पूर्वानुमानों को घटा दिया गया है. वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में सरकार के सुधारों कर स्लैब की संख्या कम करना और अनुपालन को सरल बनाना से गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. दक्षिण एशिया में भारत का विकास   देश का वित्तीय वर्ष स्थिर बाजार मूल्यों पर वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि (प्रतिशत) 23/24 24/25(e) 25/26(f) 26/27(f) पूर्वानुमान में संशोधन (प्रतिशत अंक) 25/26(e) 26/27(f) अप्रैल से मार्च 9.2 6.5 6.5 6.3 +0.2 -0.2 (ई) = अनुमान; (एफ) = पूर्वानुमान. हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका को भारत के लगभग तीन-चौथाई वस्तु निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के परिणामस्वरूप, वित्त वर्ष 26/27 के लिए पूर्वानुमान घटा दिया गया है. अप्रैल में भारत को अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम अमेरिकी टैरिफ का सामना करना पड़ सकता था, लेकिन अगस्त के अंत तक उसे काफी अधिक टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है. साल 2024 में भारत के वस्तु निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा संयुक्त राज्य अमेरिका को जाएगा, जो सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 2 प्रतिशत के बराबर है. मध्यम अवधि में भारत के ऊर्जा मांग का दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता स्रोत बनने और 2050 तक चीन को पीछे छोड़कर ऊर्जा मांग का सबसे बड़ा स्रोत बनने की उम्मीद है. सार्वजनिक निवेश वृद्धि औसतन 10 प्रतिशत रही. भारत में सार्वजनिक निवेश को बनाए रखते हुए, केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय ने विश्व बैंक के 2025 के अनुमान के अनुसार कुल गतिविधियों में 3-4 गुना वृद्धि की. भारत में रोजगार बाजार: भारत में, एक ही राज्य के पड़ोसी जिलों के बीच औसत प्रवास, भाषाई अंतर को ध्यान में रखते हुए भी, राज्य की सीमा के दोनों ओर स्थित पड़ोसी जिलों के बीच प्रवास की तुलना में कम से कम 50 प्रतिशत अधिक है. बांग्लादेश में, ग्रामीण रोजगार चाहने वाले लोग ढाका में उच्च उत्पादकता वाले कामों के लिए बड़े पैमाने पर पलायन करते हैं, लेकिन शहर बढ़ती भीड़भाड़ से जूझ रहा है. भारत का गैर-कृषि श्रम बाजार, जो 2023 में सफ़ेदपोश सेवाओं पर काफी हद तक निर्भर करता है, भारत में आईसीटी-बीपीएम बाजार ने 54 लाख रोजगार पैदा किए और सकल घरेलू उत्पाद में 7.5 प्रतिशत का योगदान दिया. भारत और नेपाल, जहां कृषि क्षेत्र में बड़ी संख्या में कार्यबल और निम्न औसत कौशल स्तर हैं, इस क्षेत्र में सबसे कम रोजगार का रिकॉर्ड रखते हैं. दक्षिण एशिया में, भारत उन रोज़गार के अवसरों के मामले में सबसे ऊपर है जो पूरक हैं, जबकि श्रीलंका सबसे नीचे है. भारत में नौकरी बाजार: भारत में, भाषाई अंतर को ध्यान में रखते हुए भी, एक ही राज्य के पड़ोसी जिलों के बीच औसत प्रवास राज्य की सीमा के विभिन्न किनारों पर पड़ोसी जिलों