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बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के अब रिजर्वेशन टिकट की कैंसिलेशन संभव, रेल मंत्री का ऐलान

नई दिल्ली  अब अगर आपकी यात्रा की तारीख बदल जाए तो टिकट रद्द करने और कैंसिलेशन चार्ज देने की टेंशन नहीं रहेगी. भारतीय रेलवे ने एक नया नियम लागू करने की घोषणा की है जिसके तहत यात्री अपनी कन्फर्म ट्रेन टिकट की तारीख बिना किसी रद्दीकरण शुल्क (cancellation fee) के बदल सकेंगे. यह सुविधा जनवरी 2026 से लागू होगी. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) ने बताया कि इस नई पॉलिसी का मकसद यात्रियों को ज्यादा लचीलापन और सुविधा देना है. फिलहाल अगर किसी को अपनी यात्रा स्थगित करनी होती है, तो टिकट रद्द करनी पड़ती है और उसका शुल्क भी देना पड़ता है. नई व्यवस्था से यह झंझट खत्म हो जाएगा और यात्री आसानी से अपनी यात्रा की तारीख बदल पाएंगे. कैसे काम करेगी नई सुविधा नई व्यवस्था के तहत यात्री अपनी टिकट की तारीख केवल तब बदल सकेंगे जब नई तारीख पर सीट उपलब्ध होगी. अगर नई टिकट का किराया पुरानी से ज्यादा होगा तो यात्री को किराये का अंतर देना होगा. लेकिन अगर किराया समान है या कम है, तो किसी तरह का अतिरिक्त शुल्क नहीं देना होगा. रेलवे ने बताया कि इस सुविधा का लाभ सिर्फ उन्हीं टिकटों पर मिलेगा जो कन्फर्म होंगी. यानी वेटिंग या आरएसी टिकटों पर फिलहाल यह सुविधा लागू नहीं होगी. यात्रियों को क्या फायदा होगा यह कदम रेलवे के यात्रियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है. पहले टिकट रद्द करने पर बेस फेयर का 25 से 50 प्रतिशत तक कैंसिलेशन चार्ज कट जाता था, लेकिन अब यात्री सिर्फ तारीख बदलवाकर बिना नुकसान के यात्रा कर सकेंगे. इस फैसले से उन यात्रियों को सबसे ज्यादा फायदा होगा जिनकी योजनाएं अचानक बदल जाती हैं. चाहे ऑफिस मीटिंग आगे बढ़े या पारिवारिक वजह से यात्रा टल जाए, अब टिकट दोबारा खरीदने की जरूरत नहीं होगी. क्या है रेलवे का मकसद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) ने कहा कि रेलवे यात्रियों को “ट्रैवल फ्रेंडली” अनुभव देने की दिशा में लगातार सुधार कर रहा है. डिजिटल टिकटिंग सिस्टम के विस्तार के साथ अब यात्रियों को ज्यादा नियंत्रण और सुविधा देने की कोशिश की जा रही है. रेलवे सूत्रों के मुताबिक, इस फैसले के बाद बुकिंग सिस्टम और आईआरसीटीसी (IRCTC) प्लेटफॉर्म में तकनीकी बदलाव किए जाएंगे ताकि यात्री आसानी से ऑनलाइन ही अपनी यात्रा की तारीख बदल सकें.  

