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CPCB रिपोर्ट ने खोला सच: दिल्ली-NCR में ओजोन प्रदूषण सीमा पार, NGT चिंता में

नई दिल्ली केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की नवीनतम रिपोर्ट, जिसमें दिल्ली-एनसीआर समेत कई भारतीय राज्यों में ज़मीनी स्तर पर ओज़ोन प्रदूषण के स्तर का विश्लेषण किया गया है, ने चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सीपीसीबी की रिपोर्ट में उजागर हुए खतरनाक ओज़ोन स्तरों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सीपीसीबी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में 10 शहरों के 178 निगरानी केंद्रों पर ओज़ोन स्तरों का विश्लेषण किया गया। इसमें पता चला कि दिल्ली-एनसीआर के 57 निगरानी केंद्रों में से 25 में ओज़ोन प्रदूषण आठ घंटे की सीमा से अधिक पाया गया, जबकि 21 स्थानों पर गर्मियों के दौरान ओज़ोन प्रदूषण एक घंटे की सीमा से अधिक पाया गया। एनजीटी विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) की एक रिपोर्ट पर आधारित एक समाचार रिपोर्ट का संज्ञान लेने के बाद इस मामले की सुनवाई कर रहा है। 6 अगस्त, 2024 को प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट में कहा गया था कि सीएसई की रिपोर्ट में शहरी भारत में ओज़ोन प्रदूषण में खतरनाक वृद्धि दिखाई गई है। दिल्ली-एनसीआर के अलावा, मुंबई के 45 में से 22 स्टेशनों पर ओजोन प्रदूषण का स्तर आठ घंटे की सीमा से अधिक पाया गया। दिल्ली-एनसीआर और मुंबई के अलावा, सीपीसीबी ने ग्रेटर हैदराबाद में 14 निगरानी स्टेशनों, बेंगलुरु महानगर क्षेत्र में 11, चेन्नई महानगर क्षेत्र में सात, पुणे महानगर क्षेत्र में 12, ग्रेटर अहमदाबाद में 10 और ग्रेटर लखनऊ व ग्रेटर जयपुर में छह-छह निगरानी स्टेशनों का विश्लेषण किया। सीपीसीबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि अन्य क्षेत्रों की तुलना में दिल्ली-एनसीआर और मुंबई महानगर क्षेत्र में ओज़ोन का स्तर अधिक पाया गया। यह मुख्य रूप से परिवहन, बिजली संयंत्रों और औद्योगिक गतिविधियों से उत्सर्जित नाइट्रोजन ऑक्साइड के कारण था। रिपोर्ट में कहा गया है कि ओज़ोन मुख्य रूप से सूर्य के प्रकाश में वाहनों, उद्योगों और बिजली संयंत्रों से उत्सर्जित नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCS) और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) की रासायनिक प्रतिक्रिया से बनता है। विशेषज्ञ समिति के गठन का प्रस्ताव रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और सीपीसीबी ने ओज़ोन और उसके कारकों को नियंत्रित करने के उपायों की सिफारिश करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन का प्रस्ताव रखा है। इसमें यह भी कहा गया है कि एक अन्य मामले में दायर एक रिपोर्ट में ओजोन और उसके कारणों को नियंत्रित करने के लिए एक अध्ययन करने का सुझाव दिया गया है। सुनवाई के दौरान, सीपीसीबी ने अनुरोध किया कि इस मामले से संबंधित दो आवेदनों पर एक साथ सुनवाई की जाए। अनुरोध स्वीकार करते हुए, एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई 12 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी। ओजोन प्रदूषण क्या है? ओज़ोन तीन ऑक्सीजन परमाणुओं से बनी एक गैस है। आकाश में ऊपर, यह हमें सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती है, लेकिन जमीन के पास, यह एक प्रदूषक बन जाती है। यह किसी भी स्रोत से सीधे उत्सर्जित नहीं होती, बल्कि वाहनों, उद्योगों और बिजली संयंत्रों द्वारा सूर्य के प्रकाश में उत्सर्जित नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCS) और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) की रासायनिक प्रतिक्रिया से बनती है। यह गैस अत्यधिक प्रतिक्रियाशील होती है और हवा के माध्यम से लंबी दूरी तक फैल सकती है। यह शहरों और गांवों को प्रभावित करती है। ओजोन हॉटस्पॉट और उनके प्रभाव हर शहर में कुछ विशिष्ट क्षेत्र होते हैं जहां ओजोन का स्तर सबसे अधिक होता है। इन हॉटस्पॉट में प्रदूषण का प्रभाव अधिक गंभीर होता है। ओजोन श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचाता है और अस्थमा व ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों को बढ़ाता है। यह बच्चों, बुज़ुर्गों और श्वसन संबंधी समस्याओं वाले लोगों के लिए खतरनाक है। यह फसलों को भी नुकसान पहुंचाता है, जिससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है। ओजोन प्रदूषण के कारण ओजोन में वृद्धि मौसम और प्रदूषण के स्रोतों पर निर्भर करती है। गर्मी और सूरज की रोशनी इसकी रासायनिक प्रतिक्रिया को तेज करती है। वाहन, उद्योग, कचरा जलाना और ठोस ईंधन का उपयोग इसके मुख्य कारण हैं।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा अल्पसंख्यक स्कूलों का TET विवाद, याचिका में मांगी न्यायिक हस्तक्षेप

