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Aastha Pandey

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Jeffrey Epstein Case: अमेरिकी न्याय विभाग की वेबसाइट से 16 फाइलें गायब

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अमेरिकी न्याय विभाग की वेबसाइट से 16 एप्स्टीन से जुड़ी फाइलें गायब, ट्रंप की फोटो समेत महत्वपूर्ण दस्तावेज़ अचानक हट गए। पारदर्शिता पर विवाद बढ़ा। 21 दिसंबर 2025 — अमेरिका के न्याय विभाग (Department of Justice-DOJ) की वेबसाइट से कम से कम 16 दस्तावेज़ और तस्वीरें अचानक गायब हो गई हैं, जो पहले सार्वजनिक रिकार्ड के हिस्से के रूप में पोस्ट किए गए थे। इन फाइलों में कुछ ऐसे चित्र शामिल थे जिनमें पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, एप्स्टीन और उसकी सहयोगी घिस्लेन मैक्सवेल के साथ अन्य तस्वीरें थीं। यह विवाद उस क़ानून के तहत सामने आया है जिसे नवंबर में पारित किया गया था — Epstein Files Transparency Act, जिसमें DOJ को एप्स्टीन से जुड़े जांच दस्तावेज़ जनता के सामने लाने का आदेश दिया गया था। हालांकि यह रिकार्ड जारी किए गए, लेकिन उनमें से कुछ गायब हो गए, और विभाग ने अभी तक गायब होने की कोई स्पष्ट वजह नहीं बताई है। DOJ से फाइलें गायब कैसे हुईं? वेबसाइट पर उपलब्ध दस्तावेज़ शुक्रवार को प्रकाशित किए गए थे, लेकिन कम से कम 16 फाइलें शनिवार तक उपलब्ध नहीं रहीं, जिसमें नग्न कलाकारों की पेंटिंग्स की तस्वीरें भी शामिल थीं। DOJ ने किसी भी तरह से सरकारी नोटिस या सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं दिया कि यह हटाना जानबूझकर किया गया या तकनीकी कारणों से हुआ। DOJ अधिकारियों ने कहा है कि कुछ फोटो और सामग्री की समीक्षा और शीघ्र लालकरन (redaction) की प्रक्रिया जारी है ताकि पीड़ितों की सुरक्षा और गोपनीयता बनी रहे। लेकिन गायब दस्तावेज़ों के पीछे की असली वजह स्पष्ट नहीं है। ये खबर भी पढ़े …62 की उम्र में ऑस्ट्रेलियाई पीएम ने रचाई शादी, जानें Jodie Haydon कौन हैं गायब फाइलों में था क्या कुछ फाइलों में शामिल थे: ट्रंप, एप्स्टीन और मैक्सवेल की फोटो — एक चित्र जिसमें ट्रंप, मेलानिया ट्रंप और एप्स्टीन जुड़े दिखते थे। नग्न महिलाओं की पेंटिंग की तस्वीरें। क्रेडेंज़ा ड्रेसर में रखी सामना फ़ोटो का समूह — जहाँ ट्रंप की तस्वीर भी थी। कुछ फाइलों के निर्दिष्ट विवरण अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या विभाग ने संवेदनशील जानकारी हटाई है या कुछ जानकारी छुपाई जा रही है। ये खबर भी पढ़े …ऑक्सफोर्ड डिबेट विवाद: पाकिस्तान झूठ बोला, भारत ने पोल खोली ट्रंप के साथ जुड़े चित्रों का महत्व और विवाद जिस फ़ाइल को लेकर सबसे अधिक विवाद उत्पन्न हुआ वह फाइल नंबर 468 थी, जिसमें कथित तौर पर ट्रंप, एप्स्टीन और मैक्सवेल के साथ एक तस्वीर थी। डेमोक्रेटिक सांसदों ने कहा है कि इस तरह की तस्वीर का अचानक गायब हो जाना पारदर्शिता के सिद्धांत के खिलाफ है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि ट्रंप किसी भी आपराधिक आरोप का सामना नहीं कर रहे हैं इस मामले में, और तस्वीर का होना या गायब होना उन पर आरोप का सबूत नहीं है। डॉक्यूमेंट्स में दिखायी गई तस्वीरें केवल पुराने सामाजिक संपर्कों को दर्शाती हैं, और कोई सबूत नहीं मिलता कि ट्रंप ने बच्चों के यौन शोषण में भाग लिया था। ये खबर भी पढ़े …इतिहास की किताबों में बदलाव: अकबर-टीपू के आगे ‘महान’ हटाया, RSS नेता का दावा पारदर्शिता कानून और DOJ की प्रतिक्रिया अमेरिकी कांग्रेस ने यह कानून पारित किया ताकि जनता को एप्स्टीन से जुड़े सभी रिकार्ड एक जगह पर उपलब्ध हो सकें। DOJ ने कहा कि कुछ सामग्री को पीड़ितों की सुरक्षा और गोपनीयता के कारण लालकृत और हटाया गया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन सी सामग्री अभी भी आने वाली है। डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों सांसदों ने DOJ की आलोचना की है कि यह कानून की भावना और उद्देश्य का पालन नहीं कर रहा है, और कुछ ने इसे सरकारी जवाबदेही के अभाव के रूप में देखा है। एप्स्टीन केस की संक्षिप्त पृष्ठभूमि जेफरी एप्स्टीन एक प्रभावशाली फाइनेंसर और नाबालिगों के यौन शोषण का आरोपी था, जिसे 2019 में फेडरल सेक्स ट्रैफिकिंग आरोपों के तहत गिरफ़्तार किया गया था। इसे आरोप था कि उसने कई नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण किया और उन्हें भुगतान भी किया था। कुछ पीड़ितों की उम्र केवल 14 वर्ष थी। जुलाई 2019 में एक अदालत ने उसे हिरासत में रखने का आदेश दिया और जमानत देने से इनकार कर दिया। कुछ समय बाद जेल में उसकी मृत्यु आत्महत्या के रूप में घोषित की गई, जिसने पूरे मामले को और भी विवादित बना दिया। FAQs Q1. DOJ से एप्स्टीन से जुड़ी फाइलें क्यों गायब हुईं?DOJ ने कहा है कि कुछ फोटोज़ और दस्तावेज़ों पर रीडैक्शन और समीक्षा जारी है ताकि पीड़ितों की पहचान सुरक्षित रहे। अभी तक सरकार ने कोई पूर्ण स्पष्टीकरण नहीं दिया है कि गायब होना जानबूझकर या तकनीकी गलती थी। Q2. क्या गायब हुई फाइलों में ट्रंप की फोटो थी?हाँ, रिपोर्टों के मुताबिक गायब फाइलों में एक तस्वीर थी जहां ट्रंप, मेलानिया ट्रंप और घिस्लेन मैक्सवेल के साथ एप्स्टीन दिख रहा था। इस फोटो का अचानक हट जाना जनमानस में ज्यादा विवाद का कारण बना। Q3. क्या इस घटना से एप्स्टीन के अपराध से जुड़े सबूत छिपाए जा रहे हैं?वर्तमान में कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है कि फाइलें छिपाई जा रही हैं। DOJ का कहना है कि रीडैक्शन पीड़ितों की सुरक्षा और गोपनीयता के लिए है। आलोचक कहते हैं कि पारदर्शिता का उल्लंघन हो रहा है, लेकिन कोई ठोस cover-up प्रमाण नहीं मिला है।