बड़े मंच पर भारत-पाक ने मिलकर ट्रंप की इच्छा को ठुकराया, अमेरिका की चाल हुई विफल

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अफगानिस्तान को धमकी दे रहे थे. इस धमकी के खिलाफ अब भारत तालिबान के साथ खड़ा हो गया है. अफगानिस्तान को लेकर यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़ा मोड़ दिखाता है. भारत ने तालिबान, पाकिस्तान, चीन और रूस के साथ मिलकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस मांग का विरोध किया है, जिसमें उन्होंने अफगानिस्तान के बगराम एयरबेस को अमेरिका को वापस सौंपने की बात कही थी. यह फैसला उस समय आया है जब तालिबान शासित अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी इस हफ्ते भारत की ऐतिहासिक यात्रा पर आने वाले हैं. मॉस्को में आयोजित ‘मॉस्को फॉर्मेट कंसल्टेशन ऑन अफगानिस्तान’ की सातवीं बैठक में भारत, ईरान, कजाकिस्तान, चीन, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान सहित 10 देशों ने हिस्सा लिया. बेलारूस के प्रतिनिधि भी अतिथि के रूप में मौजूद रहे. बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में किसी देश का नाम लिए बिना कहा गया, ‘प्रतिभागियों ने अफगानिस्तान या उसके पड़ोसी देशों में किसी भी देश की ओर से सैन्य ढांचे की तैनाती के प्रयासों को अस्वीकार्य बताया, क्योंकि यह क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के खिलाफ है.’ यह बयान सीधे तौर पर ट्रंप की योजना की आलोचना के रूप में देखा जा रहा है. ट्रंप और तालिबान भिड़े अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में मांग की थी कि तालिबान अमेरिका को बागराम एयरबेस वापस सौंप दे. यह वही बेस है, जहां से अमेरिका ने 2001 के बाद ‘वॉर ऑन टेरर’ यानी आतंकवाद के खिलाफ युद्ध अभियान चलाया था. 18 सितंबर को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने कहा, ‘हमने वह बेस उन्हें मुफ्त में दे दिया, अब हम उसे वापस चाहते हैं.’ उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर भी लिखा था- ‘अगर अफगानिस्तान ने बाग्राम एयरबेस वापस नहीं किया तो नतीजे बुरे होंगे.’ तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने ट्रंप की मांग को खारिज करते हुए कहा, ‘अफगान किसी भी हाल में अपनी जमीन किसी और को नहीं देंगे. हम अगले 20 साल युद्ध लड़ने को तैयार हैं.’ मॉस्को फॉर्मेट वार्ता के नए संस्करण में, देशों के समूह ने अफगानिस्तान में समृद्धि और विकास लाने के तौर-तरीकों पर व्यापक विचार-विमर्श किया। इन देशों ने अफगानिस्तान और पड़ोसी देशों में सैन्य बुनियादी ढांचे तैनात करने के कुछ देशों के प्रयासों को 'अस्वीकार्य' बताया, क्योंकि यह क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के हितों की पूर्ति नहीं करता है। तालिबान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी ने पहली बार मॉस्को फॉर्मेट वार्ता में भाग लिया। कुछ हफ्ते पहले, ट्रंप ने कहा था कि तालिबान को बगराम एयरबेस अमेरिका को सौंप देना चाहिए, क्योंकि इसे वॉशिंगटन ने स्थापित किया था।मॉस्को में हुई बातचीत में भाग लेने वाले देशों ने द्विपक्षीय और बहुपक्षीय दोनों स्तरों पर आतंकवाद-रोधी सहयोग को मजबूत करने का आह्वान किया। बयान में कहा गया, 'उन्होंने जोर देकर कहा कि अफगानिस्तान को आतंकवाद को खत्म करने और इसे जल्द से जल्द जड़ से मिटाने के लिए ठोस कदम उठाने में मदद दी जानी चाहिए, ताकि काबूल की धरती का इस्तेमाल पड़ोसी देशों और अन्य जगहों की सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में न हो।' इसमें कहा गया कि इन देशों ने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद अफगानिस्तान, क्षेत्र और व्यापक विश्व की सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है। भारत, रूस और चीन के अलावा, इस बैठक में ईरान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान ने भी भाग लिया। इन देशों ने इस क्षेत्र और इससे आगे के देशों के साथ अफगानिस्तान के आर्थिक संबंधों की आवश्यकता पर जोर दिया। मुत्ताकी की यात्रा क्यों है खास भारत का इस मुद्दे पर तालिबान के साथ खड़ा होना कई मायनों में ऐतिहासिक है. मुत्ताकी पहली बार भारत की यात्रा पर आ रहे हैं, जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने उन्हें 9 से 16 अक्टूबर तक यात्रा की अनुमति दी है. क्योंकि मुत्ताकी UNSC की प्रतिबंधित सूची (Resolution 1988) में शामिल हैं, इसलिए उन्हें विशेष मंजूरी मिली है. बगराम क्यों चाहता है अमेरिका? काबुल से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित बाग्राम एयरबेस अफगानिस्तान का सबसे बड़ा हवाई अड्डा है. इसमें दो बड़े रनवे हैं, जिसमें से एक 3.6 किमी और दूसरा 3 किमी लंबा. पहाड़ी इलाके के कारण अफगानिस्तान में बड़े विमानों की लैंडिंग मुश्किल होती है, ऐसे में बगराम एक रणनीतिक केंद्र माना जाता है.  

फर्स्ट कजिन मैरिज पर ब्रिटेन में छिड़ी बहस, सामाजिक-धार्मिक और मेडिकल पहलुओं पर क्या हैं तर्क?