की तुलना में कम से कम 50 प्रतिशत अधिक है. बांग्लादेश में, ग्रामीण नौकरी चाहने वाले बड़ी संख्या में ढाका में उच्च-उत्पादकता वाले काम की ओर पलायन करते हैं, लेकिन शहर बढ़ती भीड़भाड़ से जूझ रहा है. भारत का गैर-कृषि श्रम बाजार 2023 में सफेदपोश सेवाओं के काम पर बहुत अधिक निर्भर करता है, भारत में आईसीटी-बीपीएम बाजार ने 5.4 मिलियन नौकरियां पैदा कीं और सकल घरेलू उत्पाद में 7.5 प्रतिशत का योगदान दिया. भारत और नेपाल, जो कम औसत कौशल स्तर के साथ बड़े कृषि कार्यबल को जोड़ते हैं, इस क्षेत्र का सबसे कम जोखिम दर्ज करते हैं। दक्षिण एशिया में, पूरक नौकरियों के मामले में भारत सर्वोच्च स्थान पर है, जबकि श्रीलंका सबसे निचले स्थान पर है. भारत में रोजगार बाजार: भारत में, एक ही राज्य के पड़ोसी पर्यटकों के बीच औसत यात्रा हुई, भाषाई अंतर को ध्यान में रखते हुए भी, राज्य की सीमा के दोनों ओर स्थित पड़ोसी पर्यटकों के बीच यात्रा की तुलना में कम से कम 50 प्रतिशत अधिक है. बांग्लादेश में, ग्रामीण मजदूर सामान्य वाले लोग ढेका में उच्च श्रेणी वाले नौकरानियों के … Read more

भारत ने जिस J-10CE को किया था तबाह, बांग्लादेश उसी फाइटर जेट को ले रहा अपने बेड़े में

ढाका  मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए चार दिनों के सैन्य टकराव ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीनी J-10CE फाइटर जेट की नाकामी सामने आई थी. लेकिन अब बांग्लादेश इस जेट को खरीदने की योजना बना रहा है. 20 J-10CE जेट्स के लिए 2.2 अरब डॉलर का सौदा हो रहा है. ये खबर भारत के लिए नई चिंता पैदा कर रही है. ऑपरेशन सिंदूर क्या था? चीनी जेट की फेलियर की पूरी कहानी ऑपरेशन सिंदूर मई 2025 में भारत की तरफ से पाकिस्तान पर हवाई हमला था. भारतीय वायुसेना (IAF) ने पाकिस्तानी एयर फोर्स (PAF) के 12-13 जेट्स मार गिराए, जिनमें 4-5 F-16 भी शामिल थे. J-10CE की पूरी परफॉर्मेंस फेल रही. ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक PAF J-10CE जेट को ऑपरेशन के दौरान हार्ड लैंडिंग हो गई, जो क्रैश की तरह लग रही थी. कुछ रिपोर्ट्स में इसे पायलट की गलती या दबाव बताया गया. कुल मिलाकर, चीनी हथियारों ने कई जगह फेलियर दिखाया – जैसे रडार सिस्टम और मिसाइल गाइडेंस में खराबी.  पाकिस्तान ने दावा किया कि उसके चीनी हथियार बहुत अच्छा काम किए लेकिन हकीकत में भारी नुकसान हुआ. ये ऑपरेशन चीनी टेक्नोलॉजी की कमजोरियों को उजागर करने वाला था.  बांग्लादेश क्यों खरीद रहा है ये 'फेल' जेट? डील की डिटेल्स ऑपरेशन सिंदूर की नाकामी के बावजूद, बांग्लादेश अपनी एयर फोर्स को मॉडर्न बनाने के लिए J-10CE पर दांव लगा रहा है. 