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RBI की बड़ी कार्रवाई: इस बैंक में फंसे ग्राहकों के पैसे, सिर्फ 10,000 रुपए निकालने की मंजूरी

नई दिल्ली भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित द बघाट अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। अब यह बैंक न तो नए डिपॉजिट स्वीकार कर सकेगा और न ही नए लोन जारी कर पाएगा। इतना ही नहीं, बैंक अपनी देनदारियों के भुगतान पर भी रोक का सामना करेगा। क्या हैं RBI के ताज़ा निर्देश?     बिना पूर्व अनुमति नया ऋण या जमा स्वीकार नहीं होगा।     बैंक अपनी मौजूदा वित्तीय देनदारियाँ पूरी नहीं कर पाएगा।     हालिया निरीक्षण में सामने आई गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के बाद यह कदम उठाया गया। ग्राहकों के लिए क्या नियम?     बैंक से निकासी सीमा सिर्फ ₹10,000 तय की गई है।     ग्राहकों की जमा राशि का उपयोग उनके बकाया ऋण के समायोजन में किया जा सकता है। बीमा सुरक्षा का क्या होगा? RBI ने साफ किया है कि ग्राहकों की जमा राशि पर DICGC बीमा कवर जारी रहेगा।     हर जमाकर्ता को अधिकतम ₹5 लाख तक बीमा सुरक्षा मिलेगी।     यह सुरक्षा उनके खाते की स्थिति और अधिकार के अनुसार लागू होगी। लाइसेंस रद्द नहीं RBI ने यह भी स्पष्ट किया है कि ये पाबंदियाँ लाइसेंस रद्द करने के बराबर नहीं हैं। बैंक सीमित शर्तों के तहत अपना संचालन जारी रखेगा।

रुपये की गिरती चाल पर RBI का एक्शन, स्थिरता के लिए बनाया मास्टर प्लान

नई दिल्ली  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को गिरने से बचाने के लिए एक अहम कदम उठाया. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, RBI ने डॉलर-रुपया बाय/सेल स्वैप (Buy/Sell Swap) के जरिए विदेशी मुद्रा बाजार (forex market) में दखल दिया. इस कार्रवाई के बाद रुपये की कीमत 88.77 प्रति डॉलर पर टिकी रही, जो उसके सर्वकालिक निचले स्तर 88.80 के बेहद करीब थी. ट्रेडर्स का कहना है कि RBI ने एक साथ स्पॉट मार्केट और फॉरवर्ड मार्केट में दखल देकर डॉलर की उपलब्धता और रुपये की स्थिरता दोनों को नियंत्रित करने की कोशिश की. जानिए आखिर ये ‘बाय/सेल स्वैप’ होता क्या है और इससे कैसे रुकती है रुपये की गिरावट. क्या होता है RBI का ‘डॉलर-रुपया बाय/सेल स्वैप’ ‘बाय/सेल स्वैप’ एक ऐसा सौदा होता है जिसमें RBI अभी के समय में (स्पॉट मार्केट में) डॉलर खरीदता है, लेकिन साथ ही यह तय कर लेता है कि भविष्य की किसी तारीख पर (फॉरवर्ड मार्केट में) वही डॉलर वापस बेच देगा. सीधे शब्दों में कहें तो यह एक तरह का टेंपरेरी ट्रांजेक्शन होता है, जिसका मकसद बाजार में अचानक आई डॉलर की मांग को पूरा करना और रुपये पर दबाव को कम करना होता है. इस प्रक्रिया में RBI न तो स्थायी रूप से डॉलर जमा करता है और न ही अपनी विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ा बदलाव लाता है. बस इतना सुनिश्चित करता है कि डॉलर की कमी से रुपया कमजोर न पड़े. इससे रुपये की गिरावट कैसे रुकती है जब बाजार में डॉलर की मांग अचानक बढ़ जाती है, जैसे तेल कंपनियां, इंपोर्टर्स या फॉरेन इन्वेस्टर्स एक साथ डॉलर खरीदने लगते हैं, तो डॉलर की कीमत बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है. ऐसे समय में RBI बाजार में डॉलर की सप्लाई बढ़ाकर डॉलर की कीमत को स्थिर रखता है. अगर RBI डॉलर बेचता है तो बाजार में डॉलर की भरमार हो जाती है और रुपया संभल जाता है. अगर RBI ‘बाय/सेल स्वैप’ करता है, तो वह अस्थायी तौर पर डॉलर खरीदता है लेकिन भविष्य में बेचने का वादा करता है. इससे बाजार में भरोसा बनता है कि RBI रुपया कमजोर नहीं होने देगा, जिससे ट्रेडर्स रुपये पर सट्टा लगाना कम कर देते हैं. फॉरवर्ड प्रीमियम क्यों घटा RBI की इस स्वैप कार्रवाई के बाद डॉलर-रुपया फॉरवर्ड प्रीमियम यानी भविष्य के सौदों पर ब्याज दरें कम हो गईं. 1-वर्षीय इम्प्लाइड यील्ड 6 बेसिस पॉइंट गिरकर 2.23% पर आ गई, जो एक महीने में सबसे निचला स्तर है. यह संकेत देता है कि बाजार को भरोसा है कि RBI स्थिति पर नियंत्रण रखेगा और आने वाले समय में रुपये में बड़ी गिरावट की संभावना नहीं है. क्यों जरूरी है RBI की ये दखलअंदाजी भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और डॉलर पर निर्भरता काफी ज्यादा है. ऐसे में डॉलर का महंगा होना सीधा असर महंगाई और आयात लागत पर डालता है. RBI के समय रहते कदम उठाने से एक ओर रुपये की स्थिरता बनी रहती है, तो दूसरी ओर विदेशी निवेशकों को भी भरोसा मिलता है कि भारतीय बाजार में वोलैटिलिटी सीमित रहेगी.

