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amit kumar

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Bihar Election: सांसद आलोक शर्मा पहुंचे दरभंगा के हायाघाट विधानसभा, कहा- NDA की सरकार जरूरी

Bihar Election

MP Alok Sharma reached Hayaghat Assembly of Darbhanga NDA government is necessary पटना/भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के भोपाल सांसद आलोक शर्मा ने सोमवार को बिहार के दरभंगा जिले की हायाघाट विधानसभा क्षेत्र से एनडीए के प्रत्याशी डॉ रामचंद्र प्रसाद के समर्थन में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि बिहार की जनता में विधानसभा चुनाव को लेकर भारी उत्साह है। यहां की जनता ने एनडीए गठबंधन की सरकार में विकास और जनकल्याण के कार्यों को देखा है। जंगलराज भी खत्म नीतीश कुमार ने बिहार में विकास के बड़े बड़े काम भी शुरू किए हैं और बिहार से जंगलराज भी खत्म किया है। हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि परिवारवाद की बेल बिहार में फिर से न पनप पाए। बिहार विकास की दौड़ में भारत का एक नंबर का राज्य बने इसलिए फिर एक बार एनडीए गठबंधन की सरकार जरूरी है। उन्होंने कहा कि जनता में उत्साह है फिर से यहां एनडीए गठबंधन की सरकार बनने जा रही है। आलोक शर्मा ने एनडीए प्रत्याशी डॉ. रामचन्द्र प्रसाद को भारी मतों से विजयी बनाने की अपील भी की। बूथ अध्यक्ष, पोलिंग एजेंट्स सम्मेलन सांसद आलोक शर्मा ने दरभंगा जिले की हायाघाट विधानसभा क्षेत्र के चारों मंडलों में बूथ अध्यक्षों और पोलिंग एजेंट और रिलीवर एजेंट्स के सम्मेलनों को संबोधित किया। सांसद शर्मा ने बूथ अध्यक्ष और उनके पूरी टीम में चुनावी जोश भरते हुए प्रबंधन के टिप्स दिए। उन्होंने कहा कि इस बार का विधानसभा चुनाव बिहार की दिशा तय करेगा। बूथ की टीम को अनुशासन में रहकर समय पर मतदान केंद्र पर पहुंचना है। मॉकड्रिल में भाग लेना है। और अंत में जब मतदान समाप्त हो तो फॉर्म 17 (सी) लेकर ही वहां से वापस होना है। सांसद शर्मा ने बूथ अध्यक्ष और पोलिंग एजेंट को मतदान की बारीकियों से अवगत कराया। भूत अध्यक्ष और पोलिंग एजेंट के सम्मेलनों में हायाघाट विधानसभा के प्रभारी जोधपुर के विधायक अतुल भंसाली जी विधानसभा प्रभारी विस्तारक और वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे।

बिहार में बेलगाम अपराध पर चिराग पासवान का फूटा ग़ुस्सा; नीतीश सरकार को चेतावनी

chirag paswan's warning to nitish

Chirag Paswan\’s Warning to Nitish Government पटना। बिहार में बढ़ते अपराध के मामलों ने सिर्फ जनता को नहीं, बल्कि सत्ता में सहयोगी दलों के नेताओं को भी चिंता में डाल दिया है। केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने एक कड़ा और स्पष्ट बयान देकर नीतीश सरकार की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘ऐसी सरकार का समर्थन कर दुख होता है’: चिराग पासवान Chirag Paswan\’s Warning to Nitishएक केंद्रीय मंत्री का सार्वजनिक रूप से यह कहना कि उन्हें ऐसी सरकार का समर्थन करना दुखद लगता है, जहां अपराध नियंत्रण से बाहर हो गया है — यह बयान मामूली नहीं, बल्कि सरकार की साख पर सीधा प्रहार है।पासवान ने कहा कि बिहार में एक के बाद एक आपराधिक घटनाओं की श्रृंखला बन गई है, और प्रशासन अपराधियों के सामने नतमस्तक नजर आ रहा है। प्रशासन की नाकामी या राजनीतिक असहायता?चिराग पासवान की टिप्पणी कि “प्रशासन पूरी तरह से नाकाम हो चुका है”, राज्य में मौजूदा हालात की गंभीरता को दर्शाती है। यह सिर्फ एक नेता की व्यक्तिगत नाराज़गी नहीं, बल्कि उस राजनीतिक गठबंधन के भीतर की बेचैनी है, जो सत्ता में भागीदार होते हुए भी अपने ही सहयोगियों से असंतुष्ट है। साजिश भी हो, ज़िम्मेदारी तो प्रशासन की ही बनती है Chirag Paswan\’s Warning to Nitishपासवान ने विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों पर भी संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि अगर ये घटनाएं सरकार को बदनाम करने की साजिश के तहत भी हो रही हैं, तो भी प्रशासन जवाबदेह है। यह वक्तव्य प्रशासनिक तंत्र की उत्तरदायित्व से भागने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाता है। जनविश्वास पर गहराता संकटबिहार पहले ही बेरोजगारी, पलायन और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में अपराध का बेलगाम हो जाना राज्य को और पीछे धकेल सकता है। अगर सत्ता में शामिल केंद्रीय नेता ही खुद को असहाय महसूस करने लगें, तो जनता के मन में यह भरोसा कैसे बचेगा कि वे सुरक्षित हैं? यह चेतावनी है, विरोध नहीं : चिराग पासवान का बयान केवल आलोचना नहीं, एक चेतावनी है — उस सरकार के लिए, जिसका वे खुद हिस्सा हैं। यह बिहार की प्रशासनिक मशीनरी के लिए आईना है, और उस गठबंधन के लिए संकेत, जो अब भीतर से असहज दिख रहा है। बिहार की राजनीति अब उस मोड़ पर है जहां सत्ता की मजबूरी और अपराध की मजबूती के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।अगर यह चुनौती स्वीकार नहीं की गई, तो यह सिर्फ राजनीतिक साझेदारी ही नहीं, बल्कि राज्य की कानून व्यवस्था और जनविश्वास का पतन भी बन सकता है।