20 J-10CE जेट्स का सौदा 2.2 अरब डॉलर का है. इसमें ट्रेनिंग, मेंटेनेंस और दूसरे खर्चे शामिल हैं. J-10CE चीन के J-10C का एक्सपोर्ट वर्जन है। ये मल्टीरोल फाइटर जेट तेज उड़ान भरता है. हवा-से-हवा, हवा-से-जमीन हमले कर सकता है. हर जेट की बेस प्राइस 60 मिलियन डॉलर है, यानी 20 के लिए 1.2 अरब. बाकी 820 मिलियन ट्रेनिंग और शिपिंग पर जाएंगे. जेट्स 2026-2027 में मिलेंगे. पेमेंट 10 सालों (2036 तक) में होगा. बांग्लादेश ने अभी आधिकारिक ऐलान नहीं किया. बांग्लादेश एयर फोर्स के पास अभी 212 विमान हैं, जिनमें 44 फाइटर जेट. ज्यादातर 36 पुराने चीनी F-7 हैं, जो कोल्ड वॉर के जमाने के हैं. 8 MiG-29B मॉडर्न हैं. कुछ रूसी Yak-130 लाइट अटैक के लिए. J-10CE इन पुरानी मशीनों को रिप्लेस करेंगे और नेशनल एयर डिफेंस मजबूत करेंगे. हाल ही में बांग्लादेश में एक F-7 जेट क्रैश हुआ, जो चीनी हथियारों की पुरानी समस्याओं को दिखाता है. लेकिन बांग्लादेश चीन पर भरोसा कर रहा है. भारत और इलाके के लिए क्या मतलब? नई चुनौतियां ये डील भारत के लिए खतरे की घंटी है. पूर्वी बॉर्डर पर बांग्लादेश की हवाई ताकत बढ़ेगी. J-10CE ऑपरेशन सिंदूर में फेल हुआ. अगर बांग्लादेश के पास ये जेट्स आए, तो भारत को दो-मोर्चे (पाकिस्तान-चीन) के अलावा तीसरा मोर्चा झेलना पड़ सकता है. चीन भारत को घेरने के लिए बांग्लादेश जैसे पड़ोसियों को हथियार बेच रहा है. अमेरिका भी पाकिस्तान को AMRAAM मिसाइलें दे रहा है. साउथ एशिया में तनाव बढ़ रहा है. एक्सपर्ट्स कहते हैं, भारत को अपनी राफेल, S-400 जैसी सिस्टम्स को अपग्रेड करना होगा और डिप्लोमेसी से पड़ोस संभालना पड़ेगा. जानिए इस फाइटर जेट की ताकत J-10C फाइटर जेट चौढ़ी पीढ़ी से थोड़ा बेहतर फाइटर जेट है. जो हवा से हवा और हवा से जमीन पर जंग के लिए जाना जाता है. इसमें एडवांस एवियोनिक्स, AESA राडार है. साथ ही ये कई तरह के हथियारों को लेकर हमला करने की क्षमता रखता है. इसे चेंगदू एयरक्राफ्ट इंडस्ट्री बनाती है. इस फाइटर जेट को एक पायलट उड़ाता है.     55.5 फीट लंबे जेट का विंगस्पैन 32.2 फीट है.      मैक्सिमम टेकऑफ वजन 19,227 किलोग्राम है.      यह अधिकतम 50 हजार फीट की ऊंचाई तक जा सकता है.      इसकी कॉम्बैट रेंज 550 किलोमीटर और फुल रेंज 1850 किलोमीटर है.      यह अधिकतम 2205 km/hr की अधिकतम गति से उड़ान भर सकता है.     इसमें इंटरनल फ्यूल 4950 लीटर आता है. जबकि तीन ड्रॉप टैंक्स लगाकर इसे और बढ़ाया जा सकता है. कितने तरह के हथियार लगा सकते हैं इसमें 1 ग्रिजनेव शिपुनोव डीएसएच-23 तोप लगी होती है. इसके अलावा इसमें 11 हार्डप्वाइंट्स होते हैं, जिसमें हथियार लगाए जाते हैं. यह फाइटर जेट 90 मिलिमीटर के अनगाइडेड रॉकेट पॉड्स भी लगा सकता है. इसके अलावा इसमें हवा से हवा में मार करने वाली चार तरह की मिसाइलें लग सकती हैं. या फिर हवा से सतह पर मार करने वाली दो तरह की मिसाइलें लगा सकते हैं. जैसे- केडी-88 स्टैंडऑफ लैंड अटैक मिसाइल और वाईजे-91 एंटी-रेडिएशन मिसाइल.  इसमें लेजर गाइडेड बम, ग्लाइड बम, सैटेलाइट गाइडेड बम, अनगाइडेड बम लगा सकते हैं. या फिर इन सभी हथियारों का मिश्रण लगाया जा सकता है. वह हमले और मिशन के आधार पर तय किया जाता है. अगर बांग्लादेश इस फाइटर जेट को भारतीय सीमा के पास तैनात करता है तो भारत की तीनों सेनाओं को अलर्ट पर आना होगा. 