लंदन  ब्रिटेन में फर्स्ट कजिन से शादी करना अबतक कानूनी रूप से वैध है. फर्स्ट कजिन में चचेरे, ममेरे, फुफेरे, मौसेरे भाई-बहन आते हैं. इस देश के नियमों के अनुसार यहां फर्स्ट कजिन आपस में विवाह कर सकते हैं. लेकिन हाल के वर्षों में इस पर स्वास्थ्य जोखिमों, सांस्कृतिक परंपराओं और सार्वजनिक नीतियों को लेकर तेज विवाद चल रहा है. यह मुद्दा मुख्य रूप से दक्षिण एशियाई देश (पाकिस्तानी और बांग्लादेशी) समुदायों से जुड़ा है, जहां यह प्रथा पारंपरिक रूप से प्रचलित है. हाल ही में ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस ने फर्स्ट कजिन के फायदे को बताते हुए अपनी वेबसाइट पर एक रिपोर्ट जारी की. नेशनल हेल्थ सर्विस की ये रिपोर्ट राजनीतिक और सांस्कृतिक विवादों में आ गई. जब विवाद बढ़ा तो ब्रिटिश सरकार ने चचेरे भाई-बहन के विवाह के संभावित लाभों को बताने वाली इस ऑनलाइन रिपोर्ट को चुपचाप हटा लिया. आइए सबसे पहले समझते हैं कि फर्स्ट कजिन होते कौन हैं? कौन होते हैं फर्स्ट कजिन फर्स्ट कजिन (First Cousin) वैसा रिश्तेदार होता है, जिनके माता-पिता और व्यक्ति के माता-पिता भाई-बहन होते हैं. आसान शब्दों में कहें तो  चाचा, चाची, मौसा, मौसी, मामा, मामी, फूफा या फूफी के बेटे-बेटियां फर्स्ट कजिन कहे जाते हैं. यानी किसी के माता या पिता के सगे भाई-बहन के जितने भी बच्चे हैं, वे सारे फर्स्ट कजिन (चचेरे, ममेरे, फुफेरे, मौसेरे भाई-बहन) हैं. फर्स्ट कजिन का यह भी मतलब होता है कि जिनके बीच रिश्ता जोड़ा जा रहा है उनके ग्रैंडपेरेंट्स (दादा-दादी या नाना-नानी) एक ही हैं. यह परिवार में नजदीकी खून का रिश्ता होता है. फर्स्ट कजिन को अंग्रेजी में simply 'Cousin' भी कहा जाता है, और परिवार के विस्तार में यह सबसे आम cousin रिलेशन है.  ब्रिटिश सरकार की रिपोर्ट में क्या था? फर्स्ट कजिन विवाद के फायदे बताने वाली ये रिपोर्ट नेशनल हेल्थ सर्विस के जिनोमिक्स एजुकेशन प्रोग्राम के तहत जारी की गई थी. इसका शीर्षक था 'क्या ब्रिटेन सरकार को चचेरे भाई-बहनों के बीच विवाह पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए?'  फॉक्स न्यूज के अनुसार इस रिपोर्ट में फर्स्ट कजिन मैरिज के फायदे को बताते हुए कहा गया था कि इससे लोगों को परिवारों के विस्तार का फायदा मिलता है और आर्थिक लाभ भी होते हैं.  एनएचएस रिपोर्ट में यह भी लिखा गया है कि वंशानुगत बीमारियों के बढ़ते जोखिम के कारण अंतर-पारिवारिक विवाह "लंबे समय से वैज्ञानिक चर्चा का विषय रहे हैं, रिपोर्ट के अनुसार यूके में फर्स्ट कजिन विवाह 1500 ईस्वी से ही वैध हैं, जब राजा हेनरी अष्टम ने अपनी पूर्व पत्नी की चचेरी बहन कैथरीन हॉवर्ड से विवाह किया था.  अमेरिका में भी चचेरे भाई-बहनों के बीच विवाह पर संघीय स्तर पर प्रतिबंध नहीं है, यहां 20 राज्यों में यह प्रथा अभी भी मान्य है.  डेली मेल की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एनएचएस लेख में कहा गया था कि पहले फर्स्ट कजिन के विवाहों में आनुवंशिक बीमारी के साथ पैदा होने का जोखिम "कम" होता है.  डेली मेल के अनुसार लेख में कहा गया है, "सामान्य आबादी में किसी बच्चे के आनुवंशिक बीमारी के साथ पैदा होने की आशंका लगभग दो से तीन प्रतिशत होती है; फर्स्ट कजिन के बच्चों में यह बढ़कर चार से छह प्रतिशत हो जाती है. इसलिए पहले चचेरे भाई-बहनों के ज़्यादातर बच्चे स्वस्थ होते हैं." ब्रिटिश पीएम स्टॉर्मर ने क्या कहा है? ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने फर्स्ट कजिन मैरिज पर पॉजिटिव रुख अपनाया है. इस साल के शुरुआत में स्टॉर्मर ने कहा था कि वे इस प्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं लगाएंगे. चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार फर्स्ट कजिन विवाह से पैदा हुए बच्चों में सिकल सेल रोग और सिस्टिक फ़ाइब्रोसिस जैसी बीमारियों का खतरा ज़्यादा होता है.  कीर स्टार्मर ने अपनी लेबर सरकार के सदस्यों के साथ मिलकर तर्क दिया है कि इस मामले में लोगों को जागरुक किया जाना चाहिए.  हालांकि ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने एनएचएस की इस रिपोर्ट को "चौंकाने वाला" बताया और माफी की मांग करते हुए कहा कि चचेरे भाई-बहनों के बीच विवाह "उच्च जोखिम वाला और असुरक्षित" होता है. लेकिन सांसद इकबाल मोहम्मद ने ऐसे विवाहों का बचाव करते हुए कहा कि ये कई परिवारों के लिए सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं.  सांसद इकबाल ने स्वास्थ्य संबंधी खतरों को स्वीकार किया. लेकिन उन्होंने कहा कि कई परिवार ऐसे विवाहों को आपसी संबंध बनाने और वित्तीय सुरक्षा के लिए बढ़िया मानते हैं, उन्होंने ऐसे विवाहों पर प्रतिबंध लगाने के बजाय आनुवांशिक जांच की सिफारिश की ताकि बीमारियों के खतरे से बचा जा सके. कंजरवेटिव सांसदों ने किया विरोध पिछले हफ्ते पहली बार प्रकाशित इस लेख की सांसद रिचर्ड होल्डन ने कड़ी आलोचना की थी. उन्होंने स्टार्मर के नेतृत्व वाली लेबर सरकार पर "हानिकारक और दमनकारी सांस्कृतिक प्रथाओं के आगे घुटने टेकने" का आरोप लगाया था.  उन्होंने कहा, "कंजर्वेटिव भी चचेरे भाई-बहनों की शादी को समाप्त होते देखना चाहते हैं, लेकिन लेबर सरकार इन उचित मांगों के प्रति उदासीन है." सांसद रिचर्ड होल्डन फर्स्ट कजिन मैरिज को खत्म करने के लिए बिल लाने के पक्ष में है. इसी तरह कंजर्वेटिव सांसद क्लेयर कॉउटिन्हो ने एक्स पर कहा, "एनएचएस उम्र, बीएमआई और गर्भधारण के इतिहास के आधार पर आईवीएफ पर शर्तें लगाता है. एनएचएस आपको गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान या शराब न पीने के लिए बहुत कुछ कहता है. लेकिन एनएचएस चचेरे भाई-बहनों की शादी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहेगा." फर्स्ट कजिन मैरिज पर रोक के पक्ष में ब्रिटिश New YouGov के नए शोध से पता चलता है कि तीन-चौथाई ब्रिटिश नागरिक (77 प्रतिशत) कहते हैं कि चचेरे भाई-बहनों के बीच विवाह को लीगल नहीं बनाया जाना चाहिए, जबकि केवल 9 प्रतिशत का मानना ​​है कि कानून यथावत रहना चाहिए. चचेरे भाई-बहनों के बीच विवाह पर प्रतिबंध का सपोर्ट सभी राजनीतिक दल कर रहे हैं.  फर्स्ट कजिन मैरिज के दुष्परिणाम हेल्थ एक्सपर्ट ने फर्स्ट कजिन मैरिज को अगली पीढ़ी के खतरनाक माना है. इससे आनुवंशिक स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकता है. क्योंकि नजदीकी रक्त संबंधों में समान जीन की संभावना अधिक होती है.  ब्रिटेन की ब्रैडफोर्ड स्टडी (2007-2025) के अनुसार फर्स्ट कजिन विवाह से बच्चों में जन्म दोष का जोखिम 2-3% से बढ़कर 4-6% हो जाता है. इनमें हृदय की बीमारियां, नर्वस सिस्टम की समस्याएं … Read more