62 की उम्र में ऑस्ट्रेलियाई पीएम ने रचाई शादी, जानें Jodie Haydon कौन हैं

Shadi

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज (62) ने 29 नवंबर 2025 को अपनी लंबे समय से साथी रही जोडी हेडन (46) से शादी की वो पहले प्रधानमंत्री बने जिन्होंने कार्यकाल के दौरान शादी की; उनकी प्रेम-कहानी, निजी समारोह और शादी की ख़ास बातें अब सामने आई हैं। इन दोनों के उम्र में 16 साल का अतंर है। ◆ ऐतिहासिक शादी  क्यों खास है? ये खबर भी पढ़े…सीएम मोहन यादव के बेटे की शादी में सामाजिक एकता का संदेश ◆ समारोह और शादी की बातें ये खबर भी पढ़े…महिलाओं की गरिमा पर कोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब ◆ प्रेम कहानी: कैसे शुरू हुई थी? ये खबर भी पढ़े…Central Board of Secondary Education (CBSE) 10वीं दो-सेशन पर ◆ निजी जीवन और पहले परिवार की जानकारी  FAQs Q1: कौन हैं जोडी हेडन — प्रधानमंत्री की नई दुल्हन?उत्तर: जोडी हेडन एक अनुभवी वित्तीय / सुपरएनेशन (retirement savings/ fund) पेशेवर रही हैं। उनकी पर्सनल लाइफ आलोचना/सरकारी दबाव में नहीं रही, और उन्होंने निजी तौर पर 2020 में अल्बानीज से मुलाक़ात की थी। उन्होंने बाद में सोशल मीडिया के जरिये उनसे संपर्क किया। 2024 में दोनों की सगाई हुई, और 2025 में शादी हुई। Q2: शादी किस तरह हुई — क्या यह सार्वजनिक समारोह था या निजी?उत्तर: यह शादी एक बहुत निजी, गोपनीय समारोह थी — सिर्फ करीबी परिवार, दोस्त और कुछ मंत्री उपस्थित थे। समारोह स्थान था प्रधानमंत्री का सरकारी निवास The Lodge, लेकिन शादी-व्यवस्था और खर्च दोनों दम्पति ने निजी रूप से किए थे। मीडिया को तब तक जानकारी नहीं दी गई थी जब तक शादी पूरी न हो गई थी। Q3: क्या यह पहली बार है कि ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ऑफिस में रहते हुए शादी कर रहे हैं?उत्तर: हाँ। 29 नवंबर 2025 की यह शादी इतिहास रचने वाली रही: एंथनी अल्बानीज बने पहले ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जिन्होंने अपने पदकाल के दौरान विवाह किया।