लोकतंत्र की जड़ें हिलाने वाला फैसला! मोदी सरकार के दबाव में था चुनाव आयोग? विपक्ष ने किया बड़ा खुलासा

election commission under modi government

A decision that shook the roots of democracy! Was the Election Commission under pressure from the Modi government? The opposition made a big revelation Election Commission under Modi government जब लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रहरी, चुनाव आयोग, की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होने लगें, तब यह केवल एक संस्थान की विफलता नहीं होती, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की जड़ें हिलती हैं। बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण के संदर्भ में जो कुछ हुआ, वह इस बात का उदाहरण है कि अगर विपक्ष सजग न होता, तो एक बड़ा फर्जीवाड़ा बिना किसी शोर के अंजाम दिया जा सकता था। विपक्ष ने जब इस मुद्दे पर आवाज़ उठाई, तब उसकी नीयत पर संदेह किया गया, आरोपों का मज़ाक उड़ाया गया। लेकिन गनीमत है कि विपक्ष झुका नहीं, डटा रहा और आखिरकार चुनाव आयोग को अपना फैसला बदलना पड़ा। छह दिन के भीतर आयोग ने स्पष्ट किया कि 60 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं को अब दस्तावेज़ देने की ज़रूरत नहीं होगी। यह ‘यू-टर्न’ कई सवाल खड़े करता है। सवाल यह नहीं है कि आयोग ने फैसला क्यों बदला, बल्कि यह है कि उसने पहला फैसला किस दबाव में लिया था? विपक्ष का दावा है कि यह पूरा मामला मोदी सरकार के इशारे पर खेला जा रहा था — यह संदेह यूं ही नहीं उठता। यदि तीन करोड़ से अधिक मतदाताओं की जांच का काम जारी रहेगा, तो यह भी तय है कि यह जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए, वरना लोकतंत्र की यह बुनियादी प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ जाएगी। Read more: दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म स्टूडियो कहां है? | World’s Largest Film Studio in Hindi यहाँ एक और चिंता की बात यह है कि बीजेपी जैसी पार्टी, जो ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देती है, उसे यह लोकतांत्रिक असंतुलन क्यों नहीं दिखा? क्या यह संभव है कि नई वोटर लिस्ट के जरिए विपक्ष समर्थित मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा था? यदि नहीं, तो फिर इतनी जल्दबाजी और दबाव में फैसला क्यों लिया गया? चुनाव आयोग संविधान के प्रति जवाबदेह है, न कि किसी सरकार के प्रति। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार उसकी निष्पक्षता पर बार-बार सवाल उठे हैं, वह एक बड़े खतरे का संकेत है। यह केवल बिहार का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश की लोकतांत्रिक नींव पर सवाल है। Election Commission under Modi government विपक्ष का सजग रहना, सवाल पूछना और निर्णयों की समीक्षा कराना अब केवल उसका हक नहीं, बल्कि उसकी ज़िम्मेदारी बन चुकी है। यह एक बार फिर सिद्ध हुआ कि यदि सवाल नहीं पूछे जाते, तो जवाबदेही भी नहीं होती। अब समय है कि चुनाव आयोग पारदर्शिता से आगे बढ़े, इस पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक करे और यह स्पष्ट करे कि उसके निर्णय स्वतंत्र थे या किसी दबाव का परिणाम। लोकतंत्र का मूल्य तभी है जब हर मतदाता को पूरा विश्वास हो कि उसका वोट गिना जाएगा — न कि जांच की आड़ में गुम कर दिया जाएगा।