ठंड की समय से पहले एंट्री! पहाड़ों पर बर्फ, दिल्ली-NCR में भीगता अक्टूबर

नई दिल्ली दिल्ली-NCR, बिहार, बंगाल समेत देश भर के कई इलाकों में सोमवार-मंगलवार को रुक-रुक कर हुए तेज बारिश और पहाड़ों पर शुरू हुई बर्फबारी से मौसम ने करवट बदल ली है, जिससे लोगों को अक्टूबर के पहले हफ्ते में ही दिसंबर जैसी ठंड का एहसास होने लगा है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, मंगलवार को तड़के दिल्ली-NCR के कई इलाकों में पर हल्की से मध्यम बारिश हुई, जिसमें गरज-बिजली और 30-40 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं भी चलीं. इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भी हल्की बारिश देखी गई. मौसम विभाग ने बताया कि दिल्ली में सोमवार-मंगलवार की दरमियानी रात करीब 2:30 बजे तक तापमान 21.8°C दर्ज किया गया, जबकि नमी का स्तर 98 प्रतिशत तक पहुंच गया. हवाएं शांत बनी हुई हैं, जिसके कारण कोहरे छाया हुआ है और ठंडी हवा का माहौल बना हुआ है. सामान्य रहेगा न्यूनतम तापमान आईएमडी के अनुसार, मंगलवार को दिल्ली में न्यूनतम तापमान सामान्य के आसपास रहेगा, जबकि अधिकतम तापमान सामान्य से 1-2 डिग्री सेल्सियस अधिक हो सकता है. सुबह के समय उत्तर-पूर्व दिशा से 15 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलेंगी जो दोपहर में पूर्वी दिशा से 10 किमी प्रति घंटे से कम रफ्तार की हवाएं चलेंगी, जो शाम और रात तक दक्षिण-पूर्व दिशा से 8 किमी प्रति घंटे से कम रफ्तार की रहेंगी.  बुधवार को बादल छाए रहेने की संभावना IMD ने बुधवार के मौसम का पूर्वानुमान जताते हुए कहा, 'बुधवार को दिल्ली में आंशिक रूप से बादल छाए रहने की संभावना है. अधिकतम तापमान 31-33 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 20-22 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने की उम्मीद है, जो सामान्य के आसपास होंगे. सुबह में उत्तर-पूर्व दिशा से 5-10 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलेंगी जो दोपहर में उत्तर-पश्चिम दिशा से 10-15 किमी प्रति घंटे की रफ्तार तक बढ़ेगी और शाम व रात में भी इसी रफ्तार से चलती रहेंगी.' बिहार और बंगाल में भी ठंडक दिल्ली-एनसीआर के अलावा बिहार और पश्चिम बंगाल में भी बारिश ने मौसम को ठंडा कर दिया है. इन राज्यों में कई स्थानों पर हल्की से मध्यम बारिश दर्ज की गई है, जिससे तापमान में कमी आई है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अक्टूबर की शुरुआत में ही ठंड का एहसास होना असामान्य है, लेकिन ये मौसमी बदलाव राहत के साथ-साथ कुछ चुनौतियां भी ला रहा है. हिमाचल-उत्तराखंड और J-K में बर्फबारी शुरू वहीं, उत्तर भारत के ऊंचे पहाड़ी इलाकों, विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी शुरू हो गई है. इस बर्फबारी का असर मैदानी इलाकों में भी देखा जा रहा है, जहां ठंडी हवाओं ने मौसम को और सर्द कर दिया है. ऐसा ही बना रहेगा मौसम का मिजाज मौसम विभाग के अनुसार, अगले कुछ दिनों तक यह मौसमी पैटर्न बना रह सकता है. जिससे ठंड का एहसास और बढ़ेगा. मौसम विभाग ने लोगों से बारिश और ठंड को ध्यान में रखते हुए सावधानी बरतने की सलाह दी है. खासकर दिल्ली-एनसीआर, बिहार और पश्चिम बंगाल में रहने वाले लोगों को सुझाव दिया गया है कि वे मौसम अपडेट्स पर नजर रखें और यात्रा या बाहरी गतिविधियों के दौरान उचित तैयारी करें. पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी के कारण यात्रा करने वालों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है.

ईरान के खतरे को लेकर नेतन्याहू का बड़ा बयान, अमेरिका के शहर और ट्रंप के घर पर जताई आशंका