गाजा संकट गहराया: पीस डील विफल होती देख ट्रंप ने तुर्की से लगाई गुहार, \’हमास को कैसे भी मनाओ\’

न्यूयॉर्क अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी भी कीमत पर इजरायल और हमास के बीच शांति लाना चाहते हैं. इसके लिए उनका महत्वाकांक्षी गाजा पीस प्लान तैयार है. लेकिन इस प्लान पर हमास की हां-ना, हां-ना के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है. ऐसे में ट्रंप ने अब तुर्की की मदद मांगी है. तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप एर्दोगन का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने गाजा पीस प्लान को लेकर उनसे मदद मांगी है. ट्रांप चाहते हैं कि हम हमास को रजामंद करें कि वह इस पीस प्लान को बिना किसी शर्त के स्वीकार कर ले. हमास को किसी भी तरह यह प्लान मानने के लिए तैयार किया जाए. उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान हम हमास के संपर्क में हैं. हम सभी पक्षों के संपर्क में हैं. हम उन्हें समझा रहे हैं कि सबसे सही तरीका कौन सा है और फिलिस्तीन के लोगों के लिए क्या सही है. अमेरिकी दौरे और ट्रंप के साथ फोन वार्ता में हमने उन्हें समझाया कि किस तरह उद्देश्य को हासिल किया जा सकता है. एर्दोगन ने कहा कि इस दौरान ट्रंप ने अनुरोध किया कि हम हमास से बातचीत करें और उन्हें इस पीस प्लान को मानने के लिए तैयार करें. इसके बाद हम तत्काल इसमें जुट गए. बता दें कि मिस्र में इजरायल और हमास वार्ता के दौरान तुर्की के इंटेलिजेंस चीफ इब्राहिम कालिन भी मौजूद थे. इससे पहले हमास ने कहा कि वह ट्रंप के प्लान को लेकर मिस्र में हो रही बातचीत को लेकर आशान्वित हैं. हमास ने इस दौरान उन इजरायली बंधकों और फिलिस्तीनी कैदियों की सूची भी सौंपी, जिन्हें इस स्वैप डील के तहत छोड़ा जाना है. लेकिन हमास ने इसके लिए कुछ शर्तें रखी हैं. संगठन ने स्पष्ट किया है कि कुछ शर्तें पूरी किए बिना सौदा संभव नहीं है. मिस्र के शर्म अल-शेख में इजरायल और हमास के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता हो रही है. यह वार्ता ट्रंप के 20 प्वॉइंट प्लान पर आधारित है, जिसका मकसद गाजा में स्थायी शांति लाना है.  इजरायल और हमास के बीच दो साल से जंग चल रही है. गाजा से शुरू हुई जंग की आंच मध्यपूर्व के बाकी देशों तक भी पहुंची है. इजरायल की बमबारी से गाजा खंडहर में तब्दील हो चुका है. इस दो साल की जंग में गाजा में 67 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनियों की मौत हो गई है. संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में अनुमान जताया है कि इस जंग ने गाजा को 69 साल पीछे धकेल दिया है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, गाजा से मलबा हटाने में ही 21 साल का समय लग जाएगा.

