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amit kumar

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Muni Shri Pramansagar: आलोचात्मक शव्दों के प्रयोग से बात और विगड़ती है

Muni Shri Pramansagar

Muni Shri Pramansagar Use of critical words makes matters worse भोपाल। “आरोप परख,आलोचात्मक,अपमान जनक आदेशात्मक इन चार सूत्रों का ध्यान रखते हुये यदि आप अपने बचनों का ध्यान रखेंगे तो आप विनम्रता की प्रतिमूर्ति कहलायेंगे” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने व्यक्त किये। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया शनिवार को प्रातः6 बजे मुनिसंघ का मंगलविहार पिपलानी दि. जैन मंदिर होते हुये सोनागिरि कालोनी की ओर होगा तथा प्रातःकालीन मंगल प्रवचन एवं आहार चर्या उपरांत वापिस अवधपुरी लौट आऐंगे एवं सांयकालीन शंकासमाधान होगा रविवार को प्रातः8:30 बजे प्रवचन के उपरांत विद्याप्रमाण गुरुकुलम् टीम द्वारा आमंत्रित करते हुये भोपाल जैन समाज बंधुओं के साथ 10:30 बजे से दीपावली मिलन समारोह रखा गया है तथा सभी के लिये भोजन व्यवस्था की गई है। अप्रिय बात मत करो मुनि श्री ने कहा पूंछतांछ किये बिना सीधे सीधे आरोपात्मक भाषा का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिये जो बात आपको अच्छी नहीं लगती वह बात दूसरों को भी अच्छी नहीं लगेगी, कोई भी घटना घटे तो तुरंत अप्रिय बात मत करो उसे भी अपनी बात रखने का अवसर दीजिये, गलत का प्रतिकार गलत तरीकों से नहीं हो सकता है,दूसरा है “आलोचात्मक शव्दों का प्रयोग” न करते हुये उसे गल्ती का अहसास कराओ आलोचात्मक शव्दों के प्रयोग से बात और विगड़ेगी और वह आलोचना सुनकर आपसे दूर हो जाऐगा, उदाहरण के लिये मान लीजिये घर में पत्नी या बहु ने सब्जियां बनाई और मिर्च ज्यादा हो गयी तो सीधे सीधे वह बात न कहते हुये कह दो कि खाना बहुत अच्छा बना है,पर आज खाना बनाते समय शायद मन इधर उधर भटक गया होगा इसलिये मिर्ची ज्यादा हो गई, इससे आपने अपनी बात भी कह दी और उसे बुरा भी नहीं लगा इसीलिए कहा गया है कि “अच्छा देखोगे और अच्छा बोलोगे तभी अच्छा होगा,बुरा वोलने बाले के कभी अच्छे परिणाम नहीं निकलते, बोलचाल में तो सदैव अमीरी झलकना चाहिये संसार में जितने भी अमीर और अच्छे लोग है उनकी वाणी में सहजता और विनम्रता झलकती है,भले ही आप अमीर न भी हों लेकिन बोलचाल में गरीब क्यों बनते हो? देश की संस्कृति है मुनि श्री ने कहा कि भले ही आपका वह कर्मचारी हो या डिराईबर यदि आप उससे जी लगाकर बात करेंगे तो उसे भी अच्छा लगेगा और वह और अच्छे से कार्य को करेगा उन्होंने कहा एक बात सदैव ध्यान रखना कि “मान दैने से ही मान मिलता है,तथा अपमान करने वाला स्वतःअपमानित होता है” मुनि श्री ने कहा कि किसी को भी छोटा या तुच्छ मानकर ब्यव्हार मत करो जिससे कोई अपने आपको अपमानित महसूस करें कभी कभी अपमान करने से ऐसी गांठ वन जाती है,जो कि सर्वनाश का कारण वनती है मुनि श्री ने कहा कि यह तो हमारे देश की संस्कृति है कि अपने से बड़ों को जी लगाकर तथा सम्मान सहित बोलने से सभी को अच्छा लगता है। कोई भी कार्य हो किसी के साथ आदेशात्मक भाषा के साथ उपयोग न करें।