तेहरान  इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया है कि जल्द ही अमेरिका के बड़े शहर ईरानी एटॉमिक गन के दायरे में होंगे. एक इंटरव्यू के दौरान नेतन्याहू ने कहा कि ईरान 8000 किलोमीटर तक मार कर सकने वाली इंटर कांटिनेन्टल बैलेस्टिक मिसाइलें (ICBM) बना रहा है. उन्होंने कहा कि अगर इन मिसाइलों की क्षमता 3000 किलोमीटर और बढ़ा दी जाए तो इसके रेंज में न्यूयॉर्क और वाशिंगटन जैसे शहर होंगे.  यही नहीं मार-ए-लागो भी ऐसे मिसाइल के रेंज में आ जाएगा. मार-ए-लागो फ्लोरिडा के पाम बीच में स्थित एक भव्य रिसॉर्ट है. यहां अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का एक घर भी है. 17 एकड़ जमीन पर फैला मार-ए-लागो डोनाल्ड ट्रंप का निजी आवास रहा है. यहां विलासिता की तमाम सुविधाएं मौजूद हैं.  इसी साल जून में ईरान से जंग लड़ चुके इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हथियारों को लेकर ईरान की महात्वाकांक्षा से अमेरिका और दुनिया को आगाह किया.  उन्होंने एक इंटरव्यू में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के मंसूबों के बारे में सतर्क करते हुए कहा कि ईरान 8000 किलोमीटर तक मार कर सकने में सक्षम इंटर कांटिनेन्टल बैलेस्टिक मिसाइलें बना रहा है.  नेतन्याहू ने कहा कि अगर ईरान भविष्य में इस क्षमता में 3000 किलोमीटर का इजाफा और कर लेता है तो उसके पास 11000 किलोमीटर तक परमाणु हमले करने की क्षमता होगी.  इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अपनी बात को समझाते हुए कहा कि ईरान के पास इस क्षमता के होने का क्या मतलब है. इसका मतलब यह है कि अमेरिका के बड़े शहर जैसे न्यूयॉर्क सिटी, वाशिंगटन, बॉस्टन और मियामी यहां तक कि मार-ए-लागो भी ईरान के एटॉमिक गन के दायरे में आ जाएगा.  बता दें कि हाल ही में अमेरिका ने ईरान के तीन यूरेनियम संवर्धन केंद्रों नतांज, इस्फहान और फोर्दो पर बी-2 बॉम्बर विमानों से हमला कर इसे तहत-नहस करने का दावा किया था. लेकिन ईरान ने कहा था कि यूरेनियम एनरिचमेंट एक विज्ञान है और इसे कोई खत्म नहीं कर सकता है.  इसके बाद पश्चिमी दुनिया में कयास लगाया जा रहा है कि ईरान अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को फिर से आगे बढ़ा सकता है. हालांकि ईरान ने कहा है कि वो परमाणु बम नहीं चाहता है कि लेकिन यूरेनियम एनरिचमेंट से उसे कोई नहीं रोक सकता है.  ईरान का ICBM प्रोग्राम ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम मध्य पूर्व में सबसे बड़ा और एडवांस है. ईरान इस पर 1980 के दशक से ही काम कर रहा है. यह कार्यक्रम मुख्य रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) द्वारा संचालित होता है और इसमें शॉर्ट-रेंज से लेकर मीडियम-रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें (MRBM) शामिल हैं. हालांकि विश्वस्त सूत्रों के अनुसार इंटर कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम का विकास अभी प्रारंभिक चरण में है. क्या होता है ICBM, क्यों होते हैं खतरनाक? ICBM एक लंबी दूरी की मिसाइल है, जो 5,500 किलोमीटर से अधिक रेंज तक वारहेड (परमाणु, रासायनिक या पारंपरिक) ले जा सकती है. यह  एक महादेश से दूसरे महादेश पर हमला करने के लिए डिजाइन की जाती है. यह मिसाइल पृथ्वी की कक्षा में उड़ान भरकर लक्ष्य तक पहुंचती है.  ICBM मिसाइल हाइपरसोनिक गति, मल्टिपल वारहेड्स और सटीक गाइडेंस सिस्टम के कारण बेहद खतरनाक मानी जाती हैं. अगर एशिया से हमला किया जाए तो ये मिसाइलें यूएस, यूरोप जैसे दूरस्थ टारगेट को निशाना बना सकती हैं. हालांकि मार्डन वारफेयर में ICBM का इस्तेमाल नहीं हुआ है. 

केंद्र सरकार की बड़ी घोषणा: 18 जिलों में नई रेल लाइनें, ₹24,634 करोड़ की योजना को मंजूरी

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने भारतीय रेल के इंफ्रास्ट्रक्चर को सुपरफास्ट ट्रैक पर लाने के लिए बड़ा कदम उठा लिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) की बैठक में आज रेलवे मंत्रालय के चार बड़े प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई है. इनकी कुल लागत 24,634 करोड़ रुपये है. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ़ के 18 जिलों में 894 किलोमीटर नई रेल लाइनें बिछाई जाएंगी. इससे माल ढुलाई से लेकर पैसेंजर ट्रैफिक तक सब कुछ तेज़ और आसान होगा. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, ‘आज रेलवे के चार अहम प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई है. इनसे ना सिर्फ नई गाड़ियां चलेंगी बल्कि हर साल करोड़ों लीटर डीजल की बचत होगी.’ चार बड़े रेल प्रोजेक्ट जिन्हें मिली मंजूरी 1. वर्धा-भुसावल (तीसरी और चौथी लाइन) कुल लंबाई 314 किमी, लागत 9,197 करोड़ रुपये. इससे महाराष्ट्र के औद्योगिक इलाकों को तेज रेल कनेक्टिविटी मिलेगी और सालाना करीब 9 करोड़ लीटर डीजल की बचत होगी. 2. गोंदिया-डोंगरगढ़ (चौथी लाइन) 84 किमी लंबा प्रोजेक्ट, लागत 4,600 करोड़ रुपये. यह लाइन महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के टूरिस्ट सर्किट से होकर गुजरेगी. साथ ही 4.6 करोड़ लीटर डीजल की सालाना बचत होगी. 3. वडोदरा-रतलाम (तीसरी और चौथी लाइन) 259 किमी लंबा प्रोजेक्ट, गुजरात और एमपी के बीच. लागत करीब 7,600 करोड़ रुपये और अनुमानित 7.6 करोड़ लीटर डीजल की बचत. 4. इटारसी-भोपाल-बिना (चौथी लाइन) 237 किमी की लाइन, लागत 3,237 करोड़ रुपये. हर साल 6.4 करोड़ लीटर डीजल की बचत और माल ढुलाई में तेजी. PM Gati Shakti योजना के तहत ‘रेलवे की नई रफ्तार’     ये सभी प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना के तहत लागू किए जा रहे हैं, जो मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस करती है. इससे देश की लॉजिस्टिक लागत घटेगी, तेल आयात में कमी आएगी और पर्यावरण पर बोझ भी घटेगा.     सरकार का दावा है कि इन प्रोजेक्ट्स से 28 करोड़ लीटर तेल की बचत और 139 करोड़ किलो CO₂ उत्सर्जन में कमी होगी – जो 6 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर है.     इन चार प्रोजेक्ट्स से 3,600 से ज्यादा गांवों और करीब 85 लाख लोगों को डायरेक्ट रेल कनेक्टिविटी मिलेगी. विदिशा और राजनांदगांव जैसे आकांक्षी जिलों में विकास की रफ्तार बढ़ेगी.     रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, ‘नई लाइनें खुलने से रोजगार और स्वरोजगार के हज़ारों मौके बनेंगे. कोयला, सीमेंट, स्टील, अनाज जैसी वस्तुओं की ढुलाई आसान होगी. रेलवे का माल परिवहन सालाना 78 मिलियन टन बढ़ेगा.’ रेलवे में अब तक 1.5 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट मंजूर पीएम मोदी के तीसरे कार्यकाल में सिर्फ रेलवे सेक्टर में अब तक डेढ़ लाख करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी जा चुकी है. वहीं कुल मिलाकर देशभर में 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी मिल चुकी है. रेल मंत्री ने बताया कि इस साल दीपावली और छठ पर्व पर 12 हजार ट्रेनें चलाई जाएंगी, ताकि ट्रैफिक लोड संभाला जा सके. उन्होंने कहा, ‘ये सिर्फ इसलिए मुमकिन हुआ क्योंकि पिछले कुछ सालों में रेलवे की कैपेसिटी बिल्डिंग पर बड़े पैमाने पर काम हुआ है.’  