अमित शाह अब Zoho Mail यूज़र, बोले- ‘देशी तकनीक पर गर्व’, फाउंडर ने कहा- यह सम्मान की बात

नई दिल्ली भारत सरकार Zoho नाम की कंपनी को खूब प्रोमोट कर रही है. हाल ही में कई केंद्रिय मंत्रियों ने Zoho के प्रोडक्ट्स की तारीफ़ की और लोगों से इन्हें यूज़ करने को कहा. Zoho का WhatsApp राइवल Arattai को भी सरकार प्रोमोट कर रही है.  होम मिनिस्टर अमित शाह ने भी X पर एक पोस्ट किया है. इस पोस्ट में लिखा है कि उन्होंने Zoho मेल पर स्विच कर लिया है. इतना ही नहीं, इस पोस्ट में अमित शाह ने अपनी नई जोहो की ईमेल आईडी भी शेयर की है. इस पोस्ट की लास्ट लाइन भी दिलचस्प है. अमित शाह ने लिखा है, ‘मेरी नई ईमेल आईडी amitshah.bjp@zohomail.in है. मेल के जरिए फ्यूचर कॉरेंस्पॉन्डेंस के लिए इसी ईमेल आईडी का इस्तेमाल करें’  आखिरी लाइन में अमित शाह ने लिखा है, ‘Thank you for your kind attention to this matter’. दिलचस्प ये है कि X पर पोस्ट के आखिर में ये लाइन इन दिनों अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप भी खूब इस्तेमाल कर रहे हैं. अमित शाह के X पोस्ट के बाद Zoho का रिप्लाई भी आ गया है. Zoho Workplace ने रिप्लाई में शाह का शुक्रिया अदा किया है. कंपनी ने लिखा है कि नैशनल लीडर्शिप का इंडियन इनोवेशन को अपनाना बेहद इंस्पायरिंग है. Zoho के फाउंडर का आया रिप्लाई  अमित शाह के पोस्ट के बाद Zoho फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने एक पोस्ट किया है जिसमें Amit Shah को टैग करते हुए उनका शुक्रिया अदा किया है. वेम्बू ने लिखा है कि वो इस मोमेंट को उन इंजीनियर्स को डेडिकेट करना चाहते हैं जो पिछले 20 सालों से हार्ड वर्क कर रहे हैं.  ग़ौरतलब है कि Zoho बेंगलुरू बेस्ड प्राइवेट कंपनी है जिसे श्रीधर वेम्बू ने शुरू किया था. इस कंपनी के पास 45 से ज्यादा प्रोडक्ट्स और सर्विसेज हैं. छोटे बिजसनेसेज के लिए ख़ास तौर पर कंपनी के पास दर्जनों टूल्स अवेलेबल हैं. WhatsApp राइवल सव्देशी ऐप अरट्टई भी Zoho का ही है और ये भी खूब सुर्खियां बटोर रहा है. Zoho के पास माइक्रोसॉफ्ट और गूगल के टूल्स के राइवल भी हैं. यानी MS Word से लेकर PowerPoint जैसे विकल्प Zoho कम कीमत पर प्रोवाइड करता है. हाल ही में कंपनी का Arattai ऐप काफी वायरल हो रहा है.  Zoho Workplace के तहत भी कंपनी गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के कई टूल्स का विकल्प देती है. अगर कॉस्ट अनालिसिस करें तो Zoho के टूल्स छोटे व्यापारियों और कंपनियों के लिए सस्ता है. क्योंकि Zoho के पास बिज़नेस से जुड़ी हर ऐक्टिविटी मेंटेन करने से लेकल बिल जेनेरेट करने तक का टूल अवेलेबल है.  हाल ही में Zoho मे Paytm और PhonePe की तरह ही POS मशीन भी लॉन्च किया है. इसमें साउंडबॉक्स और QR कोड सिस्टम शआमिल हैं. यानी दुकानों पर अब आपको Zoho के QR कोड और मशीन दिख सकते हैं. 

