Bhopal News: मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज करेंगे शंका का समाधान,धर्म सभा में दिए गुरूमंत्र
Muni Shri Praman Sagar Maharaj resolve doubts भोपाल। “अच्छा देखू,अच्छा बोलूं, अच्छा करूं,औरअच्छा बनूं- यह चार भावनायें सभी के दिल और दिमाग में रहेंगी तो चारों ओर अच्छा ही अच्छा होगा” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने अवधपुरी के विद्याप्रमाण गुरुकुलम् में गुरूवार को धर्म सभा में व्यक्त किये। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया शनिवार 25 अक्टूबर को प्रातः मुनिसंघ पिपलानी दि. जैन मंदिर की बंदना करते हुये सोनागिरि में पहुंचेंगे तथा प्रातःकालीन प्रवचन सभा को सम्वोधित करेंगे एवं आहार चर्या यंही से ही संपन्न होगी दौपहर में सामायिक के उपरांत बापिस अवधपुरी पहुंचेंगे एवं सांयकालीन शंकासमाधान संपन्न होगा। विसंगति में भी संगति 26अक्टूबर को प्रातः8:30 बजे से रविवारीय धर्मसभा एवं दीपावली मिलन कार्यक्रम रखा गया है। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि आचार्य गुरुदेव विद्यासागरजी महाराज ने हायकू लिखा “आलोचन से लोचन खुलते, सो स्वागत है” आलोचना सुनने से स्वंय के प्रति सजग हो जाओ, तो कभी दुःख नहीं होगा और जब दुःख नहीं होगा तो बुरा भी नहीं हो सकता उन्होंने कहा कि अच्छा बनने के लिये पहला सूत्र है “पांजेटिव एटिट्यूड” अर्थात बुराई मेंअच्छाई,दुःख में सुख,प्रतिकूलता में अनूकूलता, विसंगति में भी संगति देखने की कोशिश करें। दृष्टीकोण बदल गया मुनि श्री ने कहा कि दुःख तो सभी के जीवन में आता है, लेकिन दुःख के क्षणों में भी जो सुख खोज लेता है वही इंसान सुखी है। उन्होंने एक घटना सुनाते हुये कहा कि एक व्यक्ति के मकान में आग लग गई लोग आऐ और उन्होंने संवेदना व्यक्त की तो उसने कहा कि मुझे इस बात का दुःख नहीं कि मेरा मकान जल गया मुझे खुशी इस बात की है कि मेरा परिवार बच गया मकान तो फिर भी बन जाऐगा लेकिन यदि परिवार चला जाता तो कुछ भी नहीं बचता मुनि श्री ने कहा कि यदि आपका दृष्टीकोण बदल गया तो विपत्ति में संपत्ति,प्रतिकूलता में अनूकूलता दिखने लगेगी। सभी धर्मों के ग्रंथ मुनि श्री ने कहा कि गुरुओं के सानिध्य में रहकर यदि आपने अपनी सोच को सकारात्मक रखना शुरु कर दिया तो फिर तुम्हें न तो किसी व्यवस्था से सिकायत रहेगी और न ही समाज और रिस्तेदारों तथा घर परिवार से सिकायत रहेगी। यदि नकारात्मक सोच रखोगे तो नकारे हो जाओगे उन्होंने कहा कि अपने व्यवहार में बदलाव लाइये और अपने आपको भीतर से सम्हालने की चेष्टा कीजिये उन्होंने विवेकानंद का उदाहरण देते हुये कहा कि एक बार वह धर्म संसद में गये तो सभी धर्मों के ग्रंथ एक के ऊपर एक रखे थे लेकिन सबसे नीचे “गीता” थी तो किसी ने मजाक उड़ाते हुये कहा कि देख लो आपके धर्म ग्रंथ को सबसे नीचे रखकर आपका अपमान किया जा रहा है तो विवेकानंद ने सौम्यता के साथ कहा कि कोई अपमान नहीं उसे सही जगह रखा गया है क्यों कि वह फाउंडेशन है, सकारात्मक सोच का परिणाम हमेशा अच्छा ही निकलता है यह है बुराई से अच्छाई निकालने का “दृष्टिकोण” यदि आप अच्छे से रहोगे तो आपको हर जगह अच्छा ही अच्छा दिखेगा।