बलूचिस्तान में आतंक का नया गठबंधन, लश्कर-ए-तैयबा और ISIS-K के संबंधों का खुलासा

इस्लामाबाद  पाकिस्तान की सेना और आईएसआई लंबे समय से आतंकी गुटों को हथियार बनाकर क्षेत्रीय खेल खेल रही है. अब बलूचिस्तान में एक नया खतरा उभरा है – लश्कर-ए-तैयबा और इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रांत (आईएसके) का गठबंधन. आईएसआई की मदद से ये दोनों आतंकी संगठन मिलकर बलूच विद्रोहियों और अफगान तालिबान के कुछ गुटों पर हमला कर रहे हैं. आईएसके की मैगजीन 'यलगार' में भारत के कश्मीर में हमलों की योजना का जिक्र भी है. हाल ही में आईएसके के समन्वयक मीर शफीक मेंगल की एक फोटो सामने आई, जिसमें वे लश्कर के वरिष्ठ कमांडर राणा मोहम्मद अशफाक को पिस्तौल दे रहे हैं. यह फोटो पाकिस्तान की आतंक प्रायोजित गतिविधियों को बेनकाब करती है.  हाल ही में लीक हुई फोटो में आईएसके के बलूचिस्तान समन्वयक मीर शफीक मेंगल लश्कर के नजीम-ए-आला (मुख्य कमांडर) राणा मोहम्मद अशफाक को पिस्तौल भेंट कर रहे हैं. यह तस्वीर आईएसआई की सीधी संरक्षण वाली साजिश को दिखाती है. राणा अशफाक लश्कर को पाकिस्तान भर में फैला रहा है – नए मर्कज (ट्रेनिंग सेंटर) खोल रहा है. दूसरे आतंकी गुटों से संपर्क बढ़ा रहा है.  मीर शफीक मेंगल पूर्व बलूचिस्तान के केयरटेकर मुख्यमंत्री नासिर मेंगल का बेटा है. वो आईएसआई का पुराना एजेंट है. 2010 से वो एक निजी किलर स्क्वॉड चला रहा है, जो बलूच राष्ट्रवादियों को मारता है. 2015 से वो आईएसके के लिए सुरक्षित घर, फंडिंग और हथियार मुहैया करा रहा है. पाकिस्तान की 2015 की जॉइंट इन्वेस्टिगेशन टीम (जेआईटी) रिपोर्ट में भी उसका नाम आया है. आईएसके के कैंप: आईएसआई की फैक्ट्री 2018 तक आईएसआई ने आईएसके को फंडिंग और लॉजिस्टिक्स देकर बलूचिस्तान में दो मुख्य कैंप बनवाए – मस्तुंग और खुजदार जिले में. मेंगल इन कैंपों का इंचार्ज था. मस्तुंग कैंप बलूच विद्रोहियों पर हमलों के लिए, खुजदार अफगानिस्तान में क्रॉस-बॉर्डर मिशनों के लिए. आईएसआई के बीच से हथियार और पैसे आते थे. 2023 में अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता में आया, तो आईएसआई ने आईएसके को नया रूप दिया. मस्तुंग कैंप बलूचों पर, खुजदार अफगानिस्तान पर फोकस. मेंगल का किलर स्क्वॉड आईएसआई के आदेश पर बलूच विद्रोहियों को मारता रहा. मेंगल की राजनीतिक पहुंच मजबूत है – 2023 की एक फोटो में वे राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के साथ दिखे. मार्च 2025 का हमला: गठबंधन का जन्म मार्च 2025 में बलूच लड़ाकों ने मस्तुंग कैंप पर बड़ा हमला किया, 30 आतंकी मारे गए. आईएसआई ने जवाब में लश्कर को बुलाया. जून 2025 में राणा अशफाक बलूचिस्तान पहुंचे. लश्कर के डिप्टी सैफुल्लाह कसूरी ने 'जिरगा' (बैठक) बुलाई, जिसमें बलूच अलगाववादियों के खिलाफ जिहाद की कसम खाई. मेंगल और अशफाक की फोटो इस गठबंधन की पुष्टि करती है. विश्लेषकों का कहना है कि आईएसआई बलूच विद्रोहियों और अफगान तालिबान के उन गुटों पर हमला करवाना चाहता है, जो इस्लामाबाद के कंट्रोल में नहीं हैं. यह प्रॉक्सी वॉर (छद्म युद्ध) का हिस्सा है. लश्कर की पुरानी जड़ें बलूचिस्तान में लश्कर बलूचिस्तान में नया नहीं. क्वेट्टा में 'मर्कज ताकवा' कैंप है, जिसकी कमान अफगान युद्ध के वेटरन मियां सकीब हुसैन के पास है। 2002-2009 में लश्कर ने यहां ट्रेनिंग कैंप चलाया। 2006 में इंडियन मुजाहिदीन के सह-संस्थापक यासीन भटकल को यहीं हथियार ट्रेनिंग मिली. अब लगता है कि लश्कर आईएसके के साथ मिलकर बलूच विद्रोहियों पर हमले करेगा, जैसे अफगान जिहाद में अल-कायदा के साथ किया था. आईएसआई की निगरानी में यह गठबंधन पाकिस्तान के आतंक तंत्र को बदल रहा है – अलग विचारधारा वाले गुट एक हो रहे हैं, दक्षिण एशिया में अस्थिरता फैलाने के लिए. क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा यह गठबंधन अफगानिस्तान, बलूचिस्तान और कश्मीर के लिए बड़ा खतरा है. पाकिस्तान आईएसके को 'दाएश' कहकर दुनिया को बेवकूफ बनाता है, लेकिन खुद इस्तेमाल कर रहा है. आईएसआई की यह साजिश 'प्लॉजिबल डिनायबिलिटी' (इनकार करने लायक) के तहत चल रही है. भारत और अफगानिस्तान को सतर्क रहना होगा. 