नई दिल्ली अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई (शिक्षा का अधिकार कानून) के दायरे से बाहर रखना और वहां के शिक्षकों को टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) से छूट देना बच्चों के योग्य शिक्षकों से शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है। ये बात अल्पसंख्यक स्कूलों के शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्य योग्यता से बाहर रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हस्तक्षेप अर्जी में कही गई है। अर्जीकर्ता खेम सिंह भाटी ने अल्पसंख्यक स्कूलों के शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से छूट के मामले में पक्ष रखने की इजाजत मांगते हुए कहा है कि टीईटी शिक्षा के अधिकार का अहम हिस्सा है इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों को योग्य और सक्षम शिक्षक पढ़ाएं। शिक्षा के अधिकार में अच्छी शिक्षा पाने का अधिकार शामिल है। इसीलिए अल्पसंख्यक स्कूलों को टीईटी की अनिवार्यता से छूट दिया जाना बच्चों के साथ अन्याय है और उनके योग्य शिक्षकों से शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है।   मामला बड़ी पीठ को भेजा सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा एक से कक्षा आठ तक को पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य करने के गत एक सितंबर के फैसले में अल्पसंख्यक स्कूलों को फिलहाल इससे छूट देते हुए उनका मामला विचार के लिए बड़ी पीठ को भेज दिया था। दो न्यायाधीशों की पीठ ने अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई के दायरे से बाहर बताने वाले पांच न्यायाधीशों के प्रमति एजूकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट मामले में पूर्व में दिए फैसले पर सवाल उठाते हुए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया था। तमिलनाडु सहित कई राज्यों के मामले लंबित हैं। इसमें चीफ जस्टिस को सुनवाई के लिए उचित पीठ गठित करनी है। इसी मामले में डॉक्टर खेम सिंह भाटी ने ये हस्तक्षेप अर्जी दाखिल की है। अर्जी में कहा गया है कि अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई के दायरे से बाहर रखने के प्रमति जजमेंट में कानून की सही व्यवस्था नहीं दी गई है। आरटीई कानून सभी बच्चों के लिए गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया था लेकिन प्रमति जजमेंट में अल्पसंख्यक स्कूलों को इसके दायरे से बाहर करने से ये उद्देश्य कमजोर होता है, क्योंकि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का योग्य शिक्षकों से शिक्षा पाने का अधिकार बाधित होता है। टीईटी शिक्षा के अधिकार का अहम हिस्सा कहा गया है कि अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन और प्रशासन के संविधान के अनुच्छेद 30 (1) में मिले अधिकार और प्रत्येक बच्चे को अनुच्छेद 21ए में मिले मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के बीच एक संतुलित व्याख्या होनी चाहिए। ऐसी व्याख्या होनी चाहिए कि दो में से किसी का भी अधिकार पूर्ण रूप से समाप्त न हो। टीईटी शिक्षा के अधिकार का अहम हिस्सा है इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों को योग्य और सक्षम शिक्षक पढ़ाएं। शिक्षा के अधिकार में अच्छी शिक्षा पाने का अधिकार शामिल है इसीलिए अल्पसंख्यक स्कूलों को टीईटी की अनिवार्यता से छूट दिया जाना बच्चों के साथ अन्याय है और उनके योग्य शिक्षकों से शिक्षा पाने के अधिकार का उल्लंघन है।  

नेपाल आपदा: भारी बारिश से हाहाकार, सैकड़ों यात्री फंसे और दर्जनों की मौत

नई दिल्ली पड़ोसी देश नेपाल में कुदरत का कहर देखने को मिला है। पूर्वी नेपाल के इलम में पिछले 24 घंटों में बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं में कम से कम 42 लोगों की जान गई है। इसके साथ ही कई फ्लाइट को डायवर्ट किया गया है। दरअसल,रविवार सुबह तक सूर्योदय नगर पालिका में भूस्खलन में कम से कम 5 लोग, मंगसेबुंग नगर पालिका में 3 और इलम नगर पालिका में 6 लोगों की मौत की खबर है। इस आपका के बाद प्रशासन राहत के कामों में लग गया है।   बढ़ सकती है मृतकों की संख्या वहीं,एसएसपी पोखरेल ने समाचार एजेंसी एएनआई से फोन पर बातचीत में कहा कि इस आपदा में मरने वालों की संख्या में इजाफा हो सकता है। वर्तमान में नुकसान का आकलन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि अभी तक हमारे पास केवल नुकसान और क्षति का प्रारंभिक विवरण है। प्रभावित इलाकों में सुरक्षा एजेंसियों के तीनों स्तरों (जिसमें नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस शामिल है) को तैनात किया गया है। भारी बारिश और आगे भी बारिश को लेकर चेतावनी जारी की गई है। इस बीच नदियां उफान पर हैं। काठमांडू घाटी के बाढ़ के मैदानों से निवासियों को निकालने के लिए उन्हें तैनात किया गया है। नदियों के किनारे तलाशी अभियान जारी सुरक्षा एजेंसियों ने शनिवार को घाटी से होकर गुजरने वाली सभी प्रमुख नदियों के किनारे बसी बस्तियों में तलाशी अभियान चलाया। एजेंसियों ने घर-घर में जाकर तलाशी ली, निवासियों को बाहर निकलने में मदद की और उनके सामान को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में मदद की। इन नदियों का जलस्तर बढ़ने की संभावना नेपाल के जल विज्ञान और मौसम विज्ञान विभाग ने बागमती, हनुमंते, मनोहरा, धोबी खोला, बिष्णुमती, नक्खू और बल्खू नदियों में जलस्तर बढ़ने की जानकारी दी है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि बाढ़ सड़क किनारे के इलाकों तक पहुंच सकती है और बस्तियों में घुस सकती है। निवासियों और वाहन चालकों से बाढ़ के खतरे के कारण नदी के किनारे यात्रा करने से बचने का आग्रह किया गया है। 

