मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की “Skill Shift” रिपोर्ट बताती है कि 2030 तक सोशल और इमोशनल स्किल्स की मांग 22-26% बढ़ेगी। यह बदलाव इसलिए हो रहा है क्योंकि ऑटोमेशन और एआई मशीनों से इंसानी समझ और इंपैथी उसकी जगह नहीं ले सकते। आज के कॉर्पोरेट वर्कप्लेस में दिल की ताकत (इमोशनल इंटेलिजेंस) ही नई सुपरपावर बन रही है।
ग्लोबल वर्कप्लेस में बड़ा बदलाव
आज की कॉर्पोरेट दुनिया एक गहरा ट्रांसफॉर्मेशन देख रही है। पहले जॉब में टेक्निकल स्किल्स और इंटेलिजेंस (IQ) को सबसे ज़्यादा महत्व दिया जाता था। लेकिन अब कंपनियां महसूस कर रही हैं कि इमोशनल स्टैमिना — यानी दबाव में शांत रहने, दूसरों को समझने और टीम को एक साथ बांधे रखने की क्षमता — भविष्य में सफलता की बड़ी कुंजी है।
यह सिर्फ कंपनियों की भावना नहीं है, बल्कि मैकिंज़ी ग्लोबल इंस्टीट्यूट (MGI) की रिपोर्ट “Skill Shift: Automation and the Future of the Workforce” में यह साफ-साफ दिखाया गया है।
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मैकिंजी रिपोर्ट की बड़ी बातें
- रिपोर्ट के मुताबिक़, 2016 से 2030 के बीच सोशल और इमोशनल स्किल्स की मांग संयुक्त राज्य अमेरिका में 26% और यूरोप में 22% तक बढ़ेगी।
- ये ऐसे स्किल्स हैं जो मशीनें आसानी से सीख नहीं सकतीं — जैसे इम्पैथी, एडवांस कम्युनिकेशन, लीडरशिप और टीम मैनेजमेंट।
- इसके अलावा, उच्च श्रेणी की संज्ञानात्मक स्किल्स (जैसे क्रिएटिविटी, क्रिटिकल थिंकिंग और निर्णय-क्षमता) की मांग भी बढ़ेगी — अमेरिका में लगभग 19% और यूरोप में 14% तक।
- दूसरी ओर, बेसिक कॉग्निटिव स्किल्स (जैसे डेटा एंट्री, सरल गणित) और मैन्युअल स्किल्स की मांग घटने का अनुमान है।
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क्यों बढ़ रही है इमोशनल स्किल की जरूरत?
एआई और ऑटोमेशन तेजी से बढ़ रहे हैं, और मशीनें बहुत सारे रिपीटेबल काम बेहतरीन तरीके से कर सकती हैं। लेकिन इंसानी संवाद, संकट-सम्भालन, भरोसा बनाने और टीम बॉन्डिंग की भूमिका अभी भी मानव ही निभा सकते हैं। इसलिए कंपनियों ने यह समझा है कि सिर्फ तकनीक नहीं, मानवता ही आगे चलने वाला “स्किल” है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एंटरप्रेन्योरशिप (पहल करना), इनिशिएटिव लेने की क्षमता बढ़ेगी और लीडरशिप की मांग में इजाफा होगा।
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बिजनेस स्कूल और मैनेजर ट्रेनिंग में बदलाव
विश्व-स्तर की बड़ी कंपनियाँ जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, डेलॉइट और कई बिज़नेस स्कूल अब मैनेजर्स की ट्रेनिंग में इमोशनल इंटेलिजेंस (EI) को टॉप प्रायरिटी दे रही हैं। उनके मुताबिक, मशीनें काम तो कर सकती हैं, लेकिन काम को इंसानी मायना देना इंसान ही कर सकता है।