ऑक्सफोर्ड डिबेट विवाद: पाकिस्तान झूठ बोला, भारत ने पोल खोली

Pakistan

भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव भले ही नया नहीं है, लेकिन ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनियन डिबेट में जो हुआ, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया। यह बहस भारत-पाक नीति पर होने वाली थी, जिसमें दोनों देशों के वक्ताओं को अपने पक्ष रखने थे। भारत से एडवोकेट जे साई दीपक, एक्टिविस्ट मनु खजूरिया और पंडित सतीश के शर्मा शामिल होने पहुंचे थे। लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से कुछ घंटे पहले ही जानकारी मिली कि पाकिस्तानी पक्ष बहस में आने से पीछे हट गया है। 🇮🇳 क्या हुआ — असली मामला एक बहुप्रतीक्षित डिबेट थी — ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन में, जिस विषय पर बहस होनी थी: “This House Believes India’s Policy Towards Pakistan Is a Populist Strategy Sold as Security Policy”पाकिस्तान की तरफ से वक्ता रहने वाले थे: पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर, पूर्व सेना जनरल ज़ुबैर महमूद हयात और ब्रिटेन में पाकिस्तान के राजदूत मोहम्मद फैसल — ये पहले ही लंदन पहुंचे हुए थे। भारत की ओर से मूल वक्ता थे: पूर्व सेना प्रमुख M.M. Naravane (सेवानिवृत्त), पूर्व कानून मंत्री व सांसद सुब्रमनियन स्वामी, और पूर्व राज्य मंत्री व नेता सचिन पायलट — लेकिन ये तीनों आखिरी समय पर उपलब्ध नहीं रहे। भारत-पक्ष की ओर से J Sai Deepak थे, जिनके अनुसार उन्होंने पहले से तैयारियों की पुष्टि कर रखी थी। बाद में, नियत वक्ताओं के न होने पर उन्होंने ब्रिटेन में रह रहे अन्य व्यक्तियों — Manu Khajuria व Satish K Sharma — को विकल्प के रूप में शामिल कराया। ये खबर भी पढ़े…UIDAI: 2 करोड़ से अधिक आधार नंबर बंद, पोर्टल पर दी गई यह सुविधा भी 🛑 विवाद कैसे शुरू हुआ डिबेट से ठीक कुछ घंटे पहले ही आयोजकों यानी Oxford Union के अध्यक्ष Moosa Harraj (जो पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री के बेटे बताए गए हैं) ने J Sai Deepak को कह दिया कि पाकिस्तान की टीम लंदन नहीं पहुंची है — इसलिए डिबेट रद्द करनी पड़ी। लेकिन इसके ठीक बाद यह जानकारी मिली कि पाकिस्तान की टीम असल में लंदन में थी और होटल में रुकी थी — यानी उनकी अनुपस्थिति के दावे में गड़बड़ी थी। भारत की ओर से यह वादा था कि अगर समय रहते स्पीकर उपलब्ध न हो सके, तो दूसरा पैनल भेजा जाएगा — लेकिन आयोजकों ने वो प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। इस वजह से British-based भारतीय नागरिक (Manu Khajuria, Satish K Sharma) की अनुमति देने में भी आनाकानी हुई ये खबर भी पढ़े…IFFI Award: जापानी ‘ए पेल व्यू ऑफ हिल्स’, इफ्फी प्रेमियों ने लिया आनंद 🇵🇰 पाकिस्तान का दावा और भारत की प्रतिक्रिया पाकिस्तान हायर कमीशन लंदन ने सार्वजनिक रूप से कहा कि “भारतीय वक्ताओं ने आखिरी समय पर बहस से पीछे हटने का फैसला किया”। इस दावे ने पाकिस्तान को वॉकओवर जीत का हवाला दिया। इसके जवाब में J Sai Deepak ने कहा कि भारत की टीम तैयार थी, और बहस रद्द होना असल में पाकिस्तान की टीम की अनुपस्थिति व आयोजन प्रबंधन की असफलता का परिणाम था। उन्होंने ईमेल और कॉल-लॉग्स सार्वजनिक कर दिए। Deepak ने कहा: “अगर पाकिस्तान वालों में हिम्मत है, तो अब वे सीधे भाजपा, मीडिया या सोशल-मीडिया के मंच की बजाय वही मंच चुनें जहाँ मुद्दे पर खुलकर बहस हो सके।” कुछ दक्षिण एशियाई और ब्रिटिश मीडिया तथा आकलनकर्ता भी इस पूरे नाटक को “स्टंट” या “ड्रामा” कह रहे हैं — उनका कहना है कि शुरुआत से ही यह बहस एक असली बहस नहीं थी, बल्कि एक प्रचार-प्रयोग था। ये खबर भी पढ़े…Assam Anti Polygamy Bill 2025: बहुविवाह पर सख़्त रोक: असम में बिल को मंजूरी 🎯 इस घटना का मतलब क्या है यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, जहाँ अकादमिक मंचों और डिबेट सोसायटीज़ की प्रतिष्ठा होती है, वे भी राजनीतिक एजेंडा, दावे और प्रचार के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच अब सिर्फ बॉर्डर या नीति का विवाद नहीं है; बहस की तक़ाज़ा, सार्वजनिक बाहस और छवि-प्रबंधन की जंग भी अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँच गई है। जो देश या पक्ष खुलकर बहस से भागता दिखे — उसकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आती है। इस मामले में, पाकिस्तान की ओर से पहले दावे, फिर उनके असत्य साबित होने से, बहस के महत्व और तर्क-वाद की जगह प्रचार की प्राथमिकता उजागर हुई। FAQs Q1: यह डिबेट आखिर किन राज्यों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के बीच तय थी?इस डिबेट में पाकिस्तान की ओर थे पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर, पूर्व जनरल जुबैर महमूद हयात और यूके में पाकिस्तानी राजदूत मोहम्मद फैसल। वहीं भारत की ओर मूल वक्ता थे पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे, पूर्व मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी और सचिन पायलट। बाद में जब ये तीनों उपलब्ध नहीं हुए, तो भारत-पक्ष ने अन्य वक्ताओं (Manu Khajuria, Satish K Sharma) को प्रस्तावित किया। Q2: डिबेट रद्द क्यों हुई — पाकिस्तान के न पहुँचने की वजह से या भारत के हटने की वजह से?भारत-पक्ष का कहना है कि डिबेट रद्द इसलिए हुई क्योंकि पाकिस्तान की टीम आखिरी समय में उपस्थित नहीं हुई; आयोजक द्वारा सूचना दी गई थी कि पाकिस्तानी वक्ता लंदन में नहीं पहुँचे। वहीं पाकिस्तान हाई कमीशन का दावा था कि भारत के वक्ता पीछे हट गए। लेकिन J Sai Deepak ने दोनों दावों को असत्य साबित किया — उन्होंने कॉल-लॉग्स व ईमेल सबूत दिखाए। Q3: क्या इस घटना का मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अब विश्वसनीय बहस नहीं होती?हां — यह घटना एक उदाहरण है कि कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल सच्ची बहस की बजाय पब्लिक ट्रंपेटिंग व प्रचार के लिए किया जाता है। जहाँ पर तैयारी, भरोसा, और तर्क-वाद की बजाय, आखिरी समय की रणनीतियाँ, बदलाव और कथित ‘वॉकओवर’ की चाल होती है। इस तरह के मामलों में विश्वसनीयता और निष्पक्षता हमेशा नहीं रहती।