मूर्ति विसर्जन पर तनाव: कटक में हिंसा, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर अस्थायी प्रतिबंध

कटक  ओडिशा के कटक जिले से बड़ी खबर सामने आई है, जहां गणेश और अन्य मूर्तियों के विसर्जन के दौरान दो गुटों में हिंसक झड़प हुई। विवाद बढ़ने और स्थिति नियंत्रण से बाहर होने के कारण राज्य सरकार ने सुरक्षा कड़ी करते हुए सोशल मीडिया और इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी रोक लगा दी है। सरकारी अधिसूचना के मुताबिक यह रोक आज शाम सात बजे से अगले दिन शाम सात बजे तक लागू रहेगी। इसमें विशेष रूप से कट्टक म्युनिसिपल कॉरपोरेशन, कट्टक डेवलपमेंट अथॉरिटी (CDA) और 42 मौजा इलाके शामिल हैं। सरकार ने बताया कि यह कदम गलत सूचनाओं, अफवाहों और भड़काऊ संदेशों के प्रसार को रोकने के लिए जरूरी था। प्रशासन ने नागरिकों से अपील की है कि वे शांति बनाए रखें और किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें। इसके अलावा, स्थिति पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती बढ़ा दी गई है, और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष नवीन पटनायक ने कहा कि कटक में बढ़ती हिंसा चिंता का विषय है। उन्होंने सभी पक्षों से संयम और शांति बनाए रखने की अपील की। पटनायक ने कहा कि ओडिशा की परंपरा हमेशा से भाईचारे और सामूहिक सौहार्द की रही है, और सभी को इसे बनाए रखने में मदद करनी चाहिए। बीजेडी की ओर से जारी बयान में भी इस बात पर जोर दिया गया कि सभी पक्षों को संयम दिखाना चाहिए ताकि हालात और बिगड़े नहीं।

चार्जर से टूटा आतंकी नेटवर्क: मोहम्मद यूसुफ की इनसाइड स्टोरी सामने आई

जम्मू  जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए एक ओवर ग्राउंड वर्कर (OGW) मोहम्मद यूसुफ कटारी ने 22 अप्रैल को पहलगाम हमले में शामिल आतंकवादियों से चार बार मुलाकात की थी और उन्हें एक एंड्रॉइड फोन चार्जर दिया था। बाद में यह एक महत्वपूर्ण सबूत बना जिसके आधार पर उसे पकड़ लिया गया। अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी। 26 वर्षीय कटारी को सितंबर के आखिरी हफ्ते में सुलेमान उर्फ ​​आसिफ, जिबरान और हमजा अफगानी को महत्वपूर्ण रसद सहायता प्रदान करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। ये तीनों आतंकवादी पहलगाम के रिसॉर्ट शहर में 26 लोगों, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे, की गोली मारकर हत्या कर दी थी। अधिकारियों ने बताया कि कटारी ने पूछताछ के दौरान पुलिस को बताया कि वह श्रीनगर शहर के बाहर जबरवान पहाड़ियों में चार बार इन तीनों से मिला था। हफ्तों की जांच के बाद उसकी गिरफ्तारी हुई। यह सफलता ऑपरेशन महादेव के स्थल से प्राप्त सामग्री के गहन फोरेंसिक विश्लेषण के बाद मिली है। ऑपरेशन महादेव जुलाई में शुरू किया गया एक आतंकवाद-रोधी अभियान था, जिसके परिणामस्वरूप श्रीनगर के बाहरी इलाके में जबरवान रेंज की तलहटी में पहलगाम नरसंहार में शामिल तीन आतंकवादी मारे गए थे। पुलिस ने आंशिक रूप से नष्ट हुए एंड्रॉइड मोबाइल फोन चार्जर की जांच के बाद कटारी पर ध्यान केंद्रित किया, जो ऑपरेशन के दौरान बरामद कई वस्तुओं में से एक था। श्रीनगर पुलिस ने आखिरकार चार्जर के असली मालिक का पता लगा लिया, जिसने फोन को एक डीलर को बेचने की पुष्टि की। यही वह जानकारी थी जिसने धीरे-धीरे पुलिस को कटारी तक पहुंचाया। अधिकारियों ने बताया कि कटारी, जो कथित तौर पर ऊंचे इलाकों में खानाबदोश छात्रों को पढ़ाता था, आतंकवादी समूह के लिए एक प्रमुख स्रोत था। माना जाता है कि उसकी मदद से हमलावरों को चार्जर उपलब्ध कराया गया और दुर्गम इलाकों में उनका मार्गदर्शन किया गया। आतंकवादी सुलेमान उर्फ ​​आसिफ (पहलगाम हमले का मास्टरमाइंड), जिबरान (अक्टूबर 2024 के सोनमर्ग सुरंग हमले से जुड़ा) और हमजा अफगानी 29 जुलाई को ऑपरेशन महादेव के तहत एक मुठभेड़ में मारे गए। हालांकि, अधिकारियों ने चल रही जांच का हवाला देते हुए और जानकारी देने से इनकार कर दिया, लेकिन इस गिरफ्तारी को कश्मीर घाटी में सक्रिय आतंकी नेटवर्क को ध्वस्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि यह मामला अंततः राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपा जा सकता है, जो पहले से ही पहलगाम हमले की व्यापक साजिश की जांच कर रही है। एनआईए ने 22 अप्रैल के आतंकी हमले के सिलसिले में अब तक दो लोगों को गिरफ्तार किया है, जिन पर आतंकवादियों को कथित तौर पर रसद सहायता और आश्रय प्रदान करने का आरोप है।  

