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दशहरे पर करें ये दिव्य मंत्रों का जाप, हर बाधा होगी समाप्त

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दशहरा भारत के सबसे पवित्र और विजय उत्सवों में से एक है। यह दिन अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक माना जाता है। यही वह दिन है जब भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर धर्म की स्थापना की थी और मां दुर्गा ने महिषासुर जैसे राक्षस का संहार किया था। इस दिन को शक्ति, विजय, साहस और सकारात्मक ऊर्जा के रूप में मनाया जाता है। दशहरे के दिन यदि सही मंत्रों का जाप किया जाए, तो न सिर्फ आध्यात्मिक उन्नति मिलती है बल्कि जीवन में चल रही बाधाएं भी दूर होती हैं। आइए जानते हैं दशहरे पर किए जाने वाले महत्त्वपूर्ण मंत्रों, उनके लाभ और जाप की विधि के बारे में। इन मंत्रों का करें जाप ॐ ह्रां ह्रीं रां रामाय नमः दशहरे के दिन ही श्री राम ने रावण का वध कर देश में शांति और सच्चाई का राज्य स्थापित किया। ऐसे में यदि आप इस मंत्र का जाप करते हो तो आपको मनचाही सफलता मिलेगी। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।। यह शक्ति, साहस और रक्षा प्रदान करता है। दशहरे के दिन इस मंत्र के जाप से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की हर बुराई का अंत होता है। ॐ हनुमते नमः श्रीराम भक्त हनुमान दशहरा के अवसर पर विशेष पूजनीय होते हैं। यह मंत्र जीवन से डर, भय, और नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है। विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो कर्ज, कोर्ट-कचहरी, या शत्रु बाधा से पीड़ित हैं। ॐ अपराजितायै नमः  इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को हर कार्य में सफलता मिलती है। यदि कोई भी शुभ कार्य करने जा रहे हो तो इस मंत्र का जाप कर के घर से बाहर निकलें। ऐसा करने के बाद आपको कभी भी निराशा का मुंह नहीं देखना पड़ेगा। मंत्र जाप की सही विधि दशहरा के दिन विजय मुहूर्त जो दोपहर के समय आता है और अपराह्न काल मंत्र जाप के लिए सबसे शुभ माने जाते हैं। स्नान के बाद, स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल पर बैठें। यदि संभव हो तो लाल या पीले रंग के आसन का प्रयोग करें। जाप शुरू करने से पहले हाथ में जल, फूल और चावल लेकर अपने उद्देश्य  का संकल्प लें। मंत्र जाप के लिए रुद्राक्ष या तुलसी की माला का प्रयोग करें। जाप करते समय अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।

