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Niraj mishra

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Muni Shri Pramansagar: आलोचात्मक शव्दों के प्रयोग से बात और विगड़ती है

Muni Shri Pramansagar

Muni Shri Pramansagar Use of critical words makes matters worse भोपाल। “आरोप परख,आलोचात्मक,अपमान जनक आदेशात्मक इन चार सूत्रों का ध्यान रखते हुये यदि आप अपने बचनों का ध्यान रखेंगे तो आप विनम्रता की प्रतिमूर्ति कहलायेंगे” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने व्यक्त किये। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया शनिवार को प्रातः6 बजे मुनिसंघ का मंगलविहार पिपलानी दि. जैन मंदिर होते हुये सोनागिरि कालोनी की ओर होगा तथा प्रातःकालीन मंगल प्रवचन एवं आहार चर्या उपरांत वापिस अवधपुरी लौट आऐंगे एवं सांयकालीन शंकासमाधान होगा रविवार को प्रातः8:30 बजे प्रवचन के उपरांत विद्याप्रमाण गुरुकुलम् टीम द्वारा आमंत्रित करते हुये भोपाल जैन समाज बंधुओं के साथ 10:30 बजे से दीपावली मिलन समारोह रखा गया है तथा सभी के लिये भोजन व्यवस्था की गई है। अप्रिय बात मत करो मुनि श्री ने कहा पूंछतांछ किये बिना सीधे सीधे आरोपात्मक भाषा का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिये जो बात आपको अच्छी नहीं लगती वह बात दूसरों को भी अच्छी नहीं लगेगी, कोई भी घटना घटे तो तुरंत अप्रिय बात मत करो उसे भी अपनी बात रखने का अवसर दीजिये, गलत का प्रतिकार गलत तरीकों से नहीं हो सकता है,दूसरा है “आलोचात्मक शव्दों का प्रयोग” न करते हुये उसे गल्ती का अहसास कराओ आलोचात्मक शव्दों के प्रयोग से बात और विगड़ेगी और वह आलोचना सुनकर आपसे दूर हो जाऐगा, उदाहरण के लिये मान लीजिये घर में पत्नी या बहु ने सब्जियां बनाई और मिर्च ज्यादा हो गयी तो सीधे सीधे वह बात न कहते हुये कह दो कि खाना बहुत अच्छा बना है,पर आज खाना बनाते समय शायद मन इधर उधर भटक गया होगा इसलिये मिर्ची ज्यादा हो गई, इससे आपने अपनी बात भी कह दी और उसे बुरा भी नहीं लगा इसीलिए कहा गया है कि “अच्छा देखोगे और अच्छा बोलोगे तभी अच्छा होगा,बुरा वोलने बाले के कभी अच्छे परिणाम नहीं निकलते, बोलचाल में तो सदैव अमीरी झलकना चाहिये संसार में जितने भी अमीर और अच्छे लोग है उनकी वाणी में सहजता और विनम्रता झलकती है,भले ही आप अमीर न भी हों लेकिन बोलचाल में गरीब क्यों बनते हो? देश की संस्कृति है मुनि श्री ने कहा कि भले ही आपका वह कर्मचारी हो या डिराईबर यदि आप उससे जी लगाकर बात करेंगे तो उसे भी अच्छा लगेगा और वह और अच्छे से कार्य को करेगा उन्होंने कहा एक बात सदैव ध्यान रखना कि “मान दैने से ही मान मिलता है,तथा अपमान करने वाला स्वतःअपमानित होता है” मुनि श्री ने कहा कि किसी को भी छोटा या तुच्छ मानकर ब्यव्हार मत करो जिससे कोई अपने आपको अपमानित महसूस करें कभी कभी अपमान करने से ऐसी गांठ वन जाती है,जो कि सर्वनाश का कारण वनती है मुनि श्री ने कहा कि यह तो हमारे देश की संस्कृति है कि अपने से बड़ों को जी लगाकर तथा सम्मान सहित बोलने से सभी को अच्छा लगता है। कोई भी कार्य हो किसी के साथ आदेशात्मक भाषा के साथ उपयोग न करें।

Bhopal News: मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज करेंगे शंका का समाधान,धर्म सभा में दिए गुरूमंत्र