सुरक्षा बलों की छापेमारी: PLA से जुड़े 15 आरोपी पकड़ में आए

इंफाल मणिपुर घाटी स्थित प्रतिबंधित समूह पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के खिलाफ सुरक्षा बलों ने बड़ी कार्रवाई की है। इस दौरान पिछले महीने असम राइफल्स के काफिले पर हुए हमले में शामिल 15 सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है। काफिले पर हमले में दो जवानों का बलिदान हुआ था। मुख्य आरोपी ठौंगराम सदानंद सिंह उर्फ पुरकपा (18 वर्षीय) और खोंद्राम ओजित सिंह उर्फ केइलाल (47 वर्षीय) को नंबोल घटना के 72 घंटों के भीतर पकड़ा गया। सुरक्षा एजेंसियां यह भी जांच कर रही हैं कि क्या पीएलए किसी राजनीतिक संरक्षण के तहत काम कर रहा है। यह जांच ऐसे समय में हो रही है जब एक और प्रमुख उग्रवादी समूह यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) ने हाल ही में युद्धविराम की घोषणा की है और 24 कुकी उग्रवादी समूहों द्वारा केंद्रीय गृह मंत्रालय के साथ पहले से हस्ताक्षर किए गए ऑपरेशन निलंबन समझौते में शामिल होने के लिए सहमति जताई है। आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि कुछ समूह राष्ट्रपति शासन को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं, जो राज्य में गंभीर जातीय हिंसा को रोकने में मददगार साबित हुआ है। ये समूह यह प्रचार कर रहे हैं कि वर्तमान प्रशासन असफल है और निलंबित विधानसभा को तुरंत बहाल किया जाना चाहिए। असम राइफल्स के काफिले पर 19 सितंबर को नंबोल साबल लैकेई में हमला हुआ था, जहां सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (आफ्सपा) लागू नहीं है और आमतौर पर सीआरपीएफ सड़क सुरक्षा करती है। इस हमले में नायब सूबेदार श्याम गुरूंग और राइफलमैन रंजीत सिंह कश्यप की मौत हुई। यह मणिपुर में केंद्रीय सुरक्षा बलों पर पहला हमला था, जब से मई 2023 में कुकी-जो और मेतेई समुदायों के बीच हिंसा शुरू हुई थी। जांच के दौरान पता चला कि बरामद हथियारों में से छह हथियार पहले की जातीय झड़पों में पुलिस शस्त्रागार से लूटे गए थे, जिससे पता चलता है कि ये हथियार अब उग्रवादी समूहों के हाथ लग रहे हैं। नंबोल हमले में इस्तेमाल हुई एक वैन भी मूतुम यांगबी से बरामद हुई, जो हमले के स्थल से लगभग 12 किलोमीटर दूर है। यूएनएलएफ के सदस्य ठौंगराम सदानंद सिंह हाल ही में अपने समूह के हथियार डालने के बाद पीएलए में शामिल हुए थे। हालांकि, पीएलए ने नंबोल हमले की जिम्मेदारी नहीं ली। लेकिन अतीत में यह उग्रवादी समूह हमेशा अपने सभी हमलों की जिम्मेदारी लेता रहा है। खुफिया एजेंसियों को ऐसा संदेह है कि यह हमला राजनीतिक कारणों से हो सकता है, जिसका मकसद राज्य की नाजुक स्थिति को खराब करना, राष्ट्रपति शासन को बदनाम करना या लोकप्रिय सरकार के पुनर्गठन को रोकना हो। हमले के बाद राज्यपाल अजय भल्ला की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय बैठक हुई, जिसमें सभी सुरक्षा एजेंसियों को हमलावरों को जल्द पकड़ने और मुख्य मार्गों की सुरक्षा बढ़ाने का निर्देश दिया गया।

केंद्र ने सिरप मौतों पर जताई चिंता, स्वास्थ्य सचिव ने राज्यों से रिपोर्टिंग और जांच में तेजी की अपील