कंफ्यूजन खत्म! जानें धनतेरस 2025 की सही तारीख और शुभ मुहूर्त

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धनतेरस का त्योहार दिवाली के पांच दिवसीय उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है. इस साल, धनतेरस की सही तारीख को लेकर लोग अक्सर असमंजस में हैं कि यह 18 अक्टूबर को है या 19 अक्टूबर को. इस लेख में, हम आपकी सभी शंकाओं को दूर करेंगे और धनतेरस के महत्व, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त के बारे में विस्तार से बताएंगे. 18 या 19 अक्टूबर, कब है धनतेरस? द्रिक पंचांग के अनुसार, धनतेरस त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है. इस बार त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 18 अक्टूबर, शनिवार को दोपहर 12 बजकर 18 मिनट पर होगी और इसका समापन 19 अक्टूबर, रविवार को दोपहर 1 बजकर 51 मिनट पर होगा. हिंदू धर्म में उदयातिथि को विशेष महत्व दिया जाता है, यानी वह तिथि जो सूर्योदय के समय मौजूद हो. इस साल, 18 अक्टूबर को सूर्योदय के समय त्रयोदशी तिथि प्रारंभ हो जाएगी. इसलिए, धनतेरस का पर्व शनिवार, 18 अक्टूबर 2025 को ही मनाया जाएगा. धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त धनतेरस पर पूजा का विशेष महत्व होता है. इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है. पूजा के लिए शुभ मुहूर्त का ध्यान रखना बहुत जरूरी है. इस साल, पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 16 मिनट से रात 8 बजकर 20 मिनट तक रहेगा. पूजा की कुल अवधि 1 घंटा 4 मिनट है. इस दौरान आप धन की देवी लक्ष्मी, धन के देवता कुबेर और स्वास्थ्य के देवता धन्वंतरि की पूजा करके उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं. क्यों मनाते हैं धनतेरस? महत्व और मान्यताएं धनतेरस को धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था, जिन्हें आयुर्वेद का जनक और देवताओं का वैद्य माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान धन्वंतरि देव अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे. यही कारण है कि इस दिन बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है. धनतेरस के दिन सोने, चांदी, और नए बर्तनों की खरीदारी करना एक परंपरा है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन की गई खरीदारी से धन में 13 गुना वृद्धि होती है. यह त्योहार समृद्धि, स्वास्थ्य और सौभाग्य का प्रतीक है. धनतेरस की पूजा विधि पूजा से पहले घर और पूजा स्थल की अच्छी तरह से साफ-सफाई करें. पूजा के लिए एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं. चौकी पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें. पूजा से पहले धन्वंतरि देव के लिए एक दीपक जलाएं. यह दीपक स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक है. पूजा करते समय ‘ॐ धन्वंतराय नमः’ और ‘ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्मयै नमः’ जैसे मंत्रों का जाप करें.भगवान को फल, फूल, मिठाई, और धनिया के बीज (जिसे धन का प्रतीक माना जाता है) अर्पित करें. पूजा के बाद धनतेरस की कथा अवश्य सुनें. शाम के समय घर के बाहर यम देवता के लिए एक बड़ा दीपक जलाएं. इसे यम दीप कहा जाता है, जो अकाल मृत्यु से बचाता है.