शरणार्थियों के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने UN की नीतियों पर सवाल उठाए

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी द्वारा भारत में प्रवासियों को 'शरणार्थी कार्ड' जारी करने की प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की है। जस्टिस कांत ने कहा, “उन्होंने यहां शोरूम खोल रखा है और प्रमाणपत्र बांट रहे हैं।” यह टिप्पणी उस समय आई जब न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ सूडान के एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो वर्ष 2013 से भारत में रह रहा है। ऑस्ट्रेलिया में शरण की कोशिश लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने बताया कि उसकी पत्नी और बच्चे को संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) द्वारा 'शरणार्थी कार्ड' जारी किए गए हैं। उसका कहना था कि वह ऑस्ट्रेलिया में शरण लेने की प्रक्रिया में है और इस दौरान भारत में उसे अस्थायी सुरक्षा प्रदान की जाए। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने दलील दी कि जिन व्यक्तियों को UNHCR से 'शरणार्थी कार्ड' मिले हैं, उन्हें गृह मंत्रालय और विदेशी नागरिक पंजीकरण कार्यालय (FRO) द्वारा अलग तरीके से देखा जाता है। मुरलीधर ने यह भी बताया कि रिफ्यूजी कार्ड जारी करने से पहले कड़ी जांच की जाती है और यह प्रक्रिया कई वर्षों तक चलती है। उन्होंने कहा, "इसके लिए दस्तावेज और फॉर्म भरे जाते हैं, जो रिफ्यूजी स्थिति को कुछ महत्व देते हैं।" उन्होंने यहां शोरूम खोल रखा है- जस्टिस सूर्य कांत हालांकि, इस पर न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “उन्होंने (संयुक्त राष्ट्र एजेंसी) यहां शोरूम खोल रखा है, वे प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं… हम उन पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते।” न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने यह भी कहा कि भारत ने अभी तक शरणार्थियों के अधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संधि यानी 'रिफ्यूजी कन्वेंशन' पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया, “हमारे देश के आंतरिक कानून में शरणार्थियों के लिए कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।” मुरलीधर ने स्वीकार किया कि भारत ने उस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, लेकिन उन्होंने अदालत को बताया कि पिछले दो महीनों से दिल्ली में अफ्रीकी मूल के लोगों को बिना वजह हिरासत में लिया जा रहा है। उन्होंने कहा, “यह वास्तविक भय और आशंका का विषय है… हम ऑस्ट्रेलिया में शरण पाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं और इसी बीच यह कार्रवाई शुरू हो गई है।” “सीधे ऑस्ट्रेलिया क्यों नहीं चला जाता” इस पर न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि याचिकाकर्ता सीधे ऑस्ट्रेलिया क्यों नहीं चला जाता। मुरलीधर ने उत्तर दिया कि वह ऐसा करना चाहता है, लेकिन तब तक अदालत से अस्थायी संरक्षण की उम्मीद रखता है। हालांकि, पीठ इस पर सहमत नहीं हुई। जस्टिस कांत ने अंतरिम राहत देने में अनिच्छा जताते हुए कहा, "हमें बहुत सावधानी बरतनी होगी। लाखों लोग यहां बैठे हैं। अगर कोई इस तरह का प्रयास करता है, तो…" जब मुरलीधर ने बताया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी इस मामले पर संज्ञान लिया है, तब अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वह आयोग से किसी भी आगे की दिशा में राहत (जैसे, ‘नो कोर्सिव एक्शन’) की मांग कर सकता है। यह उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष मई माह में न्यायमूर्ति दिपांकर दत्ता की पीठ ने भी रोहिंग्या शरणार्थियों से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि भारत में UNHCR कार्ड के आधार पर कोई राहत नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह कानूनी रूप से मान्य दस्तावेज नहीं है।