नई दिल्ली मध्य प्रदेश और राजस्थान में कफ सिरप के चलते हुए बच्चों की मौत के बाद केंद्र सरकार एक्शन में आ गई है। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रधान सचिवों और स्वास्थ्य सचिवों के साथ आज एक अहम बैठक की। इस बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की, जिसमें खांसी की दवाओं की गुणवत्ता और उचित उपयोग पर चर्चा हुई। उन्होंने सभी दवा निर्माताओं को संशोधित शेड्यूल एम का सख्ती से पालन करने और नियमों का उल्लंघन करने वाले कारखानों के लाइसेंस रद्द करने का निर्देश दिया। साथ ही, खासकर बच्चों में खांसी की दवाओं का सही और सीमित उपयोग सुनिश्चित करने को कहा गया, क्योंकि अधिकांश खांसी स्वयं ही ठीक हो जाती है और दवाइयों की जरूरत नहीं होती। इस दौरान राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बेहतर निगरानी, समय पर रिपोर्टिंग, आईडीएसपी-आईएचआईपी की रिपोर्टिंग टूल का व्यापक प्रचार और सूचनाओं के आदान-प्रदान व संयुक्त कार्रवाई के लिए मजबूत समन्वय बनाए रखने की सलाह दी गई। 'कोल्ड्रिफ' पर CDSCO सख्त, तमिलनाडु एफडीए को कार्रवाई का निर्देश केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने सरेशान फार्मास्यूटिकल्स की तरफ से बनाई गई खांसी की दवा कोल्ड्रिफ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्णय लिया है। यह कदम उस समय उठाया गया जब कई बच्चे इस दवा पीने के बाद मृत पाए गए। सीडीएससीओ तमिलनाडु के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन को पत्र लिखकर कंपनी के खिलाफ सख्त कदम उठाने के लिए कहेगा।मृत बच्चों में मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा, राजस्थान के बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा केरल और तेलंगाना ने भी इस दवा का उपयोग रोकने के लिए जनता को चेतावनी जारी की है। कफ सिरप का उत्पादन करने वाली कंपनी पर लटकी तलवार वहीं दूसरी ओर सरकार कफ सिरप का उत्पादन करने वाली कंपनी पर सख्य कार्रवाई करने की तैयारी कर रही है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) तमिलनाडु एफडीए (खाद्य एवं औषधि प्रशासन) को 'कोल्ड्रिफ' सिरप निर्माता के खिलाफ सबसे गंभीर अपराधों के तहत सख्त कार्रवाई करने के लिए कहेगा। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में उन फैक्ट्रियों की जांच शुरू कर दी है जहां से संदिग्ध दवाएं बनी थीं। बता दें कि मामले में सीडीएससीओ ने 19 दवाओं के सैंपल इकट्ठे किए हैं, जिनमें खांसी की सिरप, एंटीबायोटिक और बुखार की दवाएं शामिल हैं। मध्य प्रदेश में नेक्स्ट्रो डीएस सिरप की बिक्री पर प्रतिबंध मध्य प्रदेश में एक और कंपनी नेक्स्ट्रो डीएस के खांसी की दवा के नमूनों की जांच अभी चल रही है। कुल 19 नमूने लिए गए हैं, जिनमें सिरप, एंटीबायोटिक, बुखार की दवा और ओन्डान्सेट्रॉन शामिल हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने तुरंत कोल्ड्रिफ और नेक्स्ट्रो डीएस सिरप की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है और इसी कंपनी के अन्य उत्पादों की बिक्री भी रोक दी है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस प्रतिबंध की घोषणा की। सभी राज्यों को केंद्र सरकार का निर्देश केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी राज्यों को सलाह दी है कि दो साल से कम उम्र के बच्चों को कफ सिरप न दी जाए। वहीं पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कफ सिरप का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह, सीमित मात्रा और सावधानी के साथ किया जाए। इसके साथ ही गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए नुकसानदेह दवाओं पर अब चेतावनी लेबल लगाना अनिवार्य होगा। क्या है खतरा? मामले में तंलगाना सरकार की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, कोल्ड्रिफ सिरप के इस बैच में डायएथिलीन ग्लाइकोल (डीईजी) नाम का जहरीला रसायन मिला है, जो शरीर के गुर्दों (किडनी) को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है और जानलेवा साबित हो सकता है। इसी कारण तेलंगाना में इस सिरप को लेकर लोगों को उपयोग तुरंत बंद करने की चेतावनी दी गई है।

यूक्रेन में रूसी मिसाइलों की बरसात: कई घायल, घरों के मलबे में तब्दील हुए इलाके

कीव रूस और यूक्रेन के बीच तीन साल से जारी संघर्ष में स्थिति और भयावह होती जा रही है। ध्यान देने वाली ये भी है कि अभी दूर-दूर तक इस संघर्ष के खत्म होने के आसार भी नहीं दिख रहे है। कारण है कि इन दिनों रूस का यूक्रेन पर हमला और तेज हो गया है। इस संघर्ष के ताजा अपडेट की बात करे तो शनिवार रात भर रूस ने यूक्रेन के खिलाफ बड़े पैमाने पर ड्रोन, मिसाइल और गाइडेड बमों से हमला किया, जिसमें कम से कम पांच आम नागरिक मारे गए। यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोदिमिर जेलेंस्की ने रविवार सुबह बताया कि रूस ने नौ अलग-अलग इलाकों में 50 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें और करीब 500 ड्रोन दागे। मृतकों में एक बच्चा भी शामिल पश्चिमी शहर लविव में हुए एक संयुक्त ड्रोन और मिसाइल हमले में पांच लोग की मौत हुई, जिनमें एक 15 साल का बच्चा भी शामिल है। इस हमले से दो इलाकों में बिजली गुलहो गई और सार्वजनिक यातायात भी कुछ घंटों के लिए बंद रहा। लविव के मेयर आंद्रिय सादोवी ने बताया कि शहर के बाहर एक व्यावसायिक परिसर में आग लगी, जो किसी सैन्य गतिविधि से जुड़ा नहीं था। और कहा-कहा हुआ हमला? इवानो-फ्रैंकिव्स्क क्षेत्र में भी एक व्यक्ति घायल हुआ, जबकि दक्षिणी शहर जापोरिज्जिया में एक महिला की मौत हो गई और नौ लोग घायल हुए। यहां ड्रोन और गाइडेड बमों से हमला किया गया, जिससे कई आवासीय भवन नष्ट हो गए और करीब 73,000 घरों में बिजली चली गई। इसके साथ ही पूर्वी डोनेट्स्क क्षेत्र के स्लोवियान्स्क में भी एक अपार्टमेंट पर हमला हुआ, जिसमें छह लोग घायल हुए। वहां कई घरों, दुकानों और कारों को नुकसान पहुंचा। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने पश्चिमी देशों से यूक्रेन को और अधिक वायु रक्षा प्रदान करने की अपील की ताकि इस हवाई आतंक को रोका जा सके। यूक्रेन ने भी लंबी दूरी से हमले किए रूसी हमलों के जवाब में यूक्रेन ने भी रूस के कई ठिकानों पर लंबी दूरी से हमले किए हैं, खासकर रूस के तेल उद्योग को निशाना बनाकर, जिससे वहां ईंधन की कमी बनी हुई है। रूस ने सर्दियों से पहले यूक्रेन की बिजली आपूर्ति और रेलवे नेटवर्क पर हमले तेज कर दिए हैं, जिससे नागरिकों को गर्मी, बिजली और पानी की समस्या हो रही है। शॉस्तका शहर में हुए हालिया हमले में एक व्यक्ति की मौत हुई और कई घायल हुए। इससे साफ है कि युद्ध जारी है और आम लोगों को भारी नुकसान पहुंच रहा है।  

दार्जिलिंग में प्राकृतिक आपदा: भूस्खलन में 18 मृत, राष्ट्रपति और पीएम ने जताया शोक

दार्जिलिंग उत्तर बंगाल में लगातार भारी बारिश से जनजीवन अस्त-व्यस्त है। दार्जिलिंग जिले में हुए भूस्खलन और पुल टूटने की घटनाओं में अब तक 18 लोगों की मौत हो गई है और दो लोग लापता बताए जा रहे हैं। मौक का आंकड़ा बढ़ने की आशंका है। जानकारी के मुताबिक, मिरिक और सुखिया क्षेत्रों में भूस्खलन के कारण कई लोग हताहत हुए हैं। इस हादसे के बाद दार्जिलिंग जिला पुलिस राहत और बचाव कार्य में जुटी हुई है। वहीं कालिम्पोंग में स्थिति अब भी गंभीर बनी हुई है। लगातार बारिश से कई इलाकों का संपर्क टूट गया है और सड़क यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पीएम मोदी ने जनहानि पर जताया दुख प्रधानमंत्री मोदी ने दार्जिलिंग में पुल ढहने की घटना पर दुख जताया है। पीएम मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा- दार्जिलिंग में एक पुल दुर्घटना में हुई जान-माल की हानि से अत्यंत दुःखी हूं। जिन लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके प्रति संवेदना। घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूं। भारी बारिश और भूस्खलन के मद्देनजर दार्जिलिंग और आसपास के इलाकों की स्थिति पर कड़ी नजर रखी जा रही है। हम प्रभावित लोगों को हर संभव सहायता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। राष्ट्रपति ने भी हादसे पर जताया दुख राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस हादसे पर दुख जताया है। एक्स पर राष्ट्रपति भवन की तरफ से किए पोस्ट में लिखा गया- पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में भारी बारिश और भूस्खलन के कारण हुई दुखद जनहानि अत्यंत दुखद है। मैं शोक संतप्त परिवारों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करती हूं। मैं बचाव एवं राहत कार्यों की सफलता की प्रार्थना और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करती हूं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दार्जिलिंग में भारी बारिश के कारण हुई जान-माल की हानि पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) की टीमों को वहां तैनात किया गया है और जरूरत पड़ने पर और जवानों को भेजा जाएगा। शाह ने कहा कि उन्होंने दार्जिलिंग के सांसद राजू बिष्ट से भी बात की और वहां की स्थिति का जायजा लिया। शाह ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, दार्जिलिंग में भारी बारिश के कारण हुई दुखद जान-माल की हानि से गहरा दुख हुआ। मेरी संवेदनाएं उन लोगों के साथ हैं जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है। घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूं। गृह मंत्री ने कहा कि एनडीआरएफ की टीमें मौके पर पहुंच चुकी हैं और जरूरत पड़ने पर और टीमें भी वहां भेजी जाएंगी। उन्होंने यह भी कहा, भाजपा कार्यकर्ता भी जरूरतमंद लोगों को आवश्यक सहायता दे रहे हैं। लोहे का पुल ढहा, आवाजाही हुई बाधित पश्चिम बंगाल में भारी बारिश के कारण दुधिया में लोहे के पुल का एक हिस्सा ढह जाने के बाद सिलीगुड़ी-दार्जिलिंग एसएच-12 सड़क पर वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित कर दी गई है। मिरिक-सुखियापोखरी रोड के पास भूस्खलन सबसे बड़ा भूस्खलन मिरिक-सुखियापोखरी रोड के पास हुआ, जिसने कई घर बहा दिए और वाहनों की आवाजाही बाधित कर दी। इससे आसपास के कई छोटे गांवों से संपर्क टूट गया। दार्जिलिंग उप-निबंधक रिचर्ड लेप्चा ने कहा कि सात लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि अन्य के फंसे होने की आशंका है। लगातार बारिश के कारण राहत और बचाव कार्य प्रभावित हो रहा है। स्थानीय लोगों और स्वयंसेवकों की मदद से राहत अभियान चल रहा है। कई घर भी क्षतिग्रस्त हुए हैं। भाजपा सांसद ने घटना पर जताया दुख वहीं इस घटना पर भाजपा सांसद राजू बिस्ता ने दुख जताया है। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा दार्जिलिंग और कलिम्पोंग जिलों के कई हिस्सों में अत्यधिक भारी बारिश के कारण हुए भारी नुकसान के बारे में जानकर मुझे बेहद दुख हुआ है। मौतें हुई हैं, संपत्ति का नुकसान हुआ है और बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा है। मैं स्थिति का जायजा ले रहा हूं और संबंधित अधिकारियों के संपर्क में हूं। कार्यकर्ताओं को लोगों की मदद करने का दिया निर्देश- राजू एक्स पर अपने पोस्ट में उन्होंने आगे लिखा- हमने अपने भाजपा कार्यकर्ताओं को लोगों की मदद और सहायता के लिए जुटने का निर्देश पहले ही दे दिया है। हम अपने लोगों की मदद और सहायता के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। मैं अपने सभी गठबंधन सहयोगियों और क्षेत्र के अन्य राजनीतिक और सामाजिक संगठनों से भी समन्वय स्थापित करने की अपील करता हूं ताकि हम जरूरतमंद लोगों तक समय पर मदद और सहायता पहुंचा सकें।   अनौपचारिक रिपोर्ट्स में मृतकों की संख्या 11 तक पहुंची जिले के अधिकारियों के अनुसार, बिश्नुलाल गांव, वार्ड 3 लेक साइड और जसबीर गांव सबसे अधिक प्रभावित हुए। इस क्षेत्र से छह लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि एक व्यक्ति चाय बगान में मृत पाया गया। कई घर और चाय बगान के क्वार्टर मलबे में दब गए हैं। मामले में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि भारी और लगातार बारिश के कारण प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। 'भूमि खिसकने और कई घर क्षतिग्रस्त होने की रिपोर्ट हैं। नुकसान का पूरा आकलन अभी नहीं हो पाया है।' उन्होंने यह भी कहा कि मिट्टी और मलबे में राहत कार्य करने के लिए मशीनरी और आपातकालीन वाहन पहुंचाना बेहद कठिन है। अभी तक अनौपचारिक रिपोर्ट्स में मृतकों की संख्या 11 तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। बचाव दल मलबे और मिट्टी के भारी परतों को हटाकर और लोगों को बचाने में जुटा है। सीएम ममता बनर्जी ने जताया दुख, टोल फ्री नंबर जारी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस घटना पर दुख जताते हुए एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, 'मैं बहुत चिंतित हूं कि कल रात कुछ घंटों के भीतर अचानक भारी बारिश के कारण उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल दोनों के कई इलाके बाढ़ में डूब गए हैं, साथ ही बाहर से हमारे राज्य में अत्यधिक नदी का पानी आ गया है… राज्य मुख्यालय और जिलों में 24×7 नियंत्रण कक्ष हैं। कृपया मेरे नबान्न आपदा प्रबंधन नियंत्रण कक्ष से +91 33 2214 3526 और +91 33 2253 5185 पर संपर्क करें, जबकि टोल फ्री नंबर +91 86979 81070 और 1070 हैं।' 6 अक्तूबर तक अत्यधिक भारी बारिश का अलर्ट जारी … Read more

पहला घातक ट्रांसप्लांट: एक की मौत से दूसरे को मिली ज़िंदगी, उठे नैतिक सवाल

कनाडा कनाडा ने चिकित्सा इतिहास में एक भयंकर और विवादास्पद मील का पत्थर तय किया है। देश में पहली बार Medically Assisted Death (MAiD) यानि चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु  के माध्यम से मृत घोषित व्यक्ति का हृदय सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया गया। इस घटना में 38 वर्षीय ALS (अमायलोट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरोसिस) रोगी को पहले इच्छा मृत्यु दी गई फिर उसकी मृत्यु के सिर्फ सात मिनट बाद उसका हृदय "पुनर्जीवित" किया गया और अमेरिका ले जाकर प्रत्यारोपित किया गया। यह घटना बेशक Organ Donation after Euthanasia (ODE) के क्षेत्र में कनाडा को विश्व में अग्रणी बनाती है लेकिन इसने एक नई बहस भी छेड़ दी है। 2021 तक वैश्विक ODE मामलों में 286 में से 136 कनाडा में हुए। 2024 में कनाडा में हुए सभी अंग प्रत्यारोपणों में 5% अंग MAiD से आए। इसका मतलब यह है कि अब कनाडा मृत्यु और अंगदान के बीच एक नई, विवादास्पद कड़ी स्थापित कर रहा है। कनाडा के ओंटारियो प्रांत के 38 वर्षीय व्यक्ति, जो एएलएस (Amyotrophic Lateral Sclerosis) नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित थे, ने टोरंटो जनरल हॉस्पिटल में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) प्रक्रिया के तहत स्वेच्छा से जीवन समाप्त करने का निर्णय लिया। उनकी मृत्यु के तुरंत बाद, उनका हृदय एयरलिफ्ट कर पिट्सबर्ग (अमेरिका) भेजा गया, जहां यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग मेडिकल सेंटर में एक 50 वर्षीय हृदय रोगी में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित (ट्रांसप्लांट) किया गया।  कनाडा आज विश्व में MAiD के बाद अंगदान करने वाले देशों में अग्रणी बन चुका है। केवल 2023 में ही 13,000 से अधिक MAiD मामले दर्ज किए गए। हालांकि, इस प्रथा को लेकर देश में नैतिकता और मानवाधिकारों पर गंभीर बहस छिड़ गई है। आलोचकों का कहना है कि ऐसी प्रक्रियाओं में सहमति (consent) की पारदर्शिता और कमजोर मरीजों पर संभावित मानसिक दबाव जैसे मुद्दे गहराई से जांच के योग्य हैं। विशेषज्ञों की चेतावनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रणाली मानवाधिकारों और नैतिकता पर गंभीर सवाल उठाती है। ऐसे रोगी जो खुद को समाज या परिवार के लिए बोझ मानते हैं, वे “अर्थपूर्ण योगदान देने” के बहाने मृत्यु को अपनाने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। अंगदान की इच्छा कभी-कभी मौत का निर्णय प्रभावित कर सकती है, जिससे कमजोर व्यक्तियों पर अप्रत्यक्ष दबाव बन सकता है। कनाडा की स्वास्थ्य नीति अब एक ऐसी स्थिति में पहुंच चुकी है जहां सबसे कमजोर लोगों की मृत्यु का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए किया जा रहा है। कनाडा की स्वास्थ्य एजेंसियों और नैतिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अंगदान की प्रक्रिया को MAiD के साथ जोड़ने से समाज में नैतिक और कानूनी जोखिम पैदा हो सकते हैं। कुछ आलोचकों का कहना है कि यह प्रणाली मौत को केवल उपयोगी साधन बनाने की ओर जा रही है। वैश्विक स्तर पर, विशेषज्ञों ने पूछा है कि क्या कनाडा की यह नीति मानवाधिकारों के लिए खतरा नहीं है। मानवाधिकार और नैतिकता पर बहस गरम   इस मुद्दे पर सोशल मीडिय पर तीखी बहस छिड़ गई है।  Jason Gregor ने लिखा, “आप इस पोस्ट में कई अनुमान लगा रहे हैं। जब तक आप उनकी स्थिति में नहीं रहे, आपको अंदाजा नहीं है कि वे कैसा महसूस करते हैं। MAiD का उपयोग करने के लिए उन्हें स्वस्थ मानसिक स्थिति में होना जरूरी है। मृत्यु के बाद किसी की मदद करने का विकल्प होना उनके लिए स्वागतयोग्य हो सकता है। MAiD एक अविश्वसनीय विकल्प है।” Sreliata ने लिखा, “ALS का कोई इलाज नहीं है और पीड़ा निश्चित है। मैं नहीं समझता कि जब तक व्यक्ति अपने सही मानसिक हाल में है, वह इस रास्ते को क्यों नहीं चुन सकता? असिस्टेड ‘सुसाइड’ के विरोधी वही होते हैं जिन्होंने कभी शारीरिक कष्ट नहीं झेला।”वहीं Tybernicus ने सवाल उठाया, “क्या कनाडा में किसी को उस समय दिल की ज़रूरत नहीं थी या उसे सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बेचा गया? उस दिल के लिए कनाडा को कितना मिला? वह पैसा मृतक के परिवार को क्यों नहीं मिला?” Chokic ने लिखा, “मैंने भी असहनीय शारीरिक कष्ट झेला है, लेकिन मैं इसके खिलाफ हूं।”   Monica P ने कहा, “अगर ALS इतनी हालत बना दे कि जीना असंभव हो जाए, तो यह व्यक्ति का अधिकार है कि वह क्या करे। अगर वह अंगदान भी करना चाहे तो यह उसका निर्णय है। गूगल सर्च से पता चलता है कि इस बीमारी का अंत कितना भयानक होता है।” Van K Tran ने कहा, “इलाज खोजने की बजाय आप असिस्टेड सुसाइड चुनते हैं और अब इसमें एक ‘इंसेंटिव’ भी जुड़ गया है। इलाज शायद कभी न मिले, लेकिन यह रास्ता सवाल खड़े करता है।” कनाडा का यह कदम केवल चिकित्सा उपलब्धि नहीं है, बल्कि समाज और नैतिकता के लिए एक बड़ा सवाल भी है।     क्या अंगदान के नाम पर मौत को "उपयोगी" बनाना सही है?     क्या कमजोर रोगियों को अप्रत्यक्ष दबाव में जीवन समाप्त करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है?     यह बहस अब केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं रही।     यह मानवाधिकार, नैतिकता और समाज की संवेदनशीलता पर गहराई से सवाल उठा रही है।