इतिहास की किताबों में बदलाव: अकबर-टीपू के आगे ‘महान’ हटाया, RSS नेता का दावा

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महाराष्ट्र के नागपुर शहर में आयोजित ऑरेंज सिटी लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने इतिहास की किताबों में किए गए महत्वपूर्ण बदलावों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि NCERT ने इतिहास को अधिक संतुलित और तथ्याधारित स्वरूप देने की दिशा में एक सकारात्मक कदम उठाया है। उनके अनुसार, अब नई इतिहास पुस्तकों में अकबर और टीपू सुल्तान के आगे ‘महान’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, क्योंकि इतिहास का मूल्यांकन अब घटनाओं और प्रमाणों के आधार पर किया जा रहा है। NCERT ने किए 11वीं तक के सिलेबस में चेंज अपने संबोधन में आंबेकर ने बताया कि NCERT ने कुल 15 किताबों में से 11 कक्षाओं की किताबों में इम्पोर्टेन्ट अमेंडमेंटस कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि कक्षा 9, 10 और 12 की किताबों में भी बदलाव अगले साल लागू किए जाएंगे। उन्होंने साफ कहा कि किताबों से किसी का नाम हटाया नहीं गया है। “हमारे इतिहास के कठोर सच भी बच्चों को जानने चाहिए” उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों को यह समझना जरूरी है कि इतिहास में कौन-सी घटनाएं लोगों के लिए पीड़ा का कारण बनीं, और किन कारणों से समाज को संघर्ष करना पड़ा। इसलिए किसी चरित्र को हटाने के बजाय उनके कार्यों का तथ्यात्मक विश्लेषण जरूरी है। ये खबर भी पढ़े…भारत के ‘आधार’ की तर्ज पर ब्रिटेन लाएगा नया ID कार्ड सिस्टम, क्या है पीएम स्टारमर का प्लान? क्यों हटाया गया ‘महान’ शब्द? आंबेकर का कहना था कि ‘महान’ शब्द किसी ऐतिहासिक चरित्र को एकतरफा रूप से महिमामंडित कर देता है, जबकि इतिहास का उद्देश्य संतुलित दृष्टिकोण देना है। उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास बहुत बड़ा है और इसे दुनिया को देने से पहले हमें स्वयं उस ज्ञान को समझने की आवश्यकता है।पुरानी किताबों की भाषा पर उठे थे सवाल कई इतिहासकार और शिक्षाविद लंबे समय से यह मांग कर रहे थे कि इतिहास पुस्तकों में इस्तेमाल शब्दों को तटस्थ बनाया जाए। इसी कारण NCERT ने अध्यायों की भाषा को सरल और तथ्यपरक बनाने पर काम किया। ये खबर भी पढ़े…हिंद-प्रशांत में नहीं चलेगी चीन की चालबाज़ी, भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच 3 बड़ी रक्षा संधियाँ नालंदा यूनिवर्सिटी पर भी बोले RSS नेता अपने भाषण में उन्होंने नालंदा यूनिवर्सिटी का उदाहरण देते हुए बताया कि यह केवल धार्मिक शिक्षा का केंद्र नहीं थी। नालंदा में 76 स्किल-बेस्ड कोर्स पढ़ाए जाते थे। उनके अनुसार, नालंदा में 76 प्रकार के कौशल कोर्स पढ़ाए जाते थे, जिनमें— अर्बन प्लानिंग खेती की तकनीक शासन व्यवस्था मेकअप और आर्ट सीक्रेट एजेंट ट्रेनिंग मैकेनाइजेशन जैसे विषय शामिल थे।उन्होंने कहा कि भारत का यह प्राचीन ज्ञान आज भी आधुनिक समाज के लिए उदाहरण बन सकता है। ये खबर भी पढ़े…हंगरी के लास्जलो क्रास्जनाहोरकाई को मिला ये सम्मान, नोबेल पुरस्कार 2025 का हुआ ऐलान भारत विकास की राह पर, लेकिन संतुलन जरूरी अंत में आंबेकर ने कहा कि भारत तेजी से विकसित हो रहा है, लेकिन दुनिया के कई देशों ने विकास के दौरान अपनी संस्कृति व पारिवारिक मूल्यों के साथ समझौता कर दिया था। उन्होंने सलाह दी कि भारत को इस दिशा में सावधान रहना होगा और विकास के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी सुरक्षित रखना होगा। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को इतिहास और ज्ञान पर आधारित शिक्षा मिलनी चाहिए, जिससे वह समझ सके कि भारत कहाँ से गुजरा है और भविष्य में उसे किस दिशा में आगे बढ़ना है। FAQs Q1. क्या NCERT ने अकबर और टीपू सुल्तान को इतिहास की किताबों से हटा दिया है। नहीं, NCERT ने उन्हें किताबों से नहीं हटाया है। केवल उनके नाम के आगे लगे ‘महान’ शब्द को हटाने का निर्णय लिया गया है ताकि इतिहास को अधिक तटस्थ और तथ्याधारित ढंग से प्रस्तुत किया जा सके। Q2. इतिहास की किताबों में यह बदलाव कब से लागू होंगे? Q3. अब तक कक्षा 1 से 11 तक की अधिकांश किताबों में बदलाव किए जा चुके हैं। कक्षा 9, 10 और 12 की किताबों में संशोधन अगले सत्र से लागू होंगे। Q4. RSS नेता सुनील आंबेकर ने इस बदलाव को क्यों सकारात्मक बताया? उन्होंने कहा कि पुरानी किताबों में पक्षपातपूर्ण भाषा थी, जबकि नई किताबें तटस्थ दृष्टिकोण देती हैं। इस बदलाव के जरिए बच्चों को अकबर और टीपू सुल्तान जैसे ऐतिहासिक पात्रों के कार्यों का तथ्यात्मक विश्लेषण मिलेगा।

Japan-IMF: एशिया के छात्रों को मिलेगी पीएचडी में छात्रवृत्ति, 2025 में सुनहरा मौका