\’मनोहर कहानियों\’ से नहीं जीती जाती जंग! वायुसेना चीफ के बयान से पाक की पोल खुली

नई दिल्ली भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान पर तीखा प्रहार किया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान हर युद्ध में झूठी और आकर्षक कहानियां गढ़ता है, ताकि अपनी हार छिपा सके. ऑपरेशन सिंदूर जैसे हाल के संघर्ष में भी पाक ने झूठ फैलाए. वायुसेना प्रमुख का यह बयान पाक की प्रोपेगैंडा मशीनरी पर सटीक है. 6 ऐतिहासिक फैक्ट्स से समझते हैं कि पाकिस्तान कैसे युद्धों में झूठ बुनता रहा है. 1. 1947-48 कश्मीर युद्ध: 'आजादी की लड़ाई' का झूठ पाकिस्तान ने कबायली हमले को 'आजादी की लड़ाई' बताया, लेकिन यह पाक आर्मी समर्थित आक्रमण था. पाक ने दावा किया कि स्थानीय विद्रोह है, लेकिन दस्तावेजों से साबित हुआ कि पाक ने हजारों सैनिक भेजे. भारत ने श्रीनगर बचाया, लेकिन पाक ने अपनी हार को 'नैतिक जीत' कहा. 2. 1965 युद्ध: 'ग्रैंड स्लैम' की काल्पनिक जीत पाकिस्तान ने 'ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम' को सफल बताया, दावा किया कि जम्मू पर कब्जा कर लिया. लेकिन भारत ने पलटवार से लाहौर पर हमला किया. पाक ने प्रोपेगैंडा में कहा कि भारत हार गया, जबकि ताशकंद समझौते में पाक ने कब्जे वाले इलाके छोड़े. 'जीत की कहानी' पाक मीडिया ने फैलाई. 3. 1971 युद्ध: सैन्य हार को 'भारतीय आक्रमण' का नाम पाकिस्तान ने पूर्वी पाक (अब बांग्लादेश) में हार को 'भारतीय साजिश' कहा. 93,000 सैनिकों की सरेंडर को नकारा. पाक ने दावा किया कि युद्ध 'नैतिक जीत' था, लेकिन शिमला समझौते में हार स्वीकार की. प्रोपेगैंडा ने कहा कि पाक ने 'इस्लामी एकता' बचाई. 4. 1999 कारगिल युद्ध: 'मुजाहिदीन' का झूठा नाम पाकिस्तान ने कारगिल घुसपैठ को 'कश्मीरी मुजाहिदीन' की लड़ाई बताया, सेना की संलिप्तता नकारा. लेकिन पकड़े और मारे गए पाक सैनिकों के दस्तावेजों से साबित हुआ कि पाक आर्मी ने घुसपैठ की. नवाज शरीफ ने बाद में माना, लेकिन प्रोपेगैंडा ने 'जीत' का दावा किया. 5. 2019 बालाकोट एयरस्ट्राइक: 'दो जेट गिराए' का झूठ बालाकोट हमले के बाद पाक ने दावा किया कि दो भारतीय जेट गिराए. लेकिन केवल एक मिग-21 गिरा. पाक का एफ-16 भी नष्ट हुआ. पाक ने विंग कमांडर अभिनंदन की गिरफ्तारी को 'बड़ी जीत' बताया, लेकिन सच्चाई सामने आई. 6. 2025 ऑपरेशन सिंदूर: 'राफेल गिराया' की फर्जी वीडियो हाल के ऑपरेशन सिंदूर में पाक ने दावा किया कि भारतीय राफेल जेट गिराए, अमृतसर पर हमला किया. लेकिन पीआईबी ने साबित किया कि ये फर्जी वीडियो और एआई-जनरेटेड कहानियां हैं. पाक मीडिया ने 'सिविलियन मौतों' का प्रोपेगैंडा फैलाया, लेकिन सच्चाई उलट थी.