मैनेजर्स को इसलिए सिखाया जा रहा है कि वे टीम में इम्पैथी कैसे लाएं, आपस में भरोसा कैसे बनाएँ और तनावपूर्ण स्थितियों में भी स्थिरता बनाए रखें। यह सिर्फ करियर की रणनीति नहीं — यह नई मानव-केंद्रित सुपरपावर बन रही है।
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इमोशनल इंटेलिजेंस का असर
कई मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में यह पाया गया है कि लोगों की इमोशनल बुद्धिमत्ता (emotional intelligence) का सीधा असर होता है टीम के प्रदर्शन, निर्णय लेने की क्षमता और नेतृत्व पर।
जब टीम में कोई कठिन परिस्थिति आए, तो जिन लोगों में ज़्यादा इमोशनल स्किल होती है, वे टीम को बेहतर तरीके से मैनेज करते हैं और टीम को टूटने से बचाते हैं
एचआर का नजरिया — अब सिर्फ रेजूमे नहीं, दिल देखना भी ज़रूरी
आज की HR टीम सिर्फ उम्मीदवार की टेक्निकल स्किल या रेज़्यूमे को नहीं देख रही है। बल्कि उनकी भावनात्मक स्थिरता, कोलैबोरेशन की भावना और मानसिक लचीलापन भी देख रही है।
इंटरव्यू में सवाल बदल गए हैं:
- “स्ट्रेस में आप कैसे रहते हो?”
- “कठिन साथी से कैसे निपटते हो?”
- “गलती के बाद आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होती है?”
इन्हीं सवालों से देखा जा रहा है कि उम्मीदवार सिर्फ “काम कर सकता है” इस योग्य नहीं है, बल्कि “इंसानों के बीच काम कर सकता है” — यह बहुत मायने रखता है।
FAQs
Q1: मैकिंज़ी की रिपोर्ट में “सोशल और इमोशनल स्किल्स” से क्या मतलब है?
A1: मैकिंज़ी रिपोर्ट में “सोशल और इमोशनल स्किल्स” से वह क्षमताएँ हैं जैसे — इम्पैथी, अन्य लोगों के साथ संवाद, नेतृत्व, टीम मैनेजमेंट, सहयोग और भावनात्मक लचीलापन। ये स्किल्स मशीनों द्वारा आसानी से नकल नहीं की जा सकतीं।
Q2: 2030 तक सोशल-इमोशनल स्किल्स की मांग क्यों बढ़ेगी?
A2: क्योंकि ऑटोमेशन और एआई मशीनें कई रिपीटेबल और डेटा-संबंधित काम कर सकती हैं, लेकिन इंसानी भावनाओं, संवादों और संकट-प्रबंधन की जरूरत बनी रहेगी। मैकिंज़ी का अनुमान है कि 2016-2030 के बीच तकनीकी बदलावों के कारण सभी इंडस्ट्रीज़ में इन स्किल्स की मांग करीब 22-26% तक बढ़ेगी।
Q3: अगर मैं करियर की शुरुआत कर रहा हूँ, तो मुझे इमोशनल स्किल्स कैसे सुधारनी चाहिए?
A3: आप कई तरीके अपना सकते हैं:
- मैनेजमेंट या लीडरशिप ट्रेनिंग कोर्स करें जिनमें इमोशनल इंटेलिजेंस सिखाई जाती है।
- मेडिटेशन, माइंडफुलनेस या सेल्फ-रिफ्लेक्शन प्रैक्टिस करें ताकि अपनी भावनाएँ और प्रतिक्रिया बेहतर समझ पाएं।
- टीम प्रोजेक्ट्स, ग्रुप डिस्कशन और सहयोगी काम करें, जिससे आप टीमवर्क और बॉन्डिंग का अनुभव हासिल कर सकें।
- कठिन परिस्थितियों में खुद को चुनौती दें और प्रतिक्रिया सीखें — असफलता और तनाव से निपटना सीखना महत्वपूर्ण है।













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