Japan-IMF

Japan-IMF PhD Scholarship 2025 जापान-आईएमएफ (Japan-IMF) छात्रवृत्ति कार्यक्रम 2025 का ऐलान हो गया है। यह कार्यक्रम जापान सरकार और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) द्वारा संचालित है। इसका उद्देश्य एशिया और प्रशांत क्षेत्र में उच्च योग्य अर्थशास्त्रियों को तैयार करना है। यह छात्रवृत्ति डॉक्टरेट स्तर की पढ़ाई (Ph.D. in Economics) के लिए दी जाती है। चयनित उम्मीदवारों को पूर्ण ट्यूशन शुल्क और अन्य वित्तीय सहायता दी जाएगी। कार्यक्रम का लक्ष्य नीति निर्माण में सक्षम विशेषज्ञ तैयार करना है। योग्यता आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को कुछ योग्यताएं पूरी करनी होंगी। पहली शर्त है कि उम्मीदवार किसी एशियाई या प्रशांत देश का नागरिक हो। दूसरी, उम्मीदवार के पास अर्थशास्त्र या संबंधित विषय में मास्टर डिग्री (Master’s Degree) हो। तीसरी, उम्मीदवार ने अपने देश से बाहर मास्टर डिग्री प्राप्त न की हो। चौथी, उसे किसी शीर्ष विजापान-आईएमएफ (Japan-IMF) छात्रवृत्ति कार्यक्रम 2025 का ऐलान हो गया है। यह कार्यक्रम जापान सरकार और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) द्वारा संचालित है। इसका उद्देश्य एशिया और प्रशांत क्षेत्र में उच्च योग्य अर्थशास्त्रियों को तैयार करना है। बेनेफिट्स यह छात्रवृत्ति डॉक्टरेट स्तर की पढ़ाई (Ph.D. in Economics) के लिए दी जाती है। चयनित उम्मीदवारों को पूर्ण ट्यूशन शुल्क और अन्य वित्तीय सहायता दी जाएगी। कार्यक्रम का लक्ष्य नीति निर्माण में सक्षम विशेषज्ञ तैयार करना है अप्लाई डेट्स इसका आवेदन 20 सितंबर 2025 से शुरू होगा। अंतिम तिथि 20 अक्टूबर 2025 रात 11:59 (JST) तय की गई है। योग्य उम्मीदवारों को समय पर आवेदन करने की सलाह दी गई है। यह अवसर एशियाई युवाओं के लिए करियर बदलने वाला साबित हो सकता है। अर्थशास्त्र में अनुसंधान और नीति अध्ययन में रुचि रखने वालों के लिए यह आदर्श मौका है।

नोबेल शांति पुरस्कार मचादो ले गई, डोनाल्ड ट्रंप हाथ मलते रह गए

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ओस्लो दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित और चर्चित नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान शुक्रवार को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में होते ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सपना चकनाचूर हो गया। इस बार का ‘नोबेल पीस प्राइज’ वेनेजुएला की प्रमुख विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचादो को मिला है। बता दें कि नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी हर साल इस पुरस्कार के लिए ऐसे लोगों या संस्थाओं को चुनती है, जो शांति को बढ़ावा देने, देशों के बीच भाईचारे को मजबूत करने और समाज के लिए काम करने में योगदान देते हैं। बता दें कि यह पुरस्कार हमेशा चौंकाने वाला होता है। नोबेल प्राइज के लिए काफी बेचैन थे ट्रंप? नोबेल पीस प्राइज के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले कई दिनों से काफी बेचैन नजर आ रहे थे। ट्रंप ने अपनी विदेश नीति की कुछ उपलब्धियों, जैसे शांति समझौतों को लेकर खुद की तारीफ की थी। लेकिन नोबेल विशेषज्ञों का पहले ही कहना था कि उनके जीतने की संभावना बहुत कम है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि कमेटी आमतौर पर उन लोगों या संगठनों को पुरस्कार देती है, जो लंबे समय से शांति के लिए काम कर रहे हों। कौन हैं मारिया कोरिना मचाडो? मारिया कोरिना मचाडो का जन्म 7 अक्टूबर 1967 को हुआ था। वह वेनेजुएला की प्रमुख विपक्षी नेता और औद्योगिक इंजीनियर हैं। 2002 में उन्होंने वोट निगरानी समूह सूमाते की स्थापना की और वेंटे वेनेजुएला पार्टी की राष्ट्रीय समन्वयक हैं। 2011-2014 तक वे वेनेजुएला की नेशनल असेंबली की सदस्य रहीं। वह 2018 में बीबीसी की 100 प्रभावशाली महिलाओं और 2025 में टाइम पत्रिका की 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल हुईं। निकोलस मादुरो सरकार ने उनके देश छोड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था। 2023 में अयोग्यता के बावजूद, उन्होंने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्षी प्राथमिक चुनाव जीता, लेकिन बाद में उनकी जगह कोरिना योरिस को उम्मीदवार बना दिया गया। इन नामों की हो रही थी चर्चा नोबेल शांति पुरस्कार के लिए इस बार कई नाम सामने आए थे। पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ओस्लो ने कुछ संभावित विजेताओं का जिक्र किया था, जिनमें शामिल थे: सूडान की इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स: यह एक समुदाय आधारित नेटवर्क है, जो सूडान के गृहयुद्ध के दौरान मानवीय सहायता का मजबूत आधार बना हुआ है। इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट: ये दोनों संस्थाएं वैश्विक न्याय और शांति के लिए काम करती हैं। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स: यह अमेरिका आधारित संगठन प्रेस की आजादी को बढ़ावा देता है और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए काम करता है। यह संगठन उन पत्रकारों की सूची भी तैयार करता है, जो अपने काम के दौरान मारे गए। पिछले साल किसने जीता था नोबेल शांति पुरस्कार? पिछले साल 2024 में नोबेल शांति पुरस्कार जापान की संस्था निहोन हिदानक्यो को दिया गया था। यह संगठन परमाणु हथियारों के खिलाफ दशकों से काम कर रहा है और हिरोशिमा-नागासाकी बम धमाकों के पीड़ितों की आवाज को दुनिया तक पहुंचाता है। क्यों खास है नोबेल शांति पुरस्कार? नोबेल शांति पुरस्कार दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कारों में से एक है। बाकी नोबेल पुरस्कार (जैसे चिकित्सा, भौतिकी, रसायन और साहित्य) स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में दिए जाते हैं, लेकिन शांति पुरस्कार का ऐलान और समारोह ओस्लो में होता है। इस हफ्ते स्टॉकहोम में चिकित्सा, भौतिकी, रसायन और साहित्य के पुरस्कारों का ऐलान हो चुका था जिसके बाद सबकी नजर शुक्रवार के ऐलान पर टिकी थीं। इसके अलावा, अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार सोमवार को घोषित किया जाएगा।

मुत्ताकी की भारत यात्रा से बिफरा पाकिस्तान, अफगानिस्तान में की एयरस्ट्राइक – क्या है इरादा?