आज का राशिफल: 2 अक्टूबर को मेष से मीन तक कैसे बीतेगा दिन? जानिए विस्तार से

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मेष राशि- आज आपको ऑफिस में सीनियर्स का दबाव और घर में कलह को झेलना पड़ सकता है। जिसके कारण आपकी मानसिक शांति भंग हो सकती है। कोई रिश्तेदार आपसे आर्थिक मदद मांग सकता है लेकिन आपको लेनदेन में सतर्कता बरतनी चाहिए। जीवनसाथी का साथ मिलेगा। वृषभ राशि– आज आपको अपने काम से कुछ समय निकाल कर आराम करने की जरूरत है। धन का आगमन होगा और आर्थिक परेशानियों से राहत मिलेगी। परिवार में किसी जश्न के लिए योगदान करना पड़ सकता है। सामाजिक मान-सम्मान बढ़ेगा। जीवनसाथी के साथ अनबन हो सकती है। मिथुन राशि– आज आपको सामाजिक कार्यों के लिए तारीफ मिल सकती है। आप बिना किसी मदद या मदद के पैसा कमाने में सफल रहेंगे। गुस्से पर काबू रखें और वाद-विवाद से दूर रहें। कामकाज के कारण व्यस्तता हो सकती है। परिवार के साथ अचानक किसी ट्रिप पर जाने का प्लान बन सकता है। व्यापारिक स्थिति अच्छी रहेगी। कर्क राशि- आज आपको अपनी सेहत का ध्यान रखना चाहिए और साहसिक गतिविधियों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। आज आप उन रिश्तेदारों को अपना पैसा उधार देने से बचें जिन्होंने अभी तक पिछली रकम नहीं लौटाई है। किसी प्रभावशाली व्यक्ति से मुलाकात हो सकती है। आज आपके वैवाहिक जीवन में चीजें आपके कंट्रोल से बाहर हो सकती हैं। सिंह राशि- आज आपका मन प्रसन्न रहेगा। लिखने-पढ़ने से जुड़े कार्यों के लिए दिन अच्छा है। मान-सम्मान की प्राप्ति होगी। नौकरी में बदलाव के योग बन रहे हैं, लेकिन विदेश जाने के अवसर भी मिल सकते हैं। आर्थिक रूप से स्थिति बेहतर होगी। जीवनसाथी का साथ मिलेगा। कन्या राशि- आज आपको धैर्य से काम लेना चाहिए। आर्थिक रूप से दिन उतार-चढ़ाव भरा रहने वाला है। कोई पुराना संपर्क आपके लिए कुछ परेशानियां खड़ी कर सकता है। आज अपने लवर की फीलिंग्स को समझें। जीवनसाथी आपकी तारीफ कर सकता है। व्यापार को आगे बढ़ाने के अच्छे अवसरों की प्राप्ति होगी। तुला राशि- आज आप दूसरों के साथ खुशियों के पल को शेयर करेंगे। मन प्रसन्न रहेगा। आर्थिक लाभ मिलने की पूरी संभावना है क्योंकि पहले दिया गया कोई पैसा तुरंत वापस आ जाएगा। किसी दोस्त की मदद से व्यक्तिगत परेशानी दूर हो सकती है। काम का तनाव अभी भी आपके दिमाग पर छाया हुआ है और परिवार के लिए समय नहीं निकल पा रहा है। वृश्चिक राशि- आज आपकी सेहत पहले से अच्छी होगी। कार्यस्थल पर आपको अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलेगा। यात्रा का योग है। चीजों को कंट्रोल में रखने के लिए हर किसी की परेशानी पर ध्यान दें। व्यापार करने वालों को नई पार्टनरशिप मिल सकती है। धन की स्थिति अच्छी होगी। धनु राशि– आज आपके जीवन में खुशियों का आगमन होगा, लेकिन धैर्यशीलता बनाए रखें। परिवार की सेहत का ध्यान रखें। नौकरी में कार्यक्षेत्र में बदलाव के साथ स्थान परिवर्तन हो सकता है। संतान का साथ मिलेगा। माता-पिता की मदद से धन लाभ के संकेत हैं। बिजनेस करने वालों को व्यापारिक यात्रा करनी पड़ सकती है। मकर राशि- आज नौकरी से जुड़े अच्छे अवसरों की प्राप्ति होगी। जिन लोगों का इंटरव्यू शेड्यूल है, उन्हें पॉजिटिव रिजल्ट मिल सकता है। मान-सम्मान की प्राप्ति होगी। शासन सत्ता का सहयोग मिलेगा। वैवाहिक जीवन अच्छा रहेगा। धन संबंधी मामले आपके मन को परेशान कर सकते हैं। कुंभ राशि– आज अपने खान-पान में सावधानी बरतें। आर्थिक लाभ मिलने की संभावना है। परिवार में कटु वचनों को कहने से बचें। प्रेमी-प्रेमिका की मुलाकात हो सकती है। आपके सहकर्मी किसी खास काम में आपकी मदद कर सकते हैं। आपके परिवार का कोई सदस्य आज आपके साथ कुछ समय बिताने की जिद कर सकता है। मीन राशि– आज दिन की शुरुआत योग या ध्यान से करें। भाई-बहनों की मदद से आज आपको धन लाभ होगा। अपने भाई-बहनों से सलाह लें। परिवार की स्थिति सामान्य नहीं रहेगी। अपना हुनर ​​दिखाने के मौके आज आपके पास रहेंगे। आपको एहसास होगा कि आपकी शादी इतनी खूबसूरत पहले कभी नहीं थी।