छठ और दिवाली पर आपकी जेब होगी भारी, RBI की रिपोर्ट में महंगाई पर नियंत्रण का दावा

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नई दिल्ली  केंद्र सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के घरों में खाने-पीने और दूसरी चीजों की कीमतों पर दबाव कम हो रहा है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के नए सर्वे से ये बात सामने आई है. आरबीआई का ये बाय-मंथली इन्फ्लेशन एक्सपेक्टेशंस सर्वे ऑफ हाउसहोल्ड्स (IESH) सितंबर 2025 का राउंड था. इसमें घरवालों ने बताया कि मुख्य उत्पादों की कीमतों और महंगाई का दबाव घट रहा है. हालांकि, अभी की महंगाई की धारणा थोड़ी बढ़ी हुई लगी. एनआई की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में कहा गया कि घरों ने फूड प्रोडक्ट्स, नॉन-फूड प्रोडक्ट्स, हाउसिंग और सर्विसेज की लागत में राहत महसूस की है. ये सर्वे 28 अगस्त से 6 सितंबर के बीच 19 बड़े शहरों में किया गया. कुल 6,082 लोगों ने जवाब दिए. तीन महीनों में महंगाई की उम्मीद घटी सर्वे के नतीजों के अनुसार, घरों की मौजूदा मीडियन महंगाई की धारणा पहले राउंड से 20 बेसिस पॉइंट्स बढ़कर 7.4 फीसदी हो गई. लेकिन आने वाले समय के लिए उम्मीदें कम हुईं. अगले तीन महीनों की महंगाई की उम्मीद 20 बेसिस पॉइंट्स घटकर 8.1 फीसदी रह गई. एक साल आगे की उम्मीद 30 बेसिस पॉइंट्स कम होकर 8.7 फीसदी हो गई. एक साल में इतने फीसदी कीमतें बढ़ेंगी छोटे समय और एक साल के लिए, जिन लोगों को लगता है कि सामान्य कीमतें और महंगाई बढ़ेगी, उनका प्रतिशत पिछले सर्वे से कम हुआ. उत्पादों के हिसाब से, अगले तीन महीनों में 77.8 फीसदी लोगों को कीमतें बढ़ने की आशंका है, जो पहले 79.5 फीसदी था. एक साल में 86.8 फीसदी कीमतें बढ़ने का अंदेशा है, पहले ये 88.1 फीसदी था. उम्र के हिसाब से, 25 साल से कम उम्र के युवाओं ने सबसे कम मौजूदा महंगाई 7.0 फीसदी बताई. वहीं, 60 साल से ऊपर के घरों में ये 7.9 फीसदी रही. शहरों में कोलकाता में सबसे ज्यादा 10.5 फीसदी की धारणा थी, उसके बाद मुंबई 8.5 फीसदी और दिल्ली 8.0 फीसदी. आरबीआई ने साफ किया कि ये सर्वे घरों की महंगाई पर नजर डालता है, जो उनके खरीदारी के पैटर्न से प्रभावित होता है. लेकिन ये नतीजे बैंक की अपनी महंगाई की राय को जरूरी नहीं दर्शाते. ये जानकारी घरवालों को राहत देती है कि कीमतें धीरे-धीरे काबू में आ रही हैं, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है.