गिरफ्तारी में Supreme Court की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट ने CBI को किया सख्त चेतावनी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में पुलिस हिरासत में एक आदिवासी शख्स की मौते के मामले में सीबीआई को फटकार लगाई है। कोर्ट ने पूछा है कि इस मामले के आरोपी दो पुलिस अफसरों को पकड़ने के लिए कोर्ट के आदेश की जररूत क्यों है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई से जवाब मांगा है। मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने राज्य सरकार से निलंबित अधिकारियों के खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई के बारे में भी जानकारी देने को कहा है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगाते हुए कहा, आप इतने दिनों में उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं कर पाए? सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन इस तरह नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि हमने कहा था कि हम मुख्य सचिव को आज उपस्थित रहने के लिए कहेंगे, इसलिए आपने कार्रवाई की। आप बताइए कि ऐसा क्यों हुआ। हम इस मामले को बंद नहीं करेंगे। ये मामला जुलाई 2024 में एक आदिवासी युवक देव पारधी की पुलिस हिरासत में मौत से जुड़ा है। मध्य प्रदेश के म्याना पुलिस स्टेशन के दो अधिकारियों पर देव पराधी प्रताड़ित कर मार डालने का आरोप है। आरोप है कि पीड़ित के चाचा, जो एकमात्र चश्मदीद गवाह थे, उन पर भी बेरहमी से हमला किया गया और कथित तौर पर उनकी गवाही को कमज़ोर करने के लिए उन्हें कई मामलों में फसाया गया। इस साल मई में, सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय जांच कई खामियां पाई थीं जिसके बाद, मामला सीबीआई को सौंप दिया और एक महीने के भीतर आरोपियों की गिरफ्तारी का आदेश दिया।चार महीने से ज़्यादा समय तक भी जब गिरफ्तारी नहीं हुई तो पीड़ित परिवार ने अदालत की अवमानना ​​की याचिका के साथ फिर से कोर्ट का रुख किया, जिसमें अदालत के 15 मई के आदेश की जानबूझकर अवज्ञा करने का आरोप लगाया गया। इससे पहले 25 सितंबर को, पीठ ने फरार पुलिस अधिकारियों का वेतन देना जारी रखने और उनको सस्पेंड करने में देरी करने के लिए राज्य की कड़ी आलोचना की थी। वहीं इसके एक दिन बाद कोर्ट ने दो पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तार न करने के लिए मध्य प्रदेश सरकार और सीबीआई को फिर से फटकार लगाई और उन्हें कोर्ट के निर्देशों का पालन करने का एक आखिरी मौका दिया। आज, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल राजा ठाकरे ने कोर्ट को सूचित किया कि दोनों अधिकारियों उत्तम सिंह और संजीव सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया है। सीबीआई की ओर से वरिष्ठ वकील ने कहा, हमने निर्देशों का पालन किया है और दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है। उत्तम सिंह को इंदौर में गिरफ्तार किया गया था, और संजीव सिंह को 5 अक्टूबर को शिवपुरी में हिरासत में लिया गया था। हालांकि कोर्ट ने कहा कि वह इस बात का सफाई चाहता है कि कोर्ट की अवमानना ​​याचिका दायर होने के बाद ही गिरफ्तारी क्यों हुई।

TTP ने मचाई तबाही: बम धमाके और गोलीबारी में पाक सेना को भारी नुकसान, 11 की जान गई

इस्लामाबाद पाकिस्तान के अफगानिस्तान सीमा के पास बुधवार को उग्रवादियों ने एक सैन्य काफिले पर घात लगाकर हमला किया, जिसमें नौ पैरामिलिट्री सैनिक और दो अधिकारी मारे गए. इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तानी तालिबान ने ली है. पाकिस्तान सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि काफिले पर सड़क किनारे बम लगाए गए थे और उसके बाद काफिले पर गोलीबारी की गई. यह हमला उत्तर-पश्चिमी जिले कुर्रम में हुआ. पाकिस्तानी तालिबान, जिन्हें तेहरिक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) कहा जाता है, हाल के महीनों में पाकिस्तान के सुरक्षा बलों के खिलाफ हमलों को तेज कर चुके हैं. ये समूह सरकार को उखाड़ फेंककर कड़े इस्लामी शासन की स्थापना चाहता है. अफगानिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आते हैं मिलिटेंट इस्लामाबाद का आरोप है कि तालिबान के मिलिटेंट अफगानिस्तान की सीमापार से अपनी ट्रेनिंग लेते हैं और पाकिस्तान के खिलाफ हमलों की योजना बनाते हैं. हालांकि, काबुल यह आरोप झूठा मानता है. सुरक्षा स्थिति बिगड़ी, हिंसा में बढ़ोतरी इस्लामाबाद में सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज (CRSS) ने सोमवार को एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें पिछले तीन महीनों में पाकिस्तान में आतंकवादी हमलों और सैन्य कार्रवाई में हुई हताहतों के आंकड़े बताए गए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इन तीन महीनों में कम से कम 901 लोग मारे गए और 599 घायल हुए. यह कुल 329 हिंसक घटनाओं में हुआ, जिसमें आतंकवादी हमले और सेना के ऑपरेशन शामिल थे. यह पिछली तिमाही की तुलना में हिंसा में 46 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी है.