आयुध पूजा विशेष: विजयादशमी पर शस्त्र पूजन की मान्यता और महत्ता

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विजयादशमी का पर्व हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान रखता है. यह न केवल असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है, बल्कि इस दिन आयुध पूजा यानी अस्त्र-शस्त्र की पूजा का भी विधान है. पंचांग के अनुसार, इस साल विजयादशमी का पर्व 2 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा. आइए जानते हैं कि इस दिन अस्त्र-शस्त्र की पूजा क्यों की जाती है, इसका महत्व क्या है और पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है. क्या है आयुध पूजा और क्यों है इसका महत्व? आयुध पूजा को शस्त्र पूजा के नाम से भी जाना जाता है. यह पूजा विजयादशमी यानी दशहरे के दिन की जाती है. आयुध पूजा को दक्षिण भारत और कई अन्य स्थानों पर “शस्त्र पूजा” या “सरस्वती पूजन” भी कहा जाता है. परंपरा के अनुसार, देवी-देवताओं को पूजने के साथ-साथ इस दिन अस्त्र-शस्त्र, औजारों, मशीनों और वाहनों की भी विशेष पूजा की जाती है. विजय का प्रतीक पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री राम ने इसी दिन रावण का वध कर बुराई पर अच्छाई की जीत हासिल की थी. इसके साथ ही, मां दुर्गा ने महिषासुर का वध करने के लिए जिन अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया था, वे भी पूजनीय हैं. विजयादशमी को विजय का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस दिन शत्रु पर विजय प्राप्त करने और आत्मरक्षा में सहायक अस्त्र-शस्त्र की पूजा की जाती है. यह एक तरह से उन उपकरणों के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम है जो हमें शक्ति और सुरक्षा प्रदान करते हैं. उपकरणों की पूजा आयुध पूजा का महत्व केवल अस्त्र-शस्त्र तक सीमित नहीं है. इसमें जीवन में हमें सफलता दिलाने वाले सभी कर्म के उपकरणों जैसे- विद्यार्थी अपनी पुस्तकों, व्यापारी अपने तराजू-बहीखातों, कलाकार अपने औजारों और सैनिक अपने हथियारों की पूजा करते हैं. यह पूजा इस बात का स्मरण कराती है कि हमारे उपकरण ही हमारी आजीविका और सफलता का माध्यम हैं, और हमें उनका सम्मान और संरक्षण करना चाहिए. क्षत्रिय परंपरा ऐतिहासिक रूप से, यह दिन क्षत्रिय समुदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण था. प्राचीन काल में, राजा और योद्धा युद्ध पर जाने से पहले इस दिन अपने अस्त्र-शस्त्रों की साफ-सफाई, धार और पूजा करते थे ताकि वे युद्ध में सफलता प्राप्त कर सकें. यह परंपरा आज भी जारी है. विजयादशमी 2025: आयुध पूजा का शुभ मुहूर्त     इस साल विजयादशमी का पर्व 2 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा, और इसी दिन आयुध पूजा का विधान है.     दशमी तिथि आरंभ 1 अक्टूबर 2025, शाम 7 बजकर 01 मिनट से.     दशमी तिथि समाप्त 2 अक्टूबर 2025, शाम 7 बजकर 10 मिनट तक.     विजय मुहूर्त : 2 अक्टूबर 2025, दोपहर 2 बजकर 09 मिनट से 2 बजकर 56 मिनट तक. शस्त्र पूजा शुभ मुहूर्त विजयादशमी के दिन विजय मुहूर्त में पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है, क्योंकि यह समय हर कार्य में सफलता दिलाने वाला होता है. पंचांग के अनुसार, 2 अक्टूबर को आप दोपहर 2 बजकर 09 मिनट से 2 बजकर 56 मिनट के बीच अपनी शस्त्र और उपकरणों की पूजा कर सकते हैं. यानी पूजा की कुल अवधि 47 मिनट तक रहेगी. कैसे करें आयुध पूजा? आयुध पूजा के दिन विधि-विधान से पूजा करने पर मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होता है. सबसे पहले, जिन अस्त्र-शस्त्र या उपकरणों की पूजा करनी है, उन्हें अच्छी तरह साफ करें.पूजा स्थान पर लाल कपड़ा बिछाकर उन्हें रखें. अस्त्र-शस्त्रों पर गंगाजल छिड़कें, रोली, कुमकुम और चंदन का तिलक लगाएं. उन्हें फूल (विशेषकर गेंदे के फूल), माला और वस्त्र अर्पित करें. इसके बाद मिठाई या नैवेद्य का भोग लगाएं. आखिर में, धूप-दीप जलाकर उनकी आरती करें और प्रार्थना करें कि वे सदैव आपकी रक्षा करें और आपके कर्म में सफलता दें.