पाक में जाफर एक्सप्रेस पर फिर हमला, बलूच विद्रोहियों ने कहा- हमले थमेंगे नहीं

बलूचिस्तान पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में मंगलवार को जाफर एक्सप्रेस ट्रेन को निशाना बनाकर एक बार फिर विस्फोट किया गया। इसमें कई लोग घायल हो गए। क्वेटा की ओर जा रही इस ट्रेन पर सिंध-बलूचिस्तान सीमा के पास सुल्तानकोट क्षेत्र में एक तात्कालिक विस्फोटक उपकरण (IED) से हमला किया गया। इसके कारण कम से कम छह डिब्बे पटरी से उतर गए। यह इस साल मार्च के बाद से जाफर एक्सप्रेस पर हुआ ताजा हमला है। बलूच रिपब्लिकन गार्ड्स ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। उन्होंने दावा किया गया कि ट्रेन में पाकिस्तानी सेना के जवान यात्रा कर रहे थे। समूह ने अपने बयान में कहा, "यह हमला तब किया गया जब पाकिस्तानी सेना के जवान ट्रेन में सवार थे। विस्फोट के परिणामस्वरूप कई सैनिक मारे गए और घायल हुए साथ ही ट्रेन के छह डिब्बे पटरी से उतर गए।" हालांकि, अभी तक किसी की मौत की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। बलूच विद्रोहियों का दावा बलूच रिपब्लिकन गार्ड्स ने अपने बयान में यह भी कहा कि "ऐसे हमले तब तक जारी रहेंगे जब तक बलूचिस्तान की आजादी नहीं मिल जाती।" घटनास्थल पर बचाव दल और सुरक्षा बल पहुंच चुके हैं, और राहत कार्य चल रहा है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो में घायल लोगों को दिखाया गया है, जो इस हमले की गंभीरता को दर्शाता है। जाफर एक्सप्रेस क्वेटा से पेशावर तक चलती है। इस साल कई बार निशाना बन चुकी है। मार्च में सबसे घातक हमला हुआ था, जब बोलन क्षेत्र में ट्रेन को हाइजैक कर लिया गया था, जिसमें 21 यात्रियों और चार सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई थी। इसके जवाब में सुरक्षा बलों ने 33 आतंकवादियों को मार गिराया था।

नोबेल पुरस्कार 2025: फिजिक्स में क्वांटम रिसर्च के लिए जॉन क्लार्क, डेवोरेट और मार्टिनिस को मिला सम्मान

स्टॉकहोम  भौतिकी में एक प्रमुख प्रश्न किसी ऐसे तंत्र का अधिकतम आकार है जो क्वांटम यांत्रिक प्रभावों को प्रदर्शित कर सके। इस वर्ष के नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने एक विद्युत परिपथ के साथ प्रयोग किए, जिसमें उन्होंने क्वांटम यांत्रिक सुरंग निर्माण और क्वांटाइज्ड ऊर्जा स्तरों को एक ऐसे तंत्र में प्रदर्शित किया जो हाथ में पकड़ने लायक बड़ा था। इस साल का भौतिकी में नोबेल पुरस्‍कार जॉन क्लार्क कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले, अमेरिका, मिशेल एच. डेवोरेट येल विश्वविद्यालय, न्यू हेवन, कनेक्टिकट और कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सांता बारबरा, अमेरिका जॉन एम. मार्टिनिसए कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सांता बारबरा को दिया गया है। वर्ष 2025 के नोबेल पुरस्कार की घोषणा सोमवार से शुरू हो गई है। इसकी शुरुआत स्टॉकहोम के कारोलिंस्का संस्थान में एक समिति द्वारा चिकित्सा के क्षेत्र में पुरस्कार की घोषणा के साथ हुई है। मंगलवार को भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार का ऐलान हुआ है। भौतिकी का नोबेल पुरस्कार 3 वैज्ञानिकों जॉन क्लार्क, मिशेल एच डेवोरेट, जॉन एम मार्टिनिस दिया गया है। नोबेल समिति के अध्यक्ष ओले एरिक्सन ने कहा, “यह सचमुच अद्भुत है कि क्वांटम यांत्रिकी, जो सदियों पुरानी अवधारणा है, आज भी हमें नई खोजों से चकित कर रही है। यह न केवल रोचक है, बल्कि बेहद उपयोगी भी है, क्योंकि यही विज्ञान आधुनिक डिजिटल तकनीक की नींव है।”  स्वीडन की रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने मंगलवार को कहा कि, कंप्यूटर चिप्स में इस्तेमाल होने वाले ट्रांजिस्टर हमारे आसपास मौजूद क्वांटम तकनीक का एक बेहतरीन उदाहरण हैं। समिति की ओर से जारी बयान में बताया गया कि इस साल का फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार उन खोजों को सम्मानित करता है, जिन्होंने क्वांटम तकनीक की नई पीढ़ी का रास्ता खोला है। इसमें क्वांटम क्रिप्टोग्राफी, क्वांटम कंप्यूटर और क्वांटम सेंसर जैसे उन्नत क्षेत्रों के विकास की अपार संभावनाएं शामिल हैं। 226 वैज्ञानिकों को मिला है भौतिकी का नोबेल पुरस्कार एक दिन पहले ही तीन वैज्ञानिकों मैरी ई.ब्रुनको, फ्रेड रैमस्डेल और डॉ शिमोन साकागुची को चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की गई थी। साल 1901 से 2024 के बीच 118 बार भौतिकी के क्षेत्र में यह सम्मान प्रदान किया जा चुका है। अब तक 226 वैज्ञानिकों को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। पिछले साल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अग्रदूत जॉन हॉपफील्ड और जेफ्री हिंटन को मशीन लर्निंग के आधार स्तंभ बनाने में मदद के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।  कब होगा नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान? नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की कड़ी में बुधवार को रसायन विज्ञान और बृहस्पतिवार को साहित्य के क्षेत्र के विजेताओं के नाम घोषित किए जाएंगे। नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा शुक्रवार को और अर्थशास्त्र में नोबेल मेमोरियल पुरस्कार की घोषणा 13 अक्टूबर को की जाएगी। पुरस्कार समारोह 10 दिसंबर को आयोजित किया जाएगा, जो इसके संस्थापक स्वीडिश उद्योगपति और डायनामाइट के आविष्कारक अल्फ्रेड नोबेल की पुण्यतिथि है। नोबेल की 1896 में इसी दिन मृत्यु हुई थी। इन प्रतिष्ठित पुरस्कारों में 1.1 करोड़ स्वीडिश क्रोनर (लगभग 12 लाख अमेरिकी डॉलर) की नकद राशि प्रदान की जाती है।