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Bhopal News: ‘रूपाभ’ समूह चित्र प्रदर्शनी में दिखा रंगों का संवाद, भारत भवन में सामूहिक चित्र प्रदर्शनी

Bharat Bhavan

Colors shown in Rupabh group photo exhibition in Bharat Bhavan भोपाल। बहुकला केंद्र भारत भवन की रंगदर्शनी दीर्घा मंगलवार को रंग, रेखा और कल्पना के विलक्षण सामंजस्य से सजी हुई दिखाई दी। मौका था साप्ताहिक चित्र प्रदर्शनी श्रृंखला ‘रूपाभ’ के अंतर्गत आयोजित सामूहिक चित्र प्रदर्शनी के शुभारंभ अवसर का, जिसमें नागपुर के पांच सृजनशील कलाकार पंकज इटकेलवार, महेश मानकर, बाबर शरीफ, नरोत्तम दास और कृष्णनाथ पाटिल के समूह चित्र और शिल्पों को प्रदर्शित किया गया। रूपंकर केन्द्र की ओर से संयोजित इस प्रदर्शनी में चित्रों और शिल्पों के माध्यम से कलाकारों ने अपने अंतर्मन की अनुगूंज को रूपायित किया है। प्रदर्शनी का शुभारंभ पद्मश्री कलाकार हर चन्दन सिंह भट्टी और भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रेम शंकर शुक्ल ने किया। प्रदर्शनी में प्रदर्शित कृतियाँ दर्शक के भीतर संवाद रचती हैं कहीं मन की शांति का आभास कराती हैं, तो कहीं अस्तित्व के गूढ़ प्रश्नों को उजागर करती हैं। प्रदर्शनी का हर चित्र, हर शिल्प अपने भीतर एक अनकही कथा समेटे हुए है। भावनाओं, स्मृतियों और समय के स्पर्श से बनी एक सृजनात्मक यात्रा से 2 नवंबर तक प्रतिदिन दोपहर 2 से रात 8 बजे तक कला प्रेमी परिचित हो सकेंगे। प्रकृति और मानव मन पंकज इटकेलवार की चित्रकृतियां आत्मिक अनुभूति और ध्यान की गहराई में उतरने का आमंत्रण देती हैं। पंकज ने प्रिंट मेकिंग शैली में चित्रों को आकार दिया। उनके रंगों में सौम्यता है, परंतु रेखाओं में एक दृढ़ भावनात्मक प्रवाह। वे प्रकृति और मानव मन के बीच के सामंजस्य को प्रतीकात्मक रूप में उकेरते हैं। पंकज ने सिंबल के रूप में कौआ का उपयोग किया है। उन्होंने बताया कि बचपन से कौआ की कहानी सुनते आ रहे है। यही कारण है कि उनके काम में कौआ किसी न किसी स्वरूप में दिखाई देता है। महेश मानकर अपने चित्रों में मिट्टी की गंध और लोकजीवन की सादगी को सजीव कर देते हैं। उनकी कृतियों में गांव, खेत और श्रमशील मानव की छवि रंगों में घुली प्रतीत होती है। धरती से जुड़ी संवेदनाएँ उनके चित्रों को आत्मीय बनाती हैं। कैनवास पर विचारों का संगीत बाबर शरीफ का कलात्मक संसार अमूर्तता का आकर्षक विस्तार है। उनके रंग कभी तीव्रता से फूटते हैं, तो कभी शांति में विलीन हो जाते हैं। वे आकृतियों को ठोस अर्थ देने के बजाय अनुभवों की तरलता में बहने देते हैं जैसे कैनवास पर विचारों का संगीत बह रहा हो। उनके चित्रों में मानव की खुशियों को सहेज कर रखने की स्मृतियां दिखाई पड़ती है। भुनेश्वर से आए कलाकार नरोत्तम दास की शिल्पकृतियां स्थिर होते हुए भी गति का आभास कराती हैं। उनके शिल्पों में लय और संतुलन की ऐसी संरचना है जो दर्शक को रूप और रिक्ति के सौंदर्य का बोध कराती है। उन्होंने परंपरा और आधुनिकता के संगम को मूर्त रूप दिया है। खास बात यह है कि उनके एक शिल्प में जनजातीय संस्कृति दिखाई देती है तो दूसरे में गाय, गाड़ी और दूध की केतली का समन्वय देखने को मिला। लगभग 15 दिन में तैयार होने वाले इन शिल्प आकृतियों को नरोत्तम दास ने 1200 से 1350 तापमान पर भट्टी में गर्म कर सुनहरा आकार दिया। कृष्णनाथ पाटिल के चित्र रंगों की कोमल तरंगों में बहते हुए आत्मचिंतन का आभास कराते हैं। वे शहरी जीवन के द्वंद्व, मनुष्य के भीतर के संघर्ष और एकांत की नीरवता को सूक्ष्मता से व्यक्त करते हैं।