महानवमी 2025: इस मुहूर्त में करें कन्या पूजन, पूजा विधि और महत्त्व जानें

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1 अक्टूबर यानी आज शारदीय नवरात्र की महानवमी है और यह नवरात्र का आखिरी दिन है. इस दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है. यह दिन अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पड़ता है. भक्त इस दिन कन्या पूजन करके शारदीय नवरात्र का पारण करते हैं. तो चलिए जानते हैं कि आज शारदीय नवरात्र पर कितने से कितने बजे तक कन्या पूजन का मुहूर्त रहेगा और साथ ही हवन का मुहूर्त कितने बजे रहेगा.  शारदीय नवरात्र महानवमी 2025 तिथि और हवन मुहूर्त आश्विन मास की नवमी तिथि की शुरुआत 30 अक्टूबर यानी कल शाम 6 बजकर 06 मिनट पर शुरू हो चुकी है और तिथि का समापन 1 अक्टूबर यानी आज शाम 7 बजकर 01 मिनट पर होगा. महानवमी पर देवी दुर्गा के महिषासुर मर्दिनी रूप की पूजा-अर्चना की जाती है.  महानवमी की पूजा के बाद हवन करना भी शुभ माना जाता है, जो आज सुबह 6 बजकर 20 मिनट से लेकर सुबह 11 बजकर 40 मिनट तक करने का सबसे अच्छा मौका मिलेगा. इस समय हवन और कन्या पूजन करने से विशेष लाभ मिलता है.  महानवमी 2025 कन्या पूजन मुहूर्त  आश्विन मास की महानवमी का पहला कन्या पूजन मुहूर्त आज सुबह 5 बजकर 01 मिनट से लेकर सुबह 6 बजकर 14 मिनट तक रहेगा. इसके बाद, दूसरा मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 09 मिनट से लेकर 2 बजकर 57 मिनट पर रहेगा. महानवमी पर कैसे करें कन्या पूजन? महानवमी पर कन्याओं को सम्मानपूर्वक आमंत्रित करें और उनका स्वागत करें. कन्याओं को आरामदायक स्थान पर बिठाकर उनके पैरों को दूध से धोएं और उनके माथे पर अक्षत, फूल या कुमकुम लगाएं. कन्याओं को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा और उपहार दें. कन्याओं के पैर छूकर आशीर्वाद लें और मां भगवती की कृपा प्राप्त करें. महानवमी के दिन करें ये उपाय मां सिद्धिदात्री की पूजा में घी का दीपक जलाएं और उन्हें फूल अर्पित करें. मां सिद्धिदात्री को विभिन्न भोग जैसे मिश्री, गुड़, हरी सौंफ, केला, दही, देसी घी और पान का पत्ता अर्पित करें. इसके बाद देवी मां से प्रार्थना करें कि वे सभी ग्रहों को शांत करें और सुख-शांति प्रदान करें

दशहरे का पावन अवसर: करें ये दान और जीवन में आएँ धन-धान्य और सुख-शांति

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भारत में दशहरा या विजयादशमी (Dussehra 2025) का पर्व सिर्फ उत्सव ही नहीं, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंका के राक्षसराज रावण का वध कर अधर्म का अंत किया था। यही नहीं, इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर देवताओं और समस्त प्रजा को भयमुक्त किया था। हर वर्ष आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को यह पर्व बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोग घरों में विशेष पूजा-पाठ करते हैं, शस्त्र पूजन का आयोजन होता है, और शाम को रावण दहन के माध्यम से बुराई को प्रतीकात्मक रूप से समाप्त किया जाता है। इसके साथ ही इस दिन दान-पुण्य करने का विशेष महत्व बताया गया है।    इन वस्तुओं का करना चाहिए दान शास्त्रों में वर्णित है कि विजयादशमी के दिन किया गया दान अक्षय फल देने वाला होता है। यानी इस दिन जो भी पुण्य कार्य किया जाए, उसका फल लंबे समय तक बना रहता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि दशहरे के दिन किन वस्तुओं का दान करना शुभ माना गया है। अन्न और वस्त्र का गुप्त दान धार्मिक ग्रंथों में गुप्त दान को सर्वोत्तम माना गया है। विजयादशमी के दिन यदि कोई व्यक्ति किसी जरूरतमंद, गरीब अथवा ब्राह्मण को चुपचाप अन्न और वस्त्र का दान करता है, तो इससे घर की दरिद्रता दूर होती है। कहा जाता है कि इससे परिवार में स्थायी सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। झाड़ू का दान भारतीय परंपरा में झाड़ू को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। यह न केवल घर की सफाई का साधन है बल्कि नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता को दूर करने का प्रतीक भी है। दशहरे के दिन किसी धार्मिक स्थल पर या किसी जरूरतमंद को नई झाड़ू दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे घर के वास्तु दोष दूर होते हैं और आर्थिक स्थिति में मजबूती आती है। पीले वस्त्र और मिठाई ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दशहरे पर पीले वस्त्रों का दान करना विशेष फलदायी होता है। पीला रंग सौभाग्य और समृद्धि का द्योतक है। इस दिन यदि कोई व्यक्ति पीले वस्त्र अथवा पीली मिठाई का दान करता है, तो उसके जीवन में रुके हुए कार्य पूरे होते हैं। यह कारोबार और करियर में आ रही बाधाओं को दूर करने में भी सहायक माना गया है। सुहाग की सामग्री दशहरे पर विवाहित महिलाओं को सुहाग की सामग्री जैसे चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, काजल, मेहंदी आदि का दान करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से मां दुर्गा और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इस दान से पारिवारिक जीवन में खुशहाली और वैवाहिक जीवन में स्थिरता आती है। दान करते समय ध्यान रखने योग्य बातें दान हमेशा ब्राह्मणों, साधुओं, या फिर वास्तव में जरूरतमंद लोगों को ही करना चाहिए। इस दिन धारदार वस्तुओं, नुकीली चीजों और चमड़े से बनी वस्तुओं का दान करने से बचना चाहिए क्योंकि इन्हें अशुभ माना गया है। दान हमेशा विनम्र भाव से करना चाहिए। दान देने के बाद उसका दिखावा या घोषणा नहीं करनी चाहिए। दान करते समय मन में अहंकार या घमंड नहीं होना चाहिए।

भारत के 5 अनोखे मंदिर जहां मांस, मछली और शराब चढ़ती है भगवान को भोग में

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temples with non vegetarian prasad in india भारत में मंदिरों की अनोखी परंपराएं non vegetarian prasad in indiaभारत एक ऐसा देश है जहां हर राज्य, हर समुदाय और हर मंदिर की अपनी खास परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं हैं। जहां अधिकांश लोग भगवान को फल, फूल और मिठाई का भोग लगाते हैं, वहीं देश में कुछ ऐसे प्रसिद्ध मंदिर भी हैं जहां भगवान को मांस, मछली और शराब अर्पित की जाती है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। कामाख्या मंदिर 51 शक्तिपीठों में एक प्रमुख स्थल है। यह मंदिर तंत्र साधना का बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां देवी को मांस और मछली अर्पित की जाती है, और यह प्रसाद बाद में भक्तों को भी वितरित किया जाता है। विशेष रूप से अंबुबाची मेले के दौरान लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। non vegetarian prasad in india तारापीठ एक तांत्रिक साधना स्थल है। यहां देवी तारा को बलि दी जाती है और शराब के साथ भोग लगाया जाता है। यह मंदिर खासकर दुर्गा पूजा और तंत्र साधना के दौरान काफी प्रसिद्ध होता है। प्रसाद को भक्त पूरी श्रद्धा से ग्रहण करते हैं। काल भैरव मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां भक्त शराब की बोतलें लेकर आते हैं और पुजारी भगवान को वह शराब ‘पिलाते’ हैं। इसे तांत्रिक पूजा का हिस्सा माना जाता है। यहां चढ़ाई गई शराब का कुछ भाग भक्तों को प्रसाद के रूप में भी मिलता है। यह मंदिर देवी काली को समर्पित है और भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां बलि की परंपरा अभी भी प्रचलन में है। बलि के बाद मांस को पकाकर प्रसाद के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है। यह परंपरा बंगाल की गहराई से जुड़ी है। मदुरई के पास स्थित यह मंदिर स्थानीय देवता मुनियांदी स्वामी को समर्पित है, जिन्हें भगवान शिव का रूप माना जाता है। यहां चिकन और मटन बिरयानी भोग में चढ़ाई जाती है और फिर प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटी जाती है। भारत की विविधता उसके मंदिरों और परंपराओं में साफ झलकती है। जहां एक ओर भक्त फल-फूल अर्पित करते हैं, वहीं कुछ जगहों पर मांस, मछली और शराब को भी उतनी ही श्रद्धा से भोग लगाया जाता है। यह न केवल धार्मिक विविधता को दर्शाता है, बल्कि हमारी संस्कृति की विशालता को भी उजागर करता है।