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काबुल अफगानिस्तान की राजधानी काबुल शुक्रवार सुबह तेज धमाकों से दहल उठी. स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह विस्फोट पाकिस्तान एयर फोर्स (PAF) की कथित एयरस्ट्राइक के कारण हुए हैं. पाकिस्तानी चैनलों ने दावा किया कि इन हमलों का निशाना तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के ठिकाने थे. यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है जब तालिबान के विदेश मंत्री मौलवी आमिर खान मुत्तकी भारत दौरे पर हैं. मुत्तकी का यह दौरा अफगानिस्तान की नई सरकार और भारत के बीच संवाद की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि अफगानिस्तान की ज़मीन अगर पाकिस्तान विरोधी आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होती है, तो ‘कड़ी कार्रवाई’ की जाएगी. उसी के कुछ दिन बाद यह कथित एयरस्ट्राइक सामने आई है. कतर में तालिबान के राजदूत मुहम्मद सुहैल शाहीन ने बयान जारी कर कहा, ‘काबुल में दो धमाकों की आवाज सुनी गई, लेकिन अभी तक किसी के हताहत होने की खबर नहीं है.’ पाकिस्तानी मीडिया ने दावा किया कि हमले में TTP प्रमुख नूर वली महमूद मारा गया. अफगान मीडिया के मुताबिक, अटैक के बाद TTP के प्रमुख नूर वली महसूद का एक ऑडियो सामने आया जिसमें उसने खुद के जिंदा होने की बात कही और पाकिस्तान पर ‘फर्जी प्रचार’ करने का आरोप लगाया. ख्वाजा आसिफ ने दी थी धमकी इससे पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने गुरुवार को धमकी भरे लहजे में अफगानिस्तान के अंतरिम प्रशासन को चेतावनी दी थी. उन्होंने कहा था कि अफगानिस्तान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को अपने देश के अंदर सुरक्षित पनाहगाह दे रहा है. उन्होंने कहा था कि ‘इनफ इज इनफ’ यानी अब बहुत हो गया. पाकिस्तानी सेना लगातार TTP के खिलाफ ऑपरेशन चला रही है. गुरुवार को कम से कम सात टीटीपी आतंकी मारे गए. मुत्ताकी की भारत यात्रा के बीच हमला एक कहावत है घर वाला घर नहीं हमें किसी का डर नहीं. यह धमाका ऐसे समय में हुआ है जब भारत और अफगानिस्तान के संबंध बेहतर हो रहे हैं और अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी अमीर खान मुत्तकी गुरुवार को नई दिल्ली पहुंचे. अगस्त 2021 में तालिबान के अफगानिस्तान में सत्ता में आने के बाद यह पहली बार है, जब काबुल से कोई मंत्री-स्तरीय प्रतिनिधि नई दिल्ली का दौरा कर रहा है. मुत्तकी की यह यात्रा लगभग एक सप्ताह की है. इसे दोनों देशों के बीच संवाद की नई पहल के रूप में देखा जा रहा है.  

भारतीय प्रोफेशनल्स पर दोहरा संकट? H-1B वीजा में और कड़े नियम ला सकते हैं ट्रंप

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नई दिल्ली अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन फिर से H-1B वीजा के नियमों में बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है. ये वीजा खासतौर पर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और विद्यार्थियों के लिए बेहद अहम होते हैं, क्योंकि इसी से अमेरिका में काम करने और आगे चलकर ग्रीन कार्ड पाने का रास्ता बनता है. लेकिन अब अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने ‘रिफॉर्मिंग द H-1B वीजा नॉन इमिग्रेंट वीजा प्रोग्राम’ नाम से एक नया प्रस्ताव जारी किया है. इसमें सिर्फ 1 लाख डॉलर की नई फीस ही नहीं, बल्कि कई सख्त बदलाव भी शामिल हैं- जैसे कौन सी कंपनी यह वीजा इस्तेमाल कर सकती है, कौन से पदों के लिए आवेदन मान्य होंगे और थर्ड पार्टी कंपनियों की निगरानी बढ़ाई जाएगी. क्या है नया प्रस्ताव? नए नियमों के तहत H-1B वीजा के चयन में अब ‘वेतन आधारित प्रणाली’ (Wage-Based Selection) लागू करने की योजना है. यानी जिन लोगों को ज्यादा वेतन मिलेगा, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी. अब तक यह चयन पूरी तरह लॉटरी सिस्टम पर आधारित था. DHS का कहना है कि इन बदलावों का मकसद है ‘अमेरिकी मजदूरों के हितों की रक्षा करना और वीजा प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ाना.’ अगर यह नियम लागू हुआ तो अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले छात्रों और कम एक्सपीरियंस वाले वर्किंग प्रोफेशनल्स को एंट्री मुश्किल हो जाएगी. साथ ही, सरकार उन कंपनियों पर कड़ी नजर रखेगी जिन्होंने पहले वीजा नियमों का उल्लंघन किया है. च-1बी वीजा कैटिगरी की शुरुआत 1990 के इमिग्रेशन ऐक्ट के तहत की गई थी। इसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि अमेरिकी कंपनियां बाहर के लोगों को ला सकें, जिनके पास जरूरी तकनीकी स्किल हो। इसी नियम के चलते बड़े पैमाने पर भारतीयों को अमेरिका में जाने का मौका मिला। खासतौर पर अमेरिकी टेक कंपनियों में भारतीय की बड़ी संख्या है। अब तक नियम था कि 65 हजार एच-1बी वीजा ही साल में जारी किए जा सकते थे। इसके अलावा 20 हजार ऐसे लोगों को भी छूट थी, जिन्होंने अमेरिका की किसी यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री ली हो। इसके अलावा कई यूनिवर्सिटी और गैर-लाभकारी संस्थानों को इससे छूट रही हो। प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट के अनुसार 2023 में एच-1 बी वीजा के तहत अमेरिका जाने वाले लोगों में तीन चौथाई भारतीय ही थे। 2012 से अब तक एच-1 बी वीजा हासिल करने वाले 60 फीसदी लोग कंप्यूटर से संबंधित नौकरियों में गए। इसके अलावा हेल्थ सेक्टर, बैंक, यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थानों के लिए भी एच-1 बी वीजा जारी किए गए। कब लागू होंगे नियम? अभी यह प्रस्ताव फेडरल रजिस्टर में सार्वजनिक सुझावों के लिए रखा गया है. अगर सब कुछ तय समय पर हुआ तो दिसंबर 2025 तक यह नया नियम लागू हो सकता है. H-1B वीजा 1990 के इमीग्रेशन Act के तहत शुरू हुआ था ताकि अमेरिकी कंपनियां ऐसे कुशल लोगों को ला सकें जिनकी विशेषज्ञता अमेरिका में आसानी से नहीं मिलती. यही वजह है कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न जैसी कंपनियों में हजारों भारतीय इसी वीजा पर काम कर रहे हैं. अभी हर साल अमेरिका 65,000 H-1B वीजा जारी करता है, और 20,000 अतिरिक्त वीजा अमेरिकी यूनिवर्सिटी से मास्टर्स या उससे ऊपर की डिग्री धारकों को मिलते हैं. 2023 में मिले सभी H-1B वीजा में से करीब 75% भारतीय नागरिकों को मिले थे. ऐसे में यह कदम भारत के लिए भी बड़ी खबर है.