Muni Shri Praman Sagar Maharaj

Muni Shri Praman Sagar Maharaj resolve doubts भोपाल। “अच्छा देखू,अच्छा बोलूं, अच्छा करूं,औरअच्छा बनूं- यह चार भावनायें सभी के दिल और दिमाग में रहेंगी तो चारों ओर अच्छा ही अच्छा होगा” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने अवधपुरी के विद्याप्रमाण गुरुकुलम् में गुरूवार को धर्म सभा में व्यक्त किये। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया शनिवार 25 अक्टूबर को प्रातः मुनिसंघ पिपलानी दि. जैन मंदिर की बंदना करते हुये सोनागिरि में पहुंचेंगे तथा प्रातःकालीन प्रवचन सभा को सम्वोधित करेंगे एवं आहार चर्या यंही से ही संपन्न होगी दौपहर में सामायिक के उपरांत बापिस अवधपुरी पहुंचेंगे एवं सांयकालीन शंकासमाधान संपन्न होगा। विसंगति में भी संगति 26अक्टूबर को प्रातः8:30 बजे से रविवारीय धर्मसभा एवं दीपावली मिलन कार्यक्रम रखा गया है। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि आचार्य गुरुदेव विद्यासागरजी महाराज ने हायकू लिखा “आलोचन से लोचन खुलते, सो स्वागत है” आलोचना सुनने से स्वंय के प्रति सजग हो जाओ, तो कभी दुःख नहीं होगा और जब दुःख नहीं होगा तो बुरा भी नहीं हो सकता उन्होंने कहा कि अच्छा बनने के लिये पहला सूत्र है “पांजेटिव एटिट्यूड” अर्थात बुराई मेंअच्छाई,दुःख में सुख,प्रतिकूलता में अनूकूलता, विसंगति में भी संगति देखने की कोशिश करें। दृष्टीकोण बदल गया मुनि श्री ने कहा कि दुःख तो सभी के जीवन में आता है, लेकिन दुःख के क्षणों में भी जो सुख खोज लेता है वही इंसान सुखी है। उन्होंने एक घटना सुनाते हुये कहा कि एक व्यक्ति के मकान में आग लग गई लोग आऐ और उन्होंने संवेदना व्यक्त की तो उसने कहा कि मुझे इस बात का दुःख नहीं कि मेरा मकान जल गया मुझे खुशी इस बात की है कि मेरा परिवार बच गया मकान तो फिर भी बन जाऐगा लेकिन यदि परिवार चला जाता तो कुछ भी नहीं बचता मुनि श्री ने कहा कि यदि आपका दृष्टीकोण बदल गया तो विपत्ति में संपत्ति,प्रतिकूलता में अनूकूलता दिखने लगेगी। सभी धर्मों के ग्रंथ मुनि श्री ने कहा कि गुरुओं के सानिध्य में रहकर यदि आपने अपनी सोच को सकारात्मक रखना शुरु कर दिया तो फिर तुम्हें न तो किसी व्यवस्था से सिकायत रहेगी और न ही समाज और रिस्तेदारों तथा घर परिवार से सिकायत रहेगी। यदि नकारात्मक सोच रखोगे तो नकारे हो जाओगे उन्होंने कहा कि अपने व्यवहार में बदलाव लाइये और अपने आपको भीतर से सम्हालने की चेष्टा कीजिये उन्होंने विवेकानंद का उदाहरण देते हुये कहा कि एक बार वह धर्म संसद में गये तो सभी धर्मों के ग्रंथ एक के ऊपर एक रखे थे लेकिन सबसे नीचे “गीता” थी तो किसी ने मजाक उड़ाते हुये कहा कि देख लो आपके धर्म ग्रंथ को सबसे नीचे रखकर आपका अपमान किया जा रहा है तो विवेकानंद ने सौम्यता के साथ कहा कि कोई अपमान नहीं उसे सही जगह रखा गया है क्यों कि वह फाउंडेशन है, सकारात्मक सोच का परिणाम हमेशा अच्छा ही निकलता है यह है बुराई से अच्छाई निकालने का “दृष्टिकोण” यदि आप अच्छे से रहोगे तो आपको हर जगह अच्छा ही अच्छा दिखेगा।