इजरायली कैबिनेट मीटिंग बीच में रोक PM मोदी से बात की नेतन्याहू ने – क्या था इतना जरूरी?

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नई दिल्ली यरूशलम में गुरुवार रात एक दिलचस्प नजारा देखने को मिला. इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्‍याहू सुरक्षा कैबिनेट की अहम बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे. एजेंडा बेहद गंभीर था. गाजा में सीजफायर और बंधकों की रिहाई पर बड़ा फैसला होना था. लेकिन अचानक नेतन्‍याहू ने बैठक रोक दी. वजह? भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोन आ गया था. जी हां, नेतन्‍याहू ने अपने सारे मंत्री और अफसर कुछ मिनटों के लिए इंतजार में छोड़ दिए, ताकि वो सीधे पीएम मोदी से बात कर सकें. दोनों नेताओं के बीच यह बातचीत लगभग दस मिनट चली, लेकिन उसका असर अब दोनों देशों के रिश्तों पर साफ दिख रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, प्रधानमंत्री नेतन्‍याहू ने गाजा में युद्धविराम और बंधकों की रिहाई पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का फोन रिसीव किया. मोदी ने उन्हें इस समझौते पर बधाई दी और कहा कि भारत इस मानवीय प्रयास का समर्थन करता है. बयान में आगे लिखा है कि मोदी ने नेतन्‍याहू को करीबी दोस्त बताया और कहा कि भारत-इजरायल की दोस्ती हर परिस्थिति में मजबूत रहेगी. नेतन्‍याहू ने भी पीएम मोदी का आभार जताते हुए कहा कि वो भारत के साथ मिलकर काम जारी रखना चाहते हैं. नेतन्याहू को दी बधाई, गाज़ा समझौते का किया स्वागत पीएम मोदी ने नेतन्याहू को फोन लगाकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के गाज़ा में शांति प्लान के तहत हुई प्रगति पर इज़रायली पीएम को बधाई दी। इसके साथ ही पीएम मोदी ने बंधकों की रिहाई और गाज़ा के लोगों को मानवीय सहायता बढ़ाने पर हुए समझौते का स्वागत भी किया। पीएम मोदी ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि दुनिया में कहीं भी किसी भी रूप या स्वरूप में आतंकवाद अस्वीकार्य है। मोदी बोले-आतंकवाद कहीं भी बर्दाश्त नहीं इस बातचीत के तुरंत बाद पीएम मोदी ने एक्स (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया. उन्होंने लिखा, मैंने अपने मित्र प्रधानमंत्री नेतन्‍याहू को फोन करके गाजा शांति योजना में हुई प्रगति पर बधाई दी. हमने बंधकों की रिहाई और गाज़ा के लोगों के लिए बढ़ाई जा रही मानवीय मदद का स्वागत किया. मैंने दोहराया कि आतंकवाद किसी भी रूप में और कहीं भी स्वीकार्य नहीं है. मोदी के इस ट्वीट को कुछ ही मिनटों में लाखों व्यूज़ मिले और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे हाथों-हाथ लिया. कई विश्लेषकों ने कहा कि यह बातचीत इस बात का संकेत है कि भारत अब पश्चिम एशिया की राजनीति में एक संतुलित लेकिन प्रभावी भूमिका निभा रहा है. सोमवार तक रिहा होंगे सभी बंधक इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को कहा कि गाज़ा में हामास के कब्जे में मौजूद बंधकों को सोमवार या मंगलवार को रिहा कर दिया जाएगा. उन्होंने उम्मीद जताई कि वे मिस्र में आयोजित होने वाली समझौते की हस्ताक्षर समारोह में शामिल होंगे. ट्रंप ने व्हाइट हाउस कैबिनेट बैठक में बताया कि बुधवार को बंधकों की रिहाई और गाज़ा के पुनर्निर्माण के पहले चरण पर समझौता हुआ. हामास 72 घंटे के संघर्षविराम के बाद 20 बचे बंधकों को एक साथ रिहा करेगा. ट्रंप ने इसे खुशी का दिन बताया और कहा कि इससे क्षेत्र में “स्थायी शांति” की उम्मीद है. गाजा डील और नेतन्‍याहू की मुश्किलें इजरायल और हमास के बीच महीनों से चल रहे संघर्ष में यह सीजफायर डील बेहद अहम मानी जा रही है. इसमें सभी बंधकों की रिहाई और गाजा में मानवीय सहायता बढ़ाने की बात कही गई है. इजरायल के भीतर इस समझौते को लेकर मतभेद हैं. कुछ नेता मानते हैं कि यह आतंक के आगे झुकना है, तो कुछ इसे जरूरी राहत बता रहे हैं. ऐसे वक्त में नेतन्‍याहू का मोदी से बात करना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि कूटनीतिक संदेश है कि भारत न सिर्फ गाजा संकट पर नज़र रखे हुए है, बल्कि शांति के हर प्रयास का समर्थन कर रहा है. पीएम मोदी ने इजरायल को बताया भारत का मित्र प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू हमेशा से भारत के घनिष्ठ मित्र रहे हैं और दोनों देशों के बीच यह मित्रता आने वाले समय में भी और मजबूत रहेगी. मोदी ने कहा कि भारत और इजरायल के रिश्ते आपसी विश्वास, सहयोग और समान मूल्यों पर आधारित हैं और यह संबंध समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं. वहीं, प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने मोदी का इजरायल के प्रति समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया. दोनों नेताओं ने सहमति जताई कि भारत और इजरायल आगे भी करीबी साझेदारी और समन्वय के साथ विभिन्न मुद्दों पर साथ काम करते रहेंगे. पीएम ने की ट्रंप से बात गुरुवार को इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी बात की और उन्हें अमेरिका की ओर से कराए गए गाजा शांति समझौते के पहले चरण की सफलता पर बधाई दी. यह तीन हफ्तों में पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच दूसरी फोन कॉल थी. प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति की इस ऐतिहासिक शांति योजना को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका की सराहना की. पीएम मोदी ने एक्स पर लिखा, मैंने मेरे दोस्त राष्ट्रपति ट्रंप से बात की और ऐतिहासिक गाजा शांति योजना की सफलता पर उन्हें बधाई दी. व्यापारिक वार्ताओं में हुई अच्छी प्रगति की भी समीक्षा की. गाजा में हुआ युद्धविराम अमेरिका ने घोषणा की कि इजराइल और हमास — जो पिछले दो साल से एक-दूसरे से लड़ रहे हैं — उन्होंने गाजा शांति योजना के पहले चरण पर सहमति बना ली है. इस पहले चरण में गाजा पट्टी में युद्धविराम (सीजफायर) लागू किया जाएगा और इजराइली बंधकों और फिलिस्तीनी कैदियों की रिहाई की जाएगी. यह युद्ध उस समय शुरू हुआ जब 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजराइली पर हमला किया था. इस हमले में लगभग 1,200 लोगों की मौत हो गई थी और हमास ने 251 लोगों को बंधक बना लिया था, जिनमें से अब भी 50 से अधिक लोग उसकी कैद में हैं. इजराइल ने इस हमले के बाद गाजा में सैन्य अभियान शुरू किया. फिलिस्तीन के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस युद्ध में अब तक 66,000 से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं. यह शांति समझौता उस लंबे संघर्ष में एक अहम मोड़ माना जा रहा है, जिसने गाजा … Read more

शहबाज और मुनीर की अमेरिकी दौड़ धरी रह गई, ट्रंप ने पाकिस्तान को फिर किया निराश

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वाशिंगटन पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चापलूसी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. शहबाज और मुनीर अमेरिका तक गए और उन्होंने रेयर अर्थ मिनरल का खजाना भी सौंप दिया. लेकिन इसके बावजूद अब अमेरिका ने भारत को झटका दिया है. भारत में अमेरिकी दूतावास ने शुक्रवार को एक बयान जारी किया. अमेरिकी दूतावास ने उन मीडिया रिपोर्टों पर स्पष्टीकरण जारी किया है, जिनमें दावा किया गया था कि अमेरिका पाकिस्तान को एडवांस एयर-टू-एयर मिसाइल्स (AMRAAM) बेचने जा रहा है. दूतावास ने स्पष्ट कहा है कि यह जानकारी गलत व्याख्या पर आधारित है और पाकिस्तान को किसी प्रकार की नई या उन्नत मिसाइल प्रणाली नहीं दी जा रही है. अमेरिकी दूतावास की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, 30 सितंबर 2025 को अमेरिकी ‘डिपार्टमेंट ऑफ वार’ (जो मिलिट्री कॉन्ट्रैक्ट की सार्वजनिक सूची जारी करता है) ने कई कॉन्ट्रैक्ट्स की जानकारी साझा की थी. उसी सूची में पाकिस्तान से जुड़ा एक विदेशी मिलिट्री बिक्री कॉन्ट्रैक्ट संशोधन भी शामिल था, लेकिन उसका उद्देश्य केवल रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति था. दूतावास ने स्पष्ट शब्दों में कहा है- ‘यह कॉन्ट्रैक्ट किसी नई मिसाइल डिलीवरी या पाकिस्तान की मौजूदा हवाई युद्ध क्षमता को अपग्रेड करने से जुड़ा नहीं है. सस्टेनमेंट का मतलब केवल मौजूदा सिस्टम के सपोर्ट से है, अपग्रेड से नहीं.’ नहीं मिलेंगी नई मिसाइलें बीते कुछ दिनों से कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि अमेरिका पाकिस्तान को AIM-120 AMRAAM मिसाइलें उपलब्ध करा रहा है. रिपोर्ट्स में बताया जा रहा था कि इससे पाकिस्तान के F-16 फाइटर जेट की क्षमता बढ़ेगी और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव आएगा. नई मिसाइल सेल की खबरों ने इस धारणा को हवा दी थी कि अमेरिका और पाकिस्तान के बीच रिश्ते फिर से गर्म हो रहे हैं. हालांकि, अमेरिकी दूतावास के बयान ने इन तमाम अटकलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कॉन्ट्रैक्ट का उद्देश्य केवल सिस्टम का रखरखाव, उपकरण अपडेट और स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति है. इसे किसी भी रूप में पाकिस्तान की हवाई शक्ति बढ़ाने के कदम के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी बताया कि इस तरह के कॉन्ट्रैक्ट सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, जो कई देशों के साथ चलते रहते हैं. इसमें हथियार प्रणाली के रखरखाव, परीक्षण, और सप्लाई चेन के सुचारु संचालन से जुड़े तकनीकी अपडेट शामिल होते हैं. बयान में यह भी जोड़ा गया कि कुछ मीडिया संस्थानों ने ‘कॉन्ट्रैक्ट मॉडिफिकेशन’ शब्द का गलत अर्थ निकालते हुए इसे नए हथियारों की सप्